सवाल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है !

सवाल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है !
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कोरोना महामारी के सन्दर्भ में 
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जयपुर (टीम थार न्यूज़)। यह तस्वीर है मिस्टर बराक हुसैन ओबामा की, जो अपनी योग्यता और जद्दोजहद के बल पर अमरीका जैसे शक्तिशाली देश के आठ साल तक लगातार राष्ट्रपति रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल के अन्तिम दिन आयोजित पत्रकार वार्ता (प्रेस कांफ्रेंस) में खुलकर पत्रकारों के विभिन्न सवालों के जवाब दिए। इस प्रेस कांफ्रेंस में एक सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था, निरंकुशता और साम्प्रदायिकता से सम्बंधित किया गया। जिसका जवाब मिस्टर ओबामा ने दिया, वो सभी लोकतंत्रवादियों को पढना चाहिए तथा उस पर अमल भी करना चाहिए। अन्यथा लोकतंत्र खत्म हो जाएगा !

मिस्टर ओबामा ने उक्त सवाल का जो जवाब दिया उसका लब्बोलुआब यह था कि "लोकतंत्र की रक्षा के लिए सवाल करना और सन्देह व्यक्त करना बेहद जरूरी है और आप जब तक व्यवस्था संचालकों (शासक-प्रशासक) के प्रति सन्देह व्यक्त नहीं करेंगे या उनके फैसलों पर उनसे सवाल नहीं करेंगे, तो लोक का तंत्र (लोगों का शासन) खत्म हो जाएगा तथा निरंकुशता और साम्प्रदायिकता का तन्त्र (शासन) स्थापित हो जाएगा। लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह भी आवश्यक है कि लोग अन्धभक्ति व कट्टरता से दूर रहें, क्योंकि अन्धभक्ति और कट्टरता किसी विशेष विचारधारा का समर्थन सिखाती हैं, जो आगे चलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर देती हैं !"




आज दुनिया के अधिकतर लोकतांत्रिक देशों का इस मामले में बुरा हाल है। यानी लोग सत्ताधीशों से सवाल करने से बचते हैं या करना ही नहीं चाहते। यही हाल पत्रकारों का है, अधिकतर पत्रकार सत्ताधीशों की कठपुतली बने हुए हैं। इन पत्रकारों को लोकतंत्र की रक्षा और जनहित से कोई मतलब नहीं है। जहाँ तक हमारे देश का सवाल है, तो हमारे यहाँ पत्रकारिता एक तरह से सत्ताधीशों और रसूखदारों की गुलाम बन चुकी है। अधिकतर पत्रकार सत्ताधीशों के भौंपू (प्रवक्ता) बन चुके हैं, उन्हें लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और जनहित से कोई लेना देना नहीं है। 



जो पत्रकार सही मायने में पत्रकारिता कर रहे हैं और सत्ताधीशों से सवाल कर रहे हैं, जिनकी तादाद गिनती की है, उन्हें सत्ताधीशों की ट्रोल गैंग (आईटी सेल) अभद्र शब्दों से सोशल मीडिया पर दिन रात सम्मानित करती रहती है। यही वजह है कि आज कोरोना महामारी में देश का असंख्य मजदूर तबाहो बरबाद हो गया। रोटी रोजगार पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। बेशुमार लोगों की नौकरियां चली गई हैं। करीब ढाई महीने के लाॅकडाउन के बावजूद कोरोना महामारी कम होने की बजाए और बढ रही है, पहले से बेरोजगारी और आर्थिक मन्दी के शिकार लोग अब हताश से नजर आने लग गए हैं। यह सब इसलिए हुआ कि सत्ताधीशों ने बिना तैयारी के आनन फानन में बेवकूफी से लाॅकडाउन किया और उस लाॅकडाउन पर पत्रकारों और जनता ने समय पर सवाल खड़े नहीं किए।

(#सम्पादन:- एम फारूक़ ख़ान)

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