मशहूर शायर पण्डित आनन्द मोहन जुत्शी 'गुलज़ार' देहलवी साहब का इन्तकाल


मशहूर शायर पण्डित आनन्द मोहन जुत्शी 'गुलज़ार' देहलवी साहब का इन्तकाल
*******************************
"गुलज़ार भाई, बहुत याद आयेंगे आप"
#लोकेश कुमार सिंह 'साहिल' की कलम से
------------------------------------------------

"वो कहते हैं ये मेरा तीर है जां ले के निकलेगा ,
मैं कहता हूँ ये मेरी जान है मुश्किल से निकलेगी"
©️गुलज़ार देहलवी


आज मुजाहिद-ए-उर्दू ने भी रुख़सती ले ली हम सब से।

दिल्ली स्कूल की शाइरी के आख़िरी चिराग़, पद्मश्री से सम्मानित पण्डित आनन्द मोहन जुत्शी 'गुलज़ार' भी चले गये आज (12 जून 2020)।

हिन्दुस्तान की गंगा-जमनी तहज़ीब आज कुछ और ग़रीब हो गयी।

गुलज़ार भाई क्या थे, यह जानने के लिये सिर्फ़ एक क़िस्सा ही बयान कर देना काफ़ी है।

हिंदुस्तान से शाइरों का एक डेलीगेशन पाकिस्तान गया हुआ था। उन लोगों ने उस्ताद शाइर क़मर जलालाबादी से मिलने का मन बनाया।

"दिन ढल गया सूरज का कहीं नाम नहीं है,
ओ वादा शिकन अब भी तेरी शाम नहीं है ?"

©️क़मर जलालाबादी

खोजते हुए उस्ताद के यहाँ पहुँचे। उस्ताद अपने कच्चे मकान के बाहर अपनी छड़ी पर ठुड्डी टिकाये बैठे थे। गुलज़ार भाई ने रस्मन पूछ लिया "उस्ताद, क्या कर रहे हैं" उस्ताद ने जवाब दिया "मुल्क छोड़ने का मातम मना रहे हैं मियाँ"

इधर-उधर की बातें हुईं। उस्ताद से मिल कर सभी शाइर लौट गये, हिंदुस्तान भी आ गये। शेष तो सब बात व उस्ताद दोनों को ही शायद भूल गये। लेकिन गुलज़ार भाई के दिल में चुभी फाँस उन्हें अगले ही दिन वज़ीरे-आज़म इन्दिरा गाँधी के पास ले गयी, पूरा वाक़िया मैडम को गुलज़ार भाई ने ज्यों का त्यों सुना दिया। 


यह तो लिखने की ज़रूरत ही नहीं है कि नेहरू जी, शास्त्री जी, नन्दा जी, इंदिरा जी, चन्द्रशेखर जी, अटल जी सहित भारत के लगभग हर प्रधानमंत्री के यहाँ गुलज़ार भाई जब जी चाहे जा सकते थे।

इन्दिरा जी पण्डित नेहरू की बेटी थीं, लेखकों, कवियों, शाइरों, अदीबों का मान करना ख़ूब जानती थीं।

गुलज़ार भाई की बात सुनते ही मैडम ने पाकिस्तान के पीएम को ख़त लिखवा दिया। ख़त की आख़िरी लाइन थी "अगर हमारे शाइर को इज़्ज़त-आबरू से नहीं रख सकते हो तो उन्हें वापस भारत भेज दो, हम सँभाल लेंगे।"

ख़त के इस्लामाबाद पहुँचते ही पूरी पाकिस्तानी हुक़ूमत में हड़कम्प मच गया। सरकारी कारिन्दे ढूँढते हुए उस्ताद की झोंपड़ी तक पहुँच गये और एक रात में उस्ताद क़मर की तक़दीर पलट गयी। रहने के लिये बढ़िया घर, बच्चों के रोज़गार के लिये भरपूर माली इमदाद और उस दौर में 4500/- रुपये महीने की व्यक्तिगत पेन्शन के आदेश उस्ताद को अगले दिन सुबह मिल चुके थे।

ऐसे थे गुलज़ार भाई ।

अल्लामा ज़ार (जो दाग़ देहलवी के शागिर्द थे, इक़बाल सहित दाग़ साहब के लगभग सभी शागिर्दों को अल्लामा होने का शरफ़ हासिल है) के सबसे चहेते शागिर्द गुलज़ार देहलवी ने 96 बरस ज़िन्दगी जी, अपने ढंग से जी, अपने रंग में जी।

गुलज़ार भाई, बहुत याद आयेंगे आप।

©️✍लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'
                फोटो:- लोकेश कुमार सिंह साहिल 

Comments

Popular posts from this blog

झुंझुनूं में रीटा चौधरी को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनाने पर जबरदस्त रोष

चित्तौड़गढ़ अन्जुमन स्कूल में किया मुस्लिम शिक्षकों का सम्मान

कुरैशी समाज की नो दहेज, नो गार्डन, नो डिनर मुहिम के तहत सादगी से हुई शादी