नवाब कायम ख़ान डे पर क़ौम के इन महानुभावों को भी जरूर याद करें, जो आज इस दुनिया में नहीं हैं ?
नवाब कायम ख़ान डे पर क़ौम के इन महानुभावों को भी जरूर याद करें, जो आज इस दुनिया में नहीं हैं ?
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जयपुर (इकरा पत्रिका)। कायमखानी क़ौम के प्रथम पुरुष वली सिफ्त इन्सान नवाब कायम ख़ान साहब का 14 जून 2020 को 601 वां शहादत दिवस है। वे तत्कालीन हिसार हांसी रियासत के नवाब और बादशाह फिरोज शाह तुगलक साहब के प्रधान वजीर (प्रधानमंत्री) और सेनापति थे। दादा साहेब नवाब कायम ख़ान साहब हांसी पीर साहब (ख़ानक़ाह चार कुतुब) के मुरीद थे। एक वक्त ऐसा भी आया था, जब दहली (दिल्ली) सलतनत पूरी तरह से अस्थिर हो गई थी और देश की केन्द्रीय सत्ता व्यवस्था बिखर गई थी, तब दहली सलतनत के सभी दरबारियों और रजवाड़ों ने नवाब कायम ख़ान साहब को शहंशाह ए हिन्द (भारत का केन्द्रीय शासक) बनाने का ऑफर किया, लेकिन यह ऑफर उन्होंने देश की एकता व अखंडता के लिए ठुकरा दिया था।
(इतिहासकार मरहूम महबूब खां जी एलमाण चूरू)
नवाब कायम ख़ान साहब का यौम ए शहादत (शहीद दिवस) 14 जून को सभी कायमखानी बाहुल्य गावों और इलाकों में विभिन्न तरीके से हर साल मनाया जाता है। इस बार भी यह मनाया जाएगा। इस दिन हमें नवाब कायम ख़ान साहब के साथ क़ौम के उन महानुभावों को भी याद करना चाहिए जो आज इस दुनिया में नहीं हैं और उन्होंने क़ौम व इन्सानियत के लिए अपनी हैसियत से बाहर जाकर काम किया है। यहाँ मैं ऐसे कुछ महानुभावों के नाम लिख रहा हूँ, जिसमें और इजाफा भी किया जा सकता है। जो नाम छूट गया हो, वो आप मुझे कमेन्ट बाॅक्स में लिख कर मेसेज कर दें, ताकि उसे इस लिस्ट में जोड़ दिया जाए।
पहला नाम मेरी याददास्त और मालूमात के हिसाब से मरहूम महबूब खां जी एलमाण चूरू का है, जिन्होंने उस जमाने में एक लाजवाब रिसर्च कर कायमखानी क़ौम के इतिहास पर किताब लिखी, तब वे रील वाला कैमरा लेकर सवारी गाड़ियों में सफर करके उन तमाम कायमखानी धरोहरों को देखने, उनका अध्ययन करने एवं उनकी फोटो खींचने के लिए गए थे। कायमखानी इतिहास की विभिन्न किताबों में जो फोटो छपी हुई हैं, वे महबूब खां जी के कैमरे से ही खींची हुई हैं। इन ऐतिहासिक धरोहरों (किले, बावड़ी, मकबरे, महल वगैरह) में से कुछ आज नहीं हैं यानी गिर चुकी हैं, लेकिन महबूब खां जी की वजह से फोटो के तौर पर आज हमारे पास सुरक्षित हैं।
(मरहूम सूबेदार धौंकल खां जी दौलतपुरा)
अगला नाम मरहूम सूबेदार धौंकल खां जी दौलतपुरा का है, जिन्होंने गांव-गांव और घर-घर जाकर क़ौम को जागरूक किया और नतीजे में डीडवाना कायमखानी हाॅस्टल आज क़ौम के सामने है। वो कहते थे कि "मेरी एक ही इच्छा है कि मरने के बाद हाॅस्टल के पिछवाड़े वाले कब्रिस्तान में मुझे दफन कर दिया जाए, ताकि मैं कब्र में सोया हुआ क़ौम के बच्चों को यहाँ पढता और खेलता हुआ देखता रहूँ।"
(मरहूम मजीद खां जी उर्फ के के राज रोल साहबसर)
इनके अलावा मरहूम मजीद खां जी उर्फ के के राज रोल साहबसर जो राजस्थान कायमखानी महासभा के महासचिव रहे थे। उन्होंने "कायनात" नाम से अखबार भी निकाला था। वे खुद्दार और संघर्षशील शख्सियत के धनी थे। उन्होंने अपने अखबार के जरिए क़ौम को जागरूक किया और वक्फ जायदाद की हिफाज़त के लिए लम्बी जद्दोजहद की।
