मास्टर अजीज साहब : यकीन नहीं हो रहा है कि आप दुनिया छोड़कर चले गए ?
मास्टर अजीज साहब : यकीन नहीं हो रहा है कि आप दुनिया छोड़कर चले गए ?
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तीन दिन हो गए दिल ही नहीं करता कुछ लिखें, क्योंकि सदमा भी इतना दर्दनाक था, जिसकी कभी तवक्को (कल्पना) भी नहीं की थी। मास्टर अजीज साहब (अजीजुर्रहमान जोधपुर) के इन्तकाल की खबर और वो भी मेरे द्वारा किए गए फोन पर उनकी बच्ची ने दी, सुनते ही मानों ज़मीन हिल गई हो। मैंने फोन मिलाकर ज्यों ही यह कहा कि कहाँ हो और क्या कर रहे हो ? तो सुबकते हुए उनकी बच्ची और हमारी लाडली भतीजी बुशरा ने कहा कि "अंकल पापा का इन्तकाल हो गया।" मैंने सोचा किसी और के इन्तकाल के बारे में कह रही है, तो दोबारा पूछा किसका इन्तकाल हो गया, तो कहा "मेरे पापा का" बस इस जुमले ने मानों अन्दर से तोड़ दिया। क्योंकि अजीज साहब पूरी तरह से तंदरुस्त थे और मुझसे सालभर छोटे थे। यानी 44 साल के भी नहीं हुए थे।
हम दोनों में इतनी मुहब्बत थी कि दिल की हर बात करते थे, वे मेरे छोटे भाई की तरह थे और हर बात को गौर से सुनते थे और कुछ भी कह दो तो नाराज नहीं होते थे। हंसमुख और मिलनसार शख्सियत के धनी अजीज साहब बस व ट्रेन में सफर करते तो रास्ते में ही किसी से भी दोस्ती व जान पहचान कर लेते थे और उसकी किसी भी परेशानी को अपनी परेशानी समझकर हल करने के लिए कहीं से कहीं पहुंच जाते थे। वर्तमान में वे मकराना के पास गांव की सरकारी स्कूल में कार्यरत थे। उनसे दोस्ती मेरी बेबाक कलम की वजह से हुई और ऐसी दोस्ती हुई, जिसको यहाँ लफ्ज़ों में बयान करना आसान नहीं है। इस दोस्ती की वजह से उनका पूरा परिवार एक तरह से मेरे परिवार का दोस्त बन गया। उनकी बीवी और मेरी बीवी की गहरी दोस्ती है और दोनों के बच्चों में भी भाई बहनों जैसा गहरा लगाव है।
उनका बीपी कुछ डाउन था और यह एक आम सी बात है, 19 अगस्त की रात को वे खाना खाकर दवा लेकर सो गए और पास में सो रहे घर वालों को पता ही नहीं चला कि कब वे दुनिया से रुख़सत हो गए। सुबह 20 अगस्त को उन्हें जगाया तो वे दुनिया छोड़कर हमेशा के लिए जा चुके थे। साइलेंट अटैक से मौत ने उन्हें हमेशा के लिए हम से जुदा कर दिया। उन्हें 20 अगस्त को टोंक में सुपुर्द ए खाक कर दिया गया। मुझे आज तक किसी के इन्तकाल पर इतना सदमा नहीं हुआ, जितना अजीज साहब के इन्तकाल पर हुआ है। मुझे ही नहीं बल्कि मेरे पूरे परिवार को यकीन नहीं हो रहा है कि वे दुनिया से चले गए। रोज जल्दी उठना ड्यूटी जाना, फिर देर से लौटना और किसी भी वक्त कोई काम कहो तो उसी वक्त तैयार रहना और चलते रास्ते दोस्ती करना और हर किसी की जमकर मेहमान नवाज़ी करना, यह उनकी पहचान थी और ऐसे लोग मैंने तो बहुत कम देखे हैं।
15 साल की उनकी दोस्ती के अजीब-अजीब किस्से हैं, जो मुझे पूरी जिन्दगी याद रहेंगे। जिनमें से तीन यहाँ शेयर कर रहा हूँ। एक बार मैं जोधपुर गया, मैंने उनको फोन किया, तब वे नागौर के पास सर्विस करते थे। उन्होंने कहा, "भाईजान आप रूको, अभी मैं आ रहा हूँ।" जैसे वे जोधपुर में ही हों, मैंने कहा आप तो नागौर हैं अभी कैसे आएंगे ? जवाब दिया, यह लो अभी रवाना हो रहा हूँ और बस पकड़ कर जोधपुर के लिए रवाना हो गए। मेरा उनसे मिलने का कोई इरादा नहीं था, क्योंकि मुझे मालूम था कि वे नागौर हैं। बस में बैठने के बाद उन्होंने हर दस-पन्द्रह मिनट बाद मुझे फोन किया, "बस भाईजान आ गया, पास में ही हूँ।" ऐसे जुमले बोलते हुए वे चार घण्टे बाद जोधपुर पहुंच गए। यह मुहब्बत थी उनकी।
