कॅरियर और रोजगार : सोशल मीडिया की आभासी दुनिया और वास्तविकता ?

कॅरियर और रोजगार : सोशल मीडिया की आभासी दुनिया और वास्तविकता ?
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              लेखक:- मोहम्मद खान चित्तौड़गढ़

इस दौर का सबसे क्रन्तिकारी और एक्टिव प्लेटफार्म सोशल मीडिया ही है, इस बात से शायद सभी सहमत होंगे ? एक ऐसा हुजूम सोशल मीडिया पर उमड़ा है, जो बेरोजगारी के जाने-अंजाने दंश को बेपरवाह अन्दाज़ में झेल रहा है और अपनी सारी वेदना को सोशल मीडिया पर आक्रोश के साथ व्यक्त भी कर रहा है। साथ ही सोशल मीडिया यूजर में समाज सुधार और राष्ट्रवाद की भावना भी भ्रमित करने वाली नई परिभाषा के साथ हिलोरें मार रही है।

सोशल मीडिया पर एक्टिव युवा, जो देश व कौम के लिए वाक़ई कुछ करना भी चाहते हैं। लेकिन नौकरी पेशा नहीं रहने के कारण वो आक्रोशित हैं, यद्यपि वो समाज में सुधार चाहते हैं, सिस्टम में बदलाव चाहते हैं, लेकिन समस्या यह है कि वो खुद को बदलना नहीं चाहते और बदलाव लाने जैसे सिस्टम में ढलना भी नहीं चाहते।

मेरा निवेदन है कि यह युवा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हुए कौम को या खुद को अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पहचान करवाएं। रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि कैसे हासिल होगा ? घर, परिवार व कौम में खुशहाली कैसे आएगी ? ऐसे सवालों पर सोशल मीडिया के जरिए गम्भीरता से चर्चा करें तथा जागरूकता को बढावा देने एवं सहकार (एक दूसरे का सहयोग) के उद्देश्यों को स्थापित करने का प्रयास करें।

यह एक हक़ीक़त है कि सोशल मीडिया साइट्स की आभासी दुनिया में युवा वर्ग इतना व्यस्त व मगन हो गया है कि वो खुद को और खुद के घर परिवार को पूरी तरह से भूल चुका है। इन युवाओं का मन मस्तिष्क वास्तविकता से कोसों दूर चला गया है। इनकी यह आदत इनके वर्तमान व भविष्य दोनों को बरबाद करने के लिए मुंह फैलाए खड़ी। इसलिए जरूरी है कि यह युवा इस आभासी दुनिया से बाहर आकर वास्तविकता को पहचानें और उसे गले लगाएं।

यह बातें नोट करने वाली हैं जैसे- "ऐसे तमाम व्यक्ति जो चाय की थड़ी पर चार की सीट पर सात लोगों के बीच बैठ कर अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों पर चर्चा करते हैं। ऐसे में आप समझ सकते हैं उसे अपनी मूलभूत जरूरतों की कितनी जानकारी होंगी ?" "जो लड़का घर की दैनिक जरूरतों के सामान की आपूर्ति के लिए दिए गए पैसों में से जुगाड़ कर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर में जाकर सलमान खान की फ़िल्म देख रहा हो और बात करता हो देश की अर्थव्यवस्था पर, ऐसे में आप समझ सकते हैं कि उसे कितनी जानकारी होगी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की ?"

जो नौजवान 35 वर्ष की आयु पार कर बेरोजगारी के दंश से सिकुड़ कर दिन रात बिस्तर में पड़े रहते हैं और बाप की मजदूरी के पैसे से खरीदे गए मोबाईल से फेसबुक या वाट्सअप पर भारत-चीन सीमा के विवाद से लेकर, मोदी, आरएसएस आदि पर लेक्चर झाड़ते रहते हैं, ऐसे में उसे कितनी जानकारी है अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की ? प्रश्न बड़ा डरावना और विचारणीय है ! अपने युवा पुत्र या पुत्रों की यह हालत देखकर उनके माता पिता के दिल पर क्या पीड़ा गुजर रही होगी ? यह भी एक गम्भीरता से विचार करने वाला प्रश्न है !

जिस नौजवान का अधेड़ बूढ़ा बाप घर कैसे चले ? नौकरी, व्यापार, खेती या पशुपालन, मिल-फैक्ट्री आदि की मजदूरी कर अपनी कमाई कैसे बढ़ाए ? अपने जवान पुत्र-पुत्रियों की शादी कैसे करे और उनको सिर छुपाने की छत कैसे बना कर दे ? आदि सवालों से चौबीस घण्टे परेशान रहता है। उसका युवा पुत्र जिससे वो उम्मीद कर रहा है कि वो कुछ काम धन्धा कर खुद का जीवन सफल बनाएगा और उसके भी बुढापे का सहारा बनेगा, वो युवा दिन रात सोशल मीडिया पर कांग्रेस-भाजपा के बारे में बिना सिर पैर की बातें कर अपना वक्त बरबाद कर रहा है। ऐसा दिशाहीन और गैर जिम्मेदार युवा कैसे समझ सकता है कि उसकी मूलभूत जरूरतें कांग्रेस-भाजपा नहीं कुछ और हैं ?