कौम के एक और बुजुर्ग महानुभाव हुए हैं मरहूम हिदायत खां बाबू जी चूरू, जिन्होंने कौम और उर्दू की खिदमत के लिए अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी थी। कायमखानी क़ौम को 650 साल बाद अपनी जन्म भूमि ददरेवा में पहुंचाने का सपना हिदायत खां बाबू जी ने देखा था। इसके लिए वे सभी कायमखानी बुद्धिजीवियों, भामाशाहों और राजनेताओं से जिक्र करते थे। उनका यह सपना राजस्थान कायमखानी महासभा के तत्कालीन संयोजक जी खान साहब और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री यूनुस खान साहब की वजह से पूरा हुआ और ददरेवा में "नवाब कायम ख़ान स्मारक" का निर्माण हुआ।
(मरहूम हिदायत खां बाबू जी चूरू)
हिदायत खां बाबू जी की एक खास बात यह भी थी कि वो इकरा पत्रिका और मुझ से बहुत मुहब्बत करते थे और अपने इन्तकाल के पहले दिन भी उन्होंने मुझे याद किया। उनकी कई यादें हैं जिनको लिखने की यहाँ गुंजाइश नहीं है। बाबू जी का एक और सपना भी था, जो उन्होंने मुझे कई बार कहा और पत्रों में भी लिखा था, वे पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। वो सपना था झुन्झुनूं में कायमखानी रियासत झुन्झुनूं के संस्थापक नवाब मोहम्मद खान साहब का स्मारक बनाने का, जिसके लिए कौम को गौरो फिक्र करना चाहिए।
(मरहूम उम्मेद खां जी पेश कदमी नूआं)
इनके अलावा मरहूम उम्मेद खां जी पेश कदमी नूआं, जो झुन्झुनूं जिला कायमखानी महासभा के अध्यक्ष रहे हैं और उन्होंने कौम को जागरूक करने में अपना अहम योगदान दिया है। उन्होंने अपने कार्यकाल में झुन्झुनूं कायमखानी हाॅस्टल को बेहतरीन अन्दाज़ में संचालित किया। कायमखानी क़ौम का "बुलेटिन" नाम से आज के करीब 35 साल पहले अखबार शुरू किया। बाद में यह बुलेटिन बन्द हो गया और उन्होंने "पेश कदमी" नाम से अखबार चलाया। वे एक अच्छे लेखक और बेहतरीन वक्ता थे, उर्दू ज़बान में क़ौम को जागरूक करने वाली लाजवाब तकरीर वे किया करते थे। वे इकरा पत्रिका के बड़े खैरख्वाहों में से एक थे।
(मरहूम उस्मान खां जी चैनपुरा)
झुन्झुनूं में ही कायमखानी क़ौम के एक और शख्स भी हुए हैं, जो एक साल पहले जून 2019 में छोटी सी उम्र में इस दुनिया से चले गए। मरहूम उस्मान खां जी चैनपुरा, जो इलाके में "उस्मान जी" के नाम से मशहूर थे। उस्मान जी ने कायमखानी हाॅस्टल झुन्झुनूं की अपनी आखरी सांस तक लगातार करीब 32 साल तक खिदमत की। वे यहाँ 17 साल की उम्र में 11 वीं क्लास में पढने आए थे और फिर बाकी पूरी जिन्दगी इस हॉस्टल की खिदमत और हिफाज़त में लगा दी। वे लगातार करीब 25 साल तक यहाँ वार्डन रहे थे।
मेरी आप सभी से गुजारिश है कि नवाब कायम ख़ान डे पर क़ौम के इन महानुभावों को जरूर याद करें, जो आज हमारे बीच नहीं हैं। ऐसे और भी नाम हो सकते हैं, उन सबको याद कीजिए। (13-06-2020)
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
09602992087, 09414361522






भाई साहब,कुछ और नाम हें-
ReplyDelete1.मेरे वालिद मरहूम भंवर खां डीडवाना 1989में झुन्झुनू अधिवेशन में कौम्ं को खिताब करते स्टेज पर ही शहीद हो गये।
2.कप्तान बक्षू खां जी झाडोद
3.जनाब रमजान खां जी ब्यावर
बिलकुल सही कहा आपने। आप इन तीनों की फोटो और डिटेल्स जो आपके पास है, उसे वाट्सएप नम्बर पर सेन्ड कर दीजिए
DeleteIbrahim khan rolsabsar
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