हाजी आलम खान साहब नहीं रहे
हाजी आलम खान साहब नहीं रहे
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चौपदार समाज की तन्जीम चौपदार महासभा के क़ौमी सदर (राष्ट्रीय अध्यक्ष) और जाने माने समाजी खिदमतगार हाजी आलम खान साहब का 3 जून को इन्तकाल हो गया। वे एक हंसमुख शख्सियत के धनी थे। वे अपनी जान पहचान वालों का बहुत बारीकी से ख्याल रखते थे। वे कई समाजी तन्जीमों से जुड़े हुए थे। आलम साहब इकरा पत्रिका के बहुत बड़े खैरख्वाह थे। वे जब भी मुझ से फोन पर बात करते या मिलते तो मेरा नाम बहुत ही मुहब्बत से इकरा जी लेते थे और इकरा लफ्ज़ से मुतआलिक कुरआन शरीफ़ की पहली आयत पढ कर मेरी हौसला अफजाई करते थे।
हाजी साहब समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ़ बाबुलंद आवाज़ उठाते थे और लोगों को फिजूलखर्ची व गलत रस्मो रिवाज छोड़कर तालीम और तिज़ारत पर खास तवज्जोह देने की हिदायत देते थे। वे चौपदार क़ौम के ही नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम क़ौम के एक मजबूत पिलर थे। उनके पूरी मुस्लिम क़ौम में ही नहीं बल्कि गैर मुस्लिम क़ौमों में भी बहुत नजदीकी ताल्लुक थे। उन्होंने पूरी जिन्दगी अच्छाई और तरक्की के लिए जद्दोजहद की और क़ौम को मोटिवेट किया। अब वे हमेशा के लिए इस दुनिया से रुख़सत हो गए हैं। उन्हें 3 जून को उनकी कर्म भूमि जयपुर में ही सुपुर्द ए खाक कर दिया गया।
हाजी आलम खान साहब गंगा जमुनी तहजीब के पैरोकार और भाईचारे के अलमबरदार थे। वे जयपुर के मुरलीपुरा में रहते थे और सीकर रोड पर भवानी निकेतन के पास उनका फेयर डील कार बाजार नाम से शाॅ रूम भी है। मूलतः वे कोछोर गांव के रहने वाले थे। अल्लाह तआला से दुआ है कि वो अपने तमाम नबियों, वलियों और महबूब बन्दों के सदके व तुफैल में हाजी आलम खान साहब की मग्फिरत करे और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता करे और पूरे ख़ानदान को सब्र ए जमील अता करे, आमीन। (03-06-2020)
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
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चौपदार समाज की तन्जीम चौपदार महासभा के क़ौमी सदर (राष्ट्रीय अध्यक्ष) और जाने माने समाजी खिदमतगार हाजी आलम खान साहब का 3 जून को इन्तकाल हो गया। वे एक हंसमुख शख्सियत के धनी थे। वे अपनी जान पहचान वालों का बहुत बारीकी से ख्याल रखते थे। वे कई समाजी तन्जीमों से जुड़े हुए थे। आलम साहब इकरा पत्रिका के बहुत बड़े खैरख्वाह थे। वे जब भी मुझ से फोन पर बात करते या मिलते तो मेरा नाम बहुत ही मुहब्बत से इकरा जी लेते थे और इकरा लफ्ज़ से मुतआलिक कुरआन शरीफ़ की पहली आयत पढ कर मेरी हौसला अफजाई करते थे।
हाजी साहब समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ़ बाबुलंद आवाज़ उठाते थे और लोगों को फिजूलखर्ची व गलत रस्मो रिवाज छोड़कर तालीम और तिज़ारत पर खास तवज्जोह देने की हिदायत देते थे। वे चौपदार क़ौम के ही नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम क़ौम के एक मजबूत पिलर थे। उनके पूरी मुस्लिम क़ौम में ही नहीं बल्कि गैर मुस्लिम क़ौमों में भी बहुत नजदीकी ताल्लुक थे। उन्होंने पूरी जिन्दगी अच्छाई और तरक्की के लिए जद्दोजहद की और क़ौम को मोटिवेट किया। अब वे हमेशा के लिए इस दुनिया से रुख़सत हो गए हैं। उन्हें 3 जून को उनकी कर्म भूमि जयपुर में ही सुपुर्द ए खाक कर दिया गया।
हाजी आलम खान साहब गंगा जमुनी तहजीब के पैरोकार और भाईचारे के अलमबरदार थे। वे जयपुर के मुरलीपुरा में रहते थे और सीकर रोड पर भवानी निकेतन के पास उनका फेयर डील कार बाजार नाम से शाॅ रूम भी है। मूलतः वे कोछोर गांव के रहने वाले थे। अल्लाह तआला से दुआ है कि वो अपने तमाम नबियों, वलियों और महबूब बन्दों के सदके व तुफैल में हाजी आलम खान साहब की मग्फिरत करे और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता करे और पूरे ख़ानदान को सब्र ए जमील अता करे, आमीन। (03-06-2020)
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

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