झुंझुनूं में रीटा चौधरी को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनाने पर जबरदस्त रोष

झुंझुनूं में रीटा चौधरी को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनाने पर जबरदस्त रोष

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ओला परिवार के नजदीकी और जिले के सीनियर कांग्रेसी नेता खलील बुडाना को जिलाध्यक्ष नहीं बनाने से पार्टी के निर्णय से कांग्रेसी ही नाराज़

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झुंझुनूं (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। गत दिनों राजस्थान में कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की घोषणा से जहां मुबारकबाद और शुभकामनाएं देना शुरू हुआ, वहीं कुछ जगह इस नियुक्ति पर जबरदस्त नाराजगी का इजहार भी शुरू हो गया है। ऐसा ही मामला झुंझुनूं जिले का है, जहां मण्डावा विधायक रीटा चौधरी को जिलाध्यक्ष बनाया गया है।



जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की लिस्ट वायरल होते ही झुंझुनूं में रीटा चौधरी की नियुक्ति को लेकर कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं में विरोध शुरू हो गया। सोशल मीडिया और फोन पर पीसीसी में बैठे प्रदेश नेताओं तक इस नाराजगी का इजहार किया गया।


इन लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि रीटा चौधरी तो विधायक हैं और तीसरी बार विधायक हैं, आगे विधायक और मंत्री बनने का उनके पास ऑप्शन है, इसलिए रीटा चौधरी की बजाए किसी सीनियर दावेदार को जिलाध्यक्ष बनाया जाता, जिसे कभी विधानसभा टिकट भी नहीं मिला तो पार्टी के हित में बेहतर होता।


इस नाराजगी का इजहार कांग्रेस के स्थानीय सीनियर नेता और मजबूत दावेदार खलील बुडाना को लेकर ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। खलील बुडाना एक कांग्रेसी पृष्ठभूमि परिवार से सम्बन्ध रखते हैं और छात्र जीवन से कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। वे करीब 30 साल से कांग्रेस की विचारधारा के लिए समर्पित होकर पार्टी के लिए काम कर रहे हैं।


खलील बुडाना 1995 से 2005 तक लगातार दो बार कांग्रेस के सिम्बल पर झुंझुनूं पंचायत समिति के सदस्य निर्वाचित हुए थे। फिर 2005 से 2010 तक झुंझुनूं जिला परिषद सदस्य निर्वाचित हुए थे। उनके दादा जी नवाब खां ग्राम पंचायत बुडाना के सरपंच पंचायती राज लागू होने के साथ 1961 में रहे हैं और वे इस इलाके में कांग्रेस के एक मजबूत स्तम्भ थे।



खलील बुडाना कांग्रेस संगठन में जिला उपाध्यक्ष एन‌एसयूआई झुंझुनूं, 1999 से 2010 तक जिलाध्यक्ष युवा कांग्रेस झुंझुनूं, 2010 से 2021 तक जिला कांग्रेस कमेटी झुंझुनूं में महासचिव रहे हैं। 2022 से अब तक कार्यकारी जिलाध्यक्ष झुंझुनूं की जिम्मेदारी सम्भाल रहे हैं।


वे कांग्रेस में 30 साल से लगातार सक्रिय हैं, छोटी सी उम्र में छात्र जीवन से हर समय कांग्रेस के लिए हाजिर रहते हैं। वे झुंझुनूं क्षेत्र के कद्दावर कांग्रेसी ओला परिवार के नजदीकी लोगों में माने जाते हैं। खलील बुडाना 1996 से पूर्व केन्द्रीय मंत्री शीशराम जी ओला के उनकी मृत्यु तक प्रवक्ता रहे हैं।


वे 2021 से 2023 तक बीस सूत्री कार्यक्रम समिति के जिला उपाध्यक्ष रहे हैं। वर्तमान में वे दरगाह शरीफ शक्करबार बाबा नरहड़ वक्फ कमेटी के चेयरमैन हैं। इस पद पर वे 2020 से खिदमत कर रहे हैं। 2011 से 2015 तक भी वे नरहड़ दरगाह के चेयरमैन रहे हैं। इतने सीनियर कांग्रेसी को नजर अंदाज करने से कांग्रेस के जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं और नेताओं में जबरदस्त नाराजगी है। 


यह नाराजगी अल्पसंख्यक वर्ग खासकर मुस्लिम समुदाय में और ज्यादा है। वो इसलिए कि झुंझुनूं एक मुस्लिम बाहुल्य लोकसभा क्षेत्र है। यहां से वीर चक्र विजेता कैप्टन अय्यूब खान साहब दो बार लोकसभा सांसद कांग्रेस के सिम्बल पर निर्वाचित हुए थे और वे केन्द्रीय मंत्री भी रहे थे। झुंझुनूं जिले में सात विधानसभा सीट हैं और कांग्रेस एक भी मुस्लिम टिकट नहीं देती है। 


इस बात को लेकर सालभर पहले झुंझुनूं उप चुनाव में मुस्लिम टिकट की मांग को लेकर बड़ी नाराजगी व्यक्त की गई थी। लेकिन तब नाराजगी व्यक्त करने वाले नेता कार्यकर्ता अब जिलाध्यक्ष के मुद्दे पर एक तरह से खामोश से हैं। वजह यह है कि उस नाराजगी का नेतृत्व करने वाले एम डी चौपदार को कुछ महीने पहले कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग का प्रदेश चेयरमैन बनाकर चुप करा दिया गया है।


झुंझुनूं जिले में एक विचित्र बात की चर्चा चाय चौपाल पर यह भी हो रही है कि क्या यहां सिर्फ जाट राजनीति ही होगी ? जाटों को ही टिकट व पद मिलेंगे ? यह चर्चा इसलिए हो रही है कि जिले की सात विधानसभा सीटों में से तीन पर कांग्रेस ने जाट समुदाय से सम्बन्धित नेताओं को टिकट दिया है। लोकसभा टिकट भी जाट समुदाय को मिलता है। जिला प्रमुख और अधिकतर पंचायत समितियों में प्रधान का टिकट भी कांग्रेस जाट को ही देती है। जिलाध्यक्ष भी जाट ही बनाया जाता है। 


अब जिलाध्यक्ष मुस्लिम को बनाने की बड़ी मांग थी और दावेदारी भी मजबूत थी, लेकिन पार्टी ने नजर अंदाज कर फिर जाट को ही जिलाध्यक्ष बना दिया। इससे अन्य समुदायों के साथ मुस्लिम समुदाय में कांग्रेस आलाकमान के इस फैसले से कड़ा रोष व्याप्त हो गया है। जमीन से जुड़े हुए सियासी जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के इस फैसले से आगामी पंचायती राज और नगर निकाय चुनावों में कांग्रेस को बड़ा नुक़सान हो सकता है।

(24/11/2025)

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