कोरोना महामारी में नए एडमिशन के नाम पर शिक्षण संस्थानों ने मचाई लूट, शासन-प्रशासन खामोश ?

कोरोना महामारी में नए एडमिशन के नाम पर शिक्षण संस्थानों ने मचाई लूट, शासन-प्रशासन खामोश ?
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करीब साढे तीन महीने से देशभर के शिक्षण संस्थान बन्द हैं, न विद्यार्थियों का कोर्स पूरा हुआ है और ना ही परीक्षाएं, फिर भी शिक्षण संस्थान नए एडमिशन के नाम पर विद्यार्थियों और अभिभावकों का मानसिक व आर्थिक शोषण कर उन्हें डिप्रेशन में धकेलने का अपराध कर रहे हैं। इसके बावजूद सत्ताधीशों और मीडिया ने मुंह में दही जमा रखा है, क्यों ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। कोरोना महामारी के कारण करीब 15 मार्च से देशभर के सभी शिक्षण संस्थान बन्द हैं। यानी सभी स्कूलों, काॅलेजों, कोचिंग संस्थानों और यूनिवर्सिटीज में क्लास नहीं लग रही हैं। हाँ, यह अलग बात है कि कुछ संस्थान ऑनलाइन क्लासेज के नाम पर पढाई करवाने की लीपापोती कर रहे हैं। देशभर के सभी शिक्षण संस्थानों में कोरोना लाॅकडाउन से पहले ही शिक्षण कार्य बन्द कर दिया गया था, यानी 10 से 20 मार्च के बीच अधिकतर शिक्षण संस्थान बन्द हो गए थे।

इस दौरान विद्यार्थियों की पढाई पूरी तरह से चौपट हो गई, परीक्षाएं स्थगित कर दी गई। कुछ कक्षाओं को प्रमोट कर दिया गया। यानी बिना परीक्षा और परिणाम के विद्यार्थियों को अगली कक्षा में भेज दिया गया। लाॅकडाउन खुलने के बाद कुछ परीक्षाएं हो गई और कुछ होनी बाकी हैं। इस पीड़ा में एक बड़ी पीड़ा यह भी हुई कि लोगों के रोटी रोजगार ठप्प हो गए। लोग हर आवश्यक चीज़ के मोहताज (जरूरतमंद) हो गए। इस बीच तीसरी पीड़ा पैदा की शिक्षण संस्थानों ने, इन्होंने नए एडमिशन चालू कर दिए। विद्यार्थियों के पास सूचना पहुंचने लगी कि आप आओ और अगली क्लास में एडमिशन लेने के लिए फीस जमा करवा दो।

इस पीड़ा ने पहले से दुःखी विद्यार्थियों और अभिभावकों की पीड़ा में और इजाफा कर दिया। सवाल यह है कि लाॅकडाउन में पूरी तरह से बेरोजगार हुए और बरबाद हुए अभिभावक फीस कहाँ से जमा करवाएं ? क्या शिक्षण संस्थानों की यह कारस्तानी लूट और अपराध नहीं है ? क्या शिक्षण संस्थान नए एडमिशन के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका नहीं डाल रहे हैं ?


यह दीवार पर लिखी हुई सच्चाई है कि देशभर में करीब साढे तीन महीने हर विद्यार्थी की पढाई डिस्टर्ब हुई है। इस दौरान शिक्षण संस्थानों ने विद्यार्थियों की पढाई नहीं करवाई है, यानी उनका कोर्स पूरा नहीं करवाया है, जबकि इन संस्थाओं ने एडवांस में पूरी साल की या पूरे कोर्स की फीस ले रखी है। सीधा सा मतलब है कि कोरोना महामारी की वजह से अभी तक 30 प्रतिशत पढाई या कोर्स शिक्षण संस्थानों ने नहीं करवाया है, जबकि फीस पहले से पूरी ले रखी है। अब सीधा सा इसका जवाब यह है कि नए एडमिशन में 30 प्रतिशत पहले वाली फीस लेस (कम) करके जमा करनी चाहिए। 

दूसरी बात यह है कि अभी यह भी तय नहीं है कि शिक्षण संस्थान कब खेलेंगे, यानी पढाई शुरू कब होगी ? तो फिर यह नए एडमिशन के नाम पर फीस की लूट और डकैती क्यों मची हुई है ? नए सत्र की जो फीस मांगी जा रही है, वो बहुत से विद्यार्थियों ने जमा भी करवा दी है। इसके लिए उनके माता पिता ने इस बेरोजगारी के दौर में कैसे फीस का जुगाड़ किया है और कैसी मानसिक पीड़ा झेली है ? उसको तो वही जानते हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि यह विद्यार्थियों और अभिभावकों के साथ सरासर अन्याय व लूट है।