जो युवा अपने भाई से चार अंगुल जमीन के लिए खून खराबे पर उतर कर केस-मुकदमे कर देता हो, हिन्दू-मुसलमान के मसले पर भड़काऊ भाषण देता हो और सामने वाले को कट्टर बताता हो उसे कितनी जानकारी है अपनी मूलभूत जरूरतों की ? जो युवा दूसरे के चढ़ाने पर अपने बहुसंख्यक पड़ौसी दोस्त को अपनी कौम का विरोधी होने की बात करता हो, उसे कैसे पता चलेगा कि उसकी प्राथमिक आवश्यकताएं क्या हैं ?

जो व्यक्ति पड़ौस के नाली के पानी या गाँव-खेत के रास्ते के विवाद या घर परिवार के, सगे समधियों के पारिवारिक मसलों को सुलझा न पता हो, वह व्यक्ति राजनीतिक मसलों पर पक्ष-विपक्ष के सवालों पर गालियां बकता हो कि तुम बेवकूफ हो, देशद्रोही हो, ऐसे में वह कैसे समझता होगा कि उसकी प्राथमिक जरूरतें क्या हैं ? कहने का मतलब यह है जब हम प्राथमिक स्तर पर मजबूत होंगे, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक रूप से स्वस्थ होंगे, जागरूक होंगे, तब इन उपरोक्त संदर्भों को समझेंगे और इन समस्याओं पर विजय पाने में सक्षम हो पाएंगे। तब इन मुद्दों पर की गई चर्चाएं सार्थक होंगी।

क्या बिना कुछ खाए युद्ध लड़ा जा सकता है ? क्या बिना पढ़े-लिखे चीजों के आधुनिक सन्दर्भों और समस्याओं को अच्छे से समझा जा सकता है ? क्या आर्थिक रूप से कमजोर, बीमार, दुःखी परिवार में फलां-फलां पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नारा लगाना सही है ? मैं यह भी नहीं कहता आप में कौम परस्ती न हो, खूब हो। आप में धर्म न हो, खूब हो, राजनीति की जानकारी न हो, खूब हो। आप में हर बात हो, पर क्या आपके पास बुनियादी जरूरतों की जानकारी मौजूद है ? 

आपको रोजगार मिल नहीं पा रहा है और आप शेरो शायरी के साथ राजनीति की बात कैसे कर रहे हो ? अगर आपके पास प्राथमिक चीजें नहीं हैं, तो जो आपके पास नहीं है उसके लिए आप लड़ो, संघर्ष करो, प्रयास करो, उतना कि जितना आप सोशल मीडिया पर बेकार की बातों के लिए करते हो, ताकि आपका जीवन सफल हो सके और आपकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो सकें। सीमा पर लड़ने के लिए हमारी सेना है। एक पूरा का पूरा रक्षा तंत्र है, जो सिर्फ उसी के लिए है। वो बाकायदा सेलरी भी लेता है तो उसे अपना काम करने दीजिए। आप सिर्फ यह करिए कि अपने बेटे को पढाइए, दौड़ाइए कि वह सेना में जाकर देश की सेवा कर सके और यह तभी सम्भव होगा जब उसे अच्छी शिक्षा और संतुलित आहार मिलेगा !

आपको सरकारों से, सियासी और कौमी रहनुमाओं से अच्छी शिक्षा, संतुलित खाना, शुद्ध पानी, अच्छे रोजगार, अच्छे हॉस्पिटल आदि की मांग करनी चाहिए। राफेल, कश्मीर, पाकिस्तान, चायना, ट्रम्प, मोदी, राहुल गांधी पर उन्हें बहस करने दीजिए, जिनका यह काम है। आपका काम सिर्फ मूलभूत आवश्यकताओं की प्राप्ति है, उसके लिए जद्दोजहद कीजिए ! 

सैनिक और किसान के पेट में अनाज होगा तभी सात किलो की राइफल सैनिक से उठेगी और किसान से हल, तो किसान की खुशहाली की मांग करिए, जिससे दोनों को खाना मिल सके। असॉल्ट राइफल के आयात और भ्रष्टाचार की चर्चा उन बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों पर छोड़ दीजिए, जो इसके करने के योग्य हैं और उनका काम ही ऐसे मुद्दों को उठाना है।

आप सिर्फ मूलभूत जरूरतों के मुद्दों पर सरकार को, सियासी और कौमी रहनुमाओं को घेरिए, सवाल करिए, रोजगार मांगिए। यही आपका हक़ और जरूरत है। यही असली राष्ट्रवाद है, क्योंकि आप सुखी नहीं रहेंगे, तो आपका घर सुखी नहीं रहेगा और घर सुखी नहीं रहेगा, तो समाज सुखी नहीं रहेगा और समाज सुखी नहीं रहेगा, तो राष्ट्रीय सुख और राष्ट्रवाद की कल्पना करना और उसके लिए सोशल मीडिया पर अपना समय बरबाद करना व्यर्थ है। अन्त में आपसे एक और निवेदन कि आपको सिर्फ मूलभूत आवश्यकताओं के मुद्दों पर ही वोट देना चाहिए और इसी बात में आपका इंट्रेस्ट होना चाहिए ना कि सोशल मीडिया पर वायरल होते गैर जरूरी मुद्दों पर !

(लेखक कायमखानी वेलफेयर ट्रस्ट जयपुर के महासचिव हैं) (01-07-2020)


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