त्यौहार : ईद उल अज़हा और रक्षाबंधन
त्यौहार : ईद उल अज़हा और रक्षाबंधन
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। त्यौहार हर सभ्यता व संस्कृति में मनाए जाते हैं। दुनिया के हर कौने में त्यौहार मनाने का रिवाज (परम्परा) है। हर त्यौहार की अपनी अहमियत और एक सन्देश होता है। त्यौहार शान्ति, भाईचारे, त्याग, मान-सम्मान, संस्कार और सहयोग का सन्देश देते हैं। कुछ त्यौहार खुदाई (ईश्वरीय) हुक्म से मनाए जाते हैं, तो कुछ किसी महापुरुष रूपी राजा की विजय, राज तिलक आदि की खुशी में मनाए जाते हैं। कुछ त्यौहार किसी पैगम्बर, वली, पीर, फकीर, सन्त आदि के जन्म दिन या मृत्यु दिन के दिन की याद में मनाए जाते हैं। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध और परम्पराओं से दूर भागती नई पीढ़ी में त्यौहारों की खुशी और सन्देश की अहमियत घट रही है। जो एक सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
त्यौहारों में एक चीज़ और है, किसी न किसी चीज़ की खरीदारी करनी पड़ती है, एक दूसरे को कोई तोहफा देना पड़ता है। इसलिए ग़रीब आदमी के लिए त्यौहार एक परेशानी भी बन जाते हैं। वो न अपने बच्चों को अच्छे और नए कपड़े दिलवा सकता है और ना ही घर पर आई बहन-बेटी को कोई महंगा तोहफा (साड़ी, सूट, जेवर, नकदी आदि) दे सकता है। इसलिए गरीब आदमी त्यौहार के दिन नजदीक आते ही चिंताग्रस्त हो जाता है। उसकी चिंता को बढाने का काम दो तरह के लोग करते हैं, एक तो वे लोग जो शोपिंग के नाम पर खूब फिजूलखर्ची करते हैं और उसका अड़ौस-पड़ौस व रिश्तेदारों में भौंडा प्रदर्शन करते हैं। दूसरा घर परिवार की कुछ बहन-बेटियां।
यह बात आपको अजीब लगेगी, लेकिन यह सच है, आज अधिकतर घरों का हाल यह है कि बहन-बेटियां उन भाई-भाभियों को ज्यादा तवज्जोह देती हैं, जो सम्पन्न हों और उनकी मन मर्जी के उन्हें तोहफे देते हों। ऐसे घर बहुत कम मिलेंगे जहाँ गरीब भाई-भाभी को भी वही मान सम्मान एवं अपनापन मिलता है, जो सम्पन्न भाई-भाभी को मिलता है। जो ऐसे घर हैं वो मेरी नजर में तो वाकई तीर्थ स्थल जैसे हैं। दुनिया में सब कुछ पाया जा सकता है और इस सब कुछ पाने के पीछे इन्सान का मकसद खुशी पाना होता है, सुकून पाना होता है। लेकिन लोग दौलत के तराजू से रिश्तों को तौल कर जो खुशी और सुकून है वो भी उजाड़ देते हैं। जरा देखिए अपने परिवार में, अपने पड़ौस में, अपने रिश्तेदारों में कि मेरी लिखी यह लाइनें कितनी सही हैं ?
अब बात करें आने वाले इन दो त्यौहारों की। ईद उल अज़हा पैगम्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम (जिन पर ईश्वर की कृपा हो) की सुन्नत (तरीका) है और कुरबानी करने लायक हर मुसलमान के लिए यह जरूरी है कि वो किसी चौपाए हलाल जानवर की कुरबानी करे। कुरबानी (त्याग) का सिर्फ यही सन्देश नहीं है, बल्कि कुरबानी का यह सन्देश भी है कि इन्सान हर किस्म के त्याग के लिए तैयार हो, वो जुल्म, नाइन्साफी, गैर बराबरी वगैरह के खिलाफ़ आवाज़ बुलन्द करे, लगातार जद्दोजहद करे और इस जद्दोजहद में उसे हर चीज़ कुरबान करने के लिए तैयार होना चाहिए।
दूसरा त्यौहार आ रहा है रक्षाबंधन का। जो ईद उल अज़हा के एक दो दिन बाद है। भारतीय संस्कृति और परम्परा में इस त्यौहार की बहुत अहमियत है। हिन्दू भाई बहनों के लिए यह दिन बहुत खुशी का होता है। इसे राखी भी कहा जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के राखी बांधती हैं और भाई उन्हें तोहफे देते हैं। यह भाई बहन के प्यार एवं एक दूसरे के मान सम्मान का त्यौहार है।
त्यौहारों की बात पर एक चीज़ और बतानी जरूरी है। चाहे किसी भी समुदाय, संस्कृति और क्षेत्र का त्यौहार हो, हमें उसका पूरा सम्मान करना चाहिए, बधाई देनी चाहिए, अपनी हैसियत के मुताबिक एक दूसरे को तोहफे देने चाहिए, एक दूसरे के घर आना जाना चाहिए, इसी में सबकी खुशी है और यही त्यौहारों का मूल सन्देश भी है। एक दूसरे की परम्पराओं पर फब्तियां कसना, किसी के त्यौहार पर गलत कमेन्ट करना बहुत बुरी बात है। इससे नफरत पैदा होती है और त्यौहार का मूल मकसद यह भी है कि दुनिया से हर किस्म की नफरत का खात्मा हो। इसलिए त्यौहार को त्यौहार (खुशी) समझ कर मनाइए। सेवा, सहयोग त्याग, मान-सम्मान और सन्तोष (सब्र) का खास ध्यान रखिए, क्योंकि इनको जीवन में उतारे बगैर त्यौहार मनाना बेमानी है।
(24-07-2020)
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