मदरसा बोर्ड एक्ट के नाम पर गहलोत सरकार का मदरसों व पैराटीचर्स के साथ एक नया फरेब ?
मदरसा बोर्ड एक्ट के नाम पर गहलोत सरकार का मदरसों व पैराटीचर्स के साथ एक नया फरेब ?
--------------------------------------------------
--------------------------------------------------
यह एक्ट मदरसों के कयाम के मकसद और उनकी रूह को खत्म कर देगा। इसके बावजूद बहुत से मुस्लिम रहनुमा और तन्जीमें इस एक्ट का स्वागत कर रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि कुछ मजहबी रहनुमाओं ने भी मुख्यमंत्री गहलोत को मुबारकबाद दी है। जिन मजहबी रहनुमाओं की यह जिम्मेदारी थी कि वे मदरसों की हिफाज़त करें, वे आज एक अदद राजनीतिक नियुक्ति और अपने छोटे मोटे मफाद के लिए उस मदरसा बोर्ड एक्ट की हिमायत कर रहे हैं, जो आगे चलकर मदरसों को बरबाद कर देगा।
-----------------------------------------------------
मिल्ली काॅन्सिल, दावते इस्लामी, एसडीपीआई जैसे संगठनों ने इस एक्ट का स्वागत किया है, वहीं यह लेख लिखे जाने तक जमीअत उलमा ए हिन्द, जमाअत ए इस्लामी हिन्द, पाॅपुलर फ्रंट और तब्लीगी जमाअत जैसे संगठनों ने अपना कोई भी बयान जारी नहीं किया है।
-----------------------------------------------------
यह एक्ट कमोबेश भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार के मदरसा बोर्ड एक्ट की काॅपी पेस्ट है, जो 2018 में विधानसभा में पेश किया गया था। जो एक्ट गहलोत सरकार ने बनाया है, वैसा भाजपा सरकार बना देती, तो मुस्लिम रहनुमा सड़कों पर उतर जाते। लेकिन आज खामोश हैं, क्योंकि गहलोत अपने हैं और कांग्रेस अपनी माई बाप है।
***********************************
जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान सरकार ने मुस्लिम क़ौम की बरसों पुरानी मांग को पूरी करते हुए 24 अगस्त को मदरसा बोर्ड एक्ट विधानसभा में पास कर दिया। एक्ट के पास होते ही समाजी, सियासी और मजहबी मुस्लिम रहनुमाओं में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बधाई देने और एक्ट का स्वागत करने की सोशल मीडिया पर होड़ मच गई। लेकिन जब हमने सोशल मीडिया के जरिए सवाल किए, तो इनमें बहुत से रहनुमा जवाब भी नहीं दे पाए। जिसकी वजह यह रही कि या तो इन्होंने बिना एक्ट को पढे ही बधाई दे दी या फिर इन्होंने जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।
हम इस स्टोरी में पाॅइन्ट टू पाॅइन्ट आते हैं और आप भी इसे पूरी पढिए ताकि मामला पूरी तरह से समझ में आ जाए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पहले कार्यकाल में वक्फ बोर्ड के मातहत 2001 में मदरसा पैराटीचर्स की भर्ती की और 2003 में कार्यकाल के समापन से कुछ महीने पहले बिना किसी एक्ट के साधारण सरकारी आदेश से राजस्थान मदरसा बोर्ड का गठन कर दिया। बिना किसी विशेष सुविधाओं और मामूली मानदेय में सरकारी मदरसों में पढाने वाले यह पैराटीचर्स मदरसों व खुद की बदहाली का तमाशा देखते रहे। शोषण की चक्की में पिसे जा रहे पैराटीचर्स ने काफी आन्दोलन किए, वसुंधरा राजे ने अपने पहले कार्यकाल में प्रबोधक के नाम पर बहुत से शुरूआती पैराटीचर्स को नियमित कर दिया था। लेकिन उसके बाद एक भी पैराटीचर्स को नियमित नहीं किया गया।