कोरोना महामारी में पहले से ही मानसिक तनाव झेल रहे विद्यार्थियों और अभिभावकों को शिक्षण संस्थानों की इस कारस्तानी ने डिप्रेशन में धकेलने का अपराध किया है या कर रहे हैं। लेकिन शासन व प्रशासन के कर्णधार और मीडिया हाउस ने इस मुद्दे पर मुंह में दही जमा रखा है। इनका मुंह नहीं खुल रहा है। क्योंकि बहुत से विधायकों, सांसदों, मन्त्रियों और अधिकारियों ने खुद प्राइवेट शिक्षण संस्थान खोल रखे हैं या उनके नजदीकी लोगों ने खोल रखे हैं, इसलिए सत्ताधीशों ने इस लूट पर खामोशी की चादर ओढ रखी है। 

शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण से देशभर में लूट मची हुई है और सब खामोश हैं। जानते पहचानते हुए भी लोग अपनी जेब कटवा रहे हैं। यह सारी लूट सत्ताधीशों, पूंजीपतियों और मीडिया हाउस की मिलीभगत से चल रही है। यह शिक्षा का कारोबार ही नहीं है, बल्कि लूट और डकैती भी है तथा इस लूट व डकैती का कुछ हिस्सा ईमानदारी से राजनेताओं, अधिकारियों और मीडिया हाउस मालिकों की जेब में जाता है। इसलिए सब जानते हुए भी खामोश हैं।

विद्यार्थियों और अभिभावकों से निवेदन
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अगर आप स्कूल, काॅलेज और यूनिवर्सिटीज आदि शिक्षण संस्थानों की 30 प्रतिशत फीस कम करवाना चाहते हैं, तो अपनी आवाज़ बुलंद करें, लोकतांत्रिक तरीके से शान्तिपूर्वक जद्दोजहद करें, सोशल मीडिया पर इसके लिए एक मूवमेंट चलाएं, सम्बंधित शिक्षण संस्थान के प्रधानाध्यापक, प्रधानाचार्य, प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष/सेक्रेटरी, वीसी आदि के साथ जिला शिक्षा अधिकारी, जिला कलेक्टर, डायरेक्टर एज्युकेशन, शिक्षा सचिव, मुख्य सचिव, शिक्षा मन्त्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल महोदय को पत्र लिखें और ई-मेल करें। अगर आपने फीस जमा करवा दी है तो उसका 30 प्रतिशत हिस्सा वापस मांगें, क्योंकि आपने पिछले साल की पूरी फीस दी है और उसकी 30 प्रतिशत पढाई नहीं हो पाई है। 

हम यहाँ नमूने के तौर पर एक पत्र अटैच कर रहे हैं, आप चाहें तो उसकी काॅपी कर लें या फिर अपनी भाषा में खुद लिख लें, लेकिन ऐसा मांग पत्र जरूर लिखें और सम्बंधित पदाधिकारियों को भेजें। पत्र निम्न है :-

सेवा में, 
श्रीमान प्रधानाध्यापक / प्रधानाचार्य / प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष / सेक्रेटरी / वीसी महोदय आदि

(शिक्षण संस्थान का नाम एवं पता)

विषय:- कोरोना महामारी में प्रभावित हुई पढाई के बदले 30 प्रतिशत फीस कम करने बाबत।

महोदय, निवेदन है कि कोरोना महामारी के कारण मार्च महीने से ही शिक्षण संस्थान बन्द हैं और पढाई व परीक्षाएं भी पूरी तरह से प्रभावित हुई हैं। जिससे विद्यार्थियों और अभिभावकों को मानसिक व आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ रही है। नए एडमिशन के नाम पर संस्थान में फीस मांगी जा रही है, जबकि पिछली साल हमने पूरी फीस जमा करवाई थी, उसकी 30 प्रतिशत पढाई नहीं हो पाई है। इसलिए नए सत्र की फीस में 30 प्रतिशत फीस लेस (कम) की जाए। साथ ही यह भी व्यवस्था की जाए कि नए सत्र की फीस शिक्षण कार्य प्रारम्भ होने के पश्चात ली जाए, क्योंकि अभी कोरोना महामारी के कारण कक्षाएं लग नहीं रही हैं और यह भी तय नहीं हुआ है कि कक्षाएं कब लगनी शुरू होंगी ? इसके अलावा जिन विद्यार्थियों ने नए सत्र की पूरी फीस जमा करवा दी, उनकी 30 प्रतिशत फीस लौटाने की भी व्यवस्था करें।

भवदीय 
(हस्ताक्षर, पूरा नाम, पता और मोबाइल नम्बर)
(दिनांक)


आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रतिलिपि प्रेषित:-
(1) श्रीमान राज्यपाल महोदय
(2) श्रीमान मुख्यमंत्री महोदय 
(3) श्रीमान शिक्षा मन्त्री महोदय 
(4) श्रीमान मुख्य सचिव
(5) श्रीमान शिक्षा सचिव 
(6) श्रीमान शिक्षा निदेशक 
(7) श्रीमान जिला कलेक्टर 
(8) श्रीमान जिला शिक्षा अधिकारी 
(9) श्रीमान एसडीएम साहब 
(10) श्रीमान ब्लाॅक शिक्षा अधिकारी 

नोट:- इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, ताकि आप उक्त अन्याय व लूट से बच सकें ?
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।


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