शासन व प्रशासन के कर्णधारों के नाम यह शेअर !
शासन व प्रशासन के कर्णधारों के नाम यह शेअर !
----------------------------------------------
मिट गए नामियों के निशां कैसे-कैसे ?
ज़मीं खा गई आसमां कैसे-कैसे ?
*****************************
----------------------------------------------
मिट गए नामियों के निशां कैसे-कैसे ?
ज़मीं खा गई आसमां कैसे-कैसे ?
*****************************
जयपुर (टीम थार न्यूज़)। लोकतंत्र में जनता ही शासक होती है, यानी शासक का चुनाव जनता करती है। शासनकर्ता पूरी तरह से जनता के मातहत होता। वो जनता का सेवक होता है। इसी तरह शासन व्यवस्था को संचालित करने वाले नौकरशाह भी जनता के सेवक होते हैं। सीधा सा मतलब यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन व प्रशासन की किसी भी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता का सेवक होता है तथा वो जनता द्वारा स्थापित व्यवस्था को जनता के हित में संचालित करता है। लेकिन हकीकत यह नहीं है। यह सिर्फ कागजी बातें हैं। हकीकत यह है कि लोकतंत्र में भी शासन व प्रशासन के कर्णधार अपने आपको सेवक की बजाए मालिक मानने लग गए हैं, उनकी यह सोच जनता एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद अब बात करें राजतंत्र की। जहाँ राजा ही सब कुछ होता था या होता है। पूरी जनता उसकी गुलाम होती है, उसका कहा गया हर शब्द एक आदेश होता है, जिसे संशोधित करने का किसी को कोई अधिकार नहीं होता है। इतिहास में बड़े-बड़े बादशाह, राजा, महाराजा, नवाब आदि हुए हैं। इस लेख में तीन मुगल शासकों की फोटो प्रकाशित की गई हैं। पहली मुगल शासन के संस्थापक बाबर की, जिन्होंने करीब चार साल में भारत के बड़े भू-भाग पर कब्जा किया और शासन किया। वे करीब 48 साल की उम्र में इस दुनिया से चले गए।
दूसरी फोटो बाबर के पोते अकबर की है, जिन्हें इतिहास एक महान शासक बताता है। वे 13 साल की उम्र में शहन्शाह ए हिन्द की गद्दी पर बैठे थे और उन्होंने करीब 49 साल तक भारत पर राज किया था। उनके दरबार में मुसलमान पदाधिकारियों से ज्यादा हिन्दू पदाधिकारी थे। वे पूरी तरह से एक सेक्यूलर शासक थे। उनके राज में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, रंग आदि के आधार पर किसी नागरिक के साथ कोई भेदभाव नहीं होता था। वे एक ऐसे शासक थे, जो पूरी तरह से अनपढ थे। लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारतीय इतिहास में उन जैसा कोई दूसरा शासक नहीं हुआ है, वे सेक्यूलरिज्म के जनक थे।
तीसरी फोटो मुगल बादशाह औरंगजेब की है। जो अपनी सादगी, इन्साफ पसन्दगी और जनहित के कार्यों के लिए एक ऊंचे मकाम के शासक के तौर पर जाने जाते हैं। लेकिन अधिकतर इतिहासकारों ने उनकी छवि को बदनाम करने एवं तोड़-मरोड़ कर गलत तथ्यों के साथ लिखने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी है। वे भी एक महान शासक थे, सरकारी खजाने का एक रूपया भी अपने निजी जीवन पर खर्च नहीं करते थे। उन्होंने करीब 49 साल भारत पर राज किया था। उनके राज में भारत का क्षेत्रफल (रकबा) जितना था, उतना किसी भी शासक के समय नहीं रहा। यानी औरंगजेब ने भारत को सबसे बड़ा भारत बनाया।
औरंगजेब के राज में विश्व की कुल जीडीपी में भारत का 25 फीसदी योगदान था, उस समय भारत की विश्व में वो ही हैसियत थी, जो आज अमेरिका की है। औरंगजेब के राज का एक पहलू यह भी है कि मुगल शासकों के शासन में ऊंचे पदों पर सबसे ज्यादा हिन्दू अधिकारी उन्हीं के राज में थे। यानी मुगल बादशाहों में सबसे ज्यादा हिन्दू अधिकारियों को प्रमुख पदों पर नियुक्ति देने वाले एक मात्र वो ही शासक थे। इसके अलावा उन्होंने कई मन्दिरों को जमीन एवं अन्य सुविधाएं भी दी। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को ऐसी धूल चटाई कि अंग्रेजों ने औरंगजेब के दरबार में घुटनों पर बैठकर माफी मांग कर अपना व्यापार लाइसेंस वापस प्राप्त किया था।
अब इस लेख के शीर्षक में लिखे शेअर की बात करते हैं। मिट गए नामियों के निशां कैसे-कैसे ? ज़मीं खा गई आसमां कैसे-कैसे ? यह बादशाह हों या कोई और, उनको आज कितने लोग याद करते हैं ? उनके जन्म दिवस या मृत्यु दिवस पर कितने लोग उनकी कब्र या समाधि पर जाते हैं ? बहुत से बादशाहों के तो निशान भी मिटा दिए गए हैं या मिटाए जा रहे हैं। जैसे दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदल दिया गया और मुगलसराय में रेलवे स्टेशन का नाम बदल दिया गया।
अगर लोकतंत्र के कर्णधार (शासक, प्रशासक) अपने अन्दर बदलाव नहीं लाएंगे और ऐसे ही सत्ता व पद की मरोड़ में गुरूर करते रहेंगे, तो यकीनन उनके निशां भी मिट जाएंगे। उन्हें भी एक दिन सत्ता से हटना पड़ेगा या रिटायर्ड होना पड़ेगा। उन्हें भी इस दुनिया से एक दिन विदा होना पड़ेगा, फिर याद कौन रखेगा ? जरा सोचिए, अपने दिल पर हाथ रख कर दिल से पूछिए, अपनी अन्तरआत्मा से सवाल कीजिए कि मेरे मरने के बाद मुझे कौन याद करेगा ??
(#सम्पादन:- एम फारूक़ ख़ान)


Comments
Post a Comment