इन्हें नियमित करने का वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत दोनों ने वादा किया और चुनावी घोषणा पत्र में भी यह मुद्दा शामिल किया। लेकिन नियमित किसी को नहीं किया। हम मदरसों और पैराटीचर्स के हक में शुरूआत से ही चार मुख्य मांग कर रहे थे। पहली समस्त पैराटीचर्स को नियमित किया जाए। दूसरी किसी वजह से नियमित नहीं किया जाए, तो तृतीय श्रेणी अध्यापक के बराबर इन्हें तनख्वाह दी जाए (सुप्रीम कोर्ट के समान कार्य समान वेतन के आदेश के तहत), तीसरी मांग मदरसा बोर्ड का एक्ट (कायदा क़ानून) बनाया जाए और चौथी मांग जिन मदरसों के पास भवन नहीं है, उन्हें भूमि आवंटित की जाए एवं भवन निर्माण में आर्थिक सहायता दी जाए।
इन चार मांगों में से एक्ट बनाने की मांग पूरी हुई 20 साल बाद, लेकिन जो एक्ट बनाया वो ऐसा पंगु और पूरी तरह से मुख्यमंत्री के मातहत वाला बना दिया, जिससे न मदरसों का कोई भला होगा और ना ही पैराटीचर्स का। इसलिए जिस दिन एक्ट बना था, उसी दिन सबसे पहले हमने इसका विरोध किया था, उसके बाद बहुत से लोगों ने मुंह खोलने शुरू कर दिए। हालांकि इस मदरसा विरोधी एक्ट की मुखालफत करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मुस्लिम मजहबी रहनुमाओं, इदारों और तन्जीमों (संगठनों) की थी, जो उन्होंने यह लेख लिखे जाने तक निभाने में पूरी तरह से कोताही बरती है।
यह एक्ट कमोबेश भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार द्वारा तैयार किए गए मदरसा बोर्ड एक्ट की काॅपी पेस्ट है, जो 7 सितम्बर 2018 को विधानसभा में पेश किया गया था। कांग्रेस की गहलोत सरकार ने जो मदरसा बोर्ड एक्ट बनाया है, वैसा अगर भाजपा सरकार बना देती, तो मुस्लिम रहनुमा सड़कों पर आ जाते और उन्हें आना भी चाहिए। लेकिन आज खामोश हैं, क्योंकि यह एक्ट गहलोत ने बनाया है, जो अपने हैं और कांग्रेस तो इन रहनुमाओं की नज़र में एक तरह की अपनी (मुस्लिम क़ौम की) माई बाप समझी जाती है, इसलिए मुंह कैसे खोला जाए ?
24 अगस्त को मदरसा बोर्ड एक्ट विधानसभा में पास होते ही मुस्लिम रहनुमाओं ने सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और अल्पसंख्यक मामलात विभाग के कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद को बधाई देनी शुरू कर दी। कुछ ने मिलकर भी मुबारकबाद दी। जिनमें मिल्ली काॅन्सिल के एडवोकेट अब्दुल कय्यूम अख्तर, अब्दुल लतीफ़ आरको, शौकत कुरैशी, दावते इस्लामी के मौलाना सय्यद कादरी, मुफ्ती अय्यूब मिस्बाही, मदरसा बोर्ड के पूर्व चेयरमैन मौलाना फजले हक, जामा मस्जिद जयपुर के पूर्व सचिव अनवर शाह वगैरह प्रमुख हैं। बाकी बहुत से कतार में हैं जिनकी मुख्यमंत्री कार्यालय के कुछ कर्मचारियों के कोराना होने की वजह से मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं हो पाई है।
एसडीपीआई जैसी एकमात्र मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टी ने भी इस एक्ट का स्वागत किया है। वहीं यह लेख लिखे जाने तक जमीअत उलमा ए हिन्द, जमाअत ए इस्लामी हिन्द, पाॅपुलर फ्रंट और तब्लीगी जमाअत जैसे संगठनों ने अपना कोई भी बयान जारी नहीं किया है। अगर किया है तो वो हमारे पास नहीं आया है। सबसे हैरानी वाली बात जमीअत उलमा ए हिन्द को लेकर भी है, जो शुरू से ही मदरसा बोर्ड एक्ट के खिलाफ़ है, लेकिन पता नहीं एक्ट बनने के बाद वो खामोश क्यों है ? यही हाल जमाअत ए इस्लामी हिन्द और पाॅपुