गहलोत साहब आप श्रद्धांजलि और शुभकामना देने में भी भेदभाव क्यों करते हो ?

गहलोत साहब आप श्रद्धांजलि और शुभकामना देने में भी भेदभाव क्यों करते हो ?
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न आपने शहीद मोहसिन खान कायमखानी की शहादत पर दो शब्द लिखे और ना ही शहीद अब्दुल लतीफ़ काठात की शहादत पर और ना ही सीकर में बुजुर्ग मुस्लिम ऑटो चालक के साथ हुई मारपीट पर, ऐसा भेदभाव क्यों, जबकि आप मुख्यमंत्री हैं ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। अशोक गहलोत साहब इस लेख के साथ आपके फेसबुक पेज की कुछ स्क्रीन शाॅट भी हैं, जो 31 जुलाई से 9 अगस्त तक के हैं। यह इसलिए कि आपके फेसबुक पेज पर शहीद की शहादत पर दो शब्द लिखने की जगह कम पड़ गई और सीकर में बुजुर्ग मुस्लिम ऑटो चालक के साथ हुई मारपीट पर निन्दा शब्द लिखने की आपको फुरसत ही नहीं मिली। वैसे आप जैसे 24 घण्टे सक्रिय रहने वाले और हर बात को देख परख कर निर्णय करने वाले व्यक्ति से यह उम्मीद तो की नहीं जा सकती कि आपके फेसबुक पेज को आपकी सहमति बगैर कोई और हैंडल कर रहा है ? फिर यह भेदभाव क्यों ?



अब हम आपको उक्त तीनों वाकिये बताते हैं, जिनका जिक्र शीर्षक में किया गया है। पहला वाकिया 31 जुलाई का है। इस दिन झुन्झुनूं जिले के कोलिंडा गांव का एक 22 वर्षीय सैनिक मोहसिन खान कायमखानी जम्मू-कश्मीर में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। लेकिन आपने इस शहादत पर दो शब्द भी नहीं लिखे। इतना ही नहीं एक अगस्त को इस शहीद की आखरी विदाई व सुपुर्द ए खाक में कोई भी जिलाधिकारी भी नहीं पहुंचा।



दूसरा वाकिया 7 अगस्त को सीकर में हुआ। इस दिन तड़के एक बुजुर्ग ऑटो चालक गफ्फार अहमद कच्छावा के साथ मारपीट की गई और मारपीट करने वालों ने इस बुजुर्ग को साम्प्रदायिक एवं धर्म विशेष के नारे लगाने के लिए मजबूर किया, जैसा कि एफआईआर में इस ऑटो चालक ने बताया है। हालांकि पुलिस की तत्परता से उसी दिन दो मुलजिम गिरफ्तार कर लिए गए। इस शर्मनाक वाकिये की देशभर में निन्दा की गई, लेकिन आपका इस पर मुंह नहीं खुला, जबकि आप सूबे के मुखिया हैं। यही नहीं स्थानीय कांग्रेसी विधायकों ने भी अपने मुंह में दही जमाए रखा और पड़ौस की सीट लक्ष्मणगढ़ से विधायक एवं पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी खामोश रहे। शायद इसलिए कि जब आप ही खामोश रहे तो इन्होंने भी इस साम्प्रदायिक घटना की निन्दा करना फायदेमंद नहीं माना। यह सब तब हुआ जब आप अपने आपको 36 कौमों का नेता बताते हो।





तीसरा वाकिया 8 अगस्त का है। इस दिन ब्यावर के पास धोलीघाटी गांव के निवासी और जम्मू-कश्मीर में तैनात अब्दुल लतीफ़ काठात शहीद हो गए। उन्होंने इस दिन शाम को देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण देश पर न्यौछावर कर दिए। लेकिन आपको शहीद के सम्मान में श्रद्धांजलि देने वाले दो शब्द नहीं मिले या आपने इस वाकिये पर भी कुछ लिखना मुनासिब नहीं समझा।





इन 10 दिनों में आपने अपने फेसबुक पेज पर सरकारी मीटिंग, आदेश, राजनीतिक उठा पटक और सरकार बचाने के प्रयास, श्रद्धांजलि, शुभकामनाएं, कोरोना पीड़ित नेताओं के लिए प्रार्थना आदि बहुत कुछ लिखा है। लेकिन उक्त तीन वाकियों पर एक शब्द भी नहीं लिखा, क्यों ? क्या इसलिए कि तीनों वाकिये मुसलमानों से सम्बंधित थे ? यहाँ आप गलत हैं, क्योंकि तीनों ही वाकिये मुसलमानों से सम्बंधित नहीं थे। दो वाकिये देश के लिए अपनी जान कुरबान करने वाले शहीद सैनिकों के थे, लेकिन आपको इस शहादत के सम्मान में दो शब्द भी नहीं मिले। तीसरा वाकिया दिखने में जरूर मुसलमानों का लग रहा है, क्योंकि पीड़ित ऑटो चालक मुसलमान है। लेकिन शासक का यह धर्म होता है कि वो हर पीड़ित के पक्ष में खड़ा हो। परन्तु सच का एक पहलू यह भी है कि आपने व आपके फेसबुक हैंडलर ने इन तीनों वाकियों को कोई तवज्जोह इसलिए नहीं दी, क्योंकि तीनों में नाम तो मुसलमानों के ही लिखे जाते ?




गहलोत साहब यह सब आपने तब किया है, जब आप खुद और आपके खासमखास एक दर्जन विधायक मुस्लिम बाहुल्य सीटों से चुनाव जीतकर आते हैं। लेकिन आपको यह भी अच्छी तरह से पता है कि मुसलमान एक गुलाम कौम है, इसे कोई ठौर ठिकाना नहीं है, यह झक मार कर और अपमान सहकर भी मुझे और कांग्रेस को वोट देंगे, क्योंकि यह भाजपा को तो वोट दे नहीं सकते और दूसरी कोई मजबूत पार्टी राजस्थान में है नहीं !

अन्त में पाठकों से निवेदन कि यहाँ गहलोत साहब के फेसबुक पेज के उक्त 10 दिनों के कुछ स्क्रीन शाॅट अटैच किए गए हैं, उन्हें गौर से पढ़िए और फिर हिम्मत व हौसला हो तो गहलोत साहब से या इनके किसी खासमखास से सवाल कीजिए, वरना अपमान का यह घूंट आगे भी पीने के लिए तैयार रहिए, यही आपकी किस्मत है ! 
(09-08-2020)

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