कोई झूठ को सच का आईना तो दिखाए ?
कोई झूठ को सच का आईना तो दिखाए ? ************************ वेदव्यास साहित्य को आज भी ‘सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् के पर्याय रूप में ही देखा जाता है। समय का सत्य, समाज का शिव और प्रकृति का सुन्दर ही इसकी विचारधारा है। हजारों वर्ष से शब्दों की यह महाभारत युद्ध और शांति के बीच जारी है। विकास के नए सोपान इसे ऊर्जा देते हैं और मनुष्य के नए संधान इसे प्रासंगिक बनाते हैं। यह साहित्य मनुष्य के द्वारा ही मनुष्य के लिए समाज और समय के बीच खड़ा रहता है। राजा और प्रजा के बीच, प्रकृति और मनुष्य के साथ, सूर्य और धूप के मध्य तथा जीवन और जगत के आमने-सामने यह साहित्य ही होता है। मनुष्य क्या सोचता है, मनुष्य क्यों सोचता है और मनुष्य किसके लिए सोचता है जैसी सभी जिज्ञासाएं इस साहित्य में ही निवास करती हैं। नाद ब्रह्म की तरह यह शब्द ब्रह्म मनुष्य के चेतन-अवचेतन का पर्याय है। वेद और पुराण की ऋचाएं, वाल्मीकि और महर्षी वेदव्यास की वाणी इसी का अनहदनाद है। इसका उद्गम मनुष्य का हृदय है और इसकी यात्रा समय का ओर-छोर है तो प्रतिफलन स्मृतियों का भाष्य है। साहित्य का यह प्रवाह मनुष्य के बिना कुछ भी नहीं है। यह संविधानों क...