जब उनकी डीडवाना के पास पोस्टिंग थी, तो एक दिन उनका फोन आया, "भाईजान कहाँ हो ?" मैंने कहा जयपुर में। उन्होंने फिर पूछा जयपुर में कहाँ हो ? तो मैंने जवाब दिया सिन्धी कैम्प के पास एक होटल में हूँ, कोई गेस्ट आया हुआ है। उन्होंने कहा, "वहीं रुकना, मैं अभी आ रहा हूँ।" वे तब किशनगढ़ (अजमेर) थे। वे जब सिन्धी कैम्प पहुंचे, तब रात के 10 बज चुके थे, पता नहीं और कहाँ-कहाँ घूम कर आए थे। उनके हाथ में किशनगढ़ की मशहूर रबड़ी का डिब्बा था और गर्मी का मौसम था। उन्होंने कहा इसको अभी खानी पड़ेगी, नहीं खराब हो जाएगी। उन्हें टोंक जाना था। मैंने कहा पहले घर चलते हैं अब देर हो चुकी है, टोंक सुबह जाना। हम घर आ गए और देर तक बातें करते हुए सो गए। वे सुबह इतनी जल्दी उठे और खामोशी से नहा धोकर निकल गए कि हमें पता ही नहीं चला और जब फोन किया तो मालूम चला कि टोंक के नजदीक पहुंच गए।
एक दिन वे ड्यूटी के लिए सुबह टिफ़िन पैक करवा कर घर से निकले और रास्ते में मालूम चला किसी वजह से आज छुट्टी है, तो वापस अपने घर जाने की बजाए सुबह-सुबह हमारे घर आ गए और टिफ़िन खोलकर खाना खाने लग गए। हमने पूछा यह क्या मामला है ? कहा अब छुट्टी तो हो ही गई, तो लंच वापस घर ले जाना सही नहीं है, यहीं अभी खा लेता हूँ। जब दोपहर बाद खुद के घर पहुंचे, तो हम साथ थे। उनकी बीवी ने कहा आज बहुत जल्दी आ गए ? मैंने कहा, गए कहाँ थे ? आज तो छुट्टी थी और लंच बाॅक्स सुबह-सुबह हमारे यहाँ बैठकर खा लिया था, यह सुनते ही सब हंसने लग गए।
कहीं जाएं वहाँ कपड़े भूल जाना, रास्ते में बेग भूल जाना, यहाँ तक कि बनियान पहनकर शर्ट पहनना भूल जाना और जल्दबाजी में बिना कंघा किए घर से चल देना, बाइक चलाते हुए नीन्द की झपकी ले लेना, हर बात पर हंसते हुए यह कहना "या अल्लाह", यह उनकी अजीबोगरीब निशानियां थीं, जो अब हमेशा यादों में रहेंगी।
अल्लाह से दुआ है कि वो अपने तमाम नबियों, वलियों और महबूब बन्दों के सदके व तुफैल में मास्टर अजीज साहब की मग्फिरत करे और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता करे और उनके बच्चों को कामयाब बनाए और उनकी हर जायज तमन्ना पूरी करे, आमीन। (22-08-2020)
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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।

aameen
ReplyDeleteAamen
ReplyDeleteAamin
ReplyDeleteBhai sab rula diya aapne to aapne jo kuch bayan kiya hai wo sab hamare sath bhi hota tha itna lagao tha han se ke bayan nahi kar sakte hame bhi yakeen nahi hua jb unki sali ne call kiya to allah pak unhen apne habeeb ke sdqe zannat Naseeb kare aameen
M.N.khan (bushra/aman ka urdu teacher)
Very impressive.
ReplyDeleteAlla tala se dua he ki in ko jannat me ala se ala mukam ata kare aameen summa ameen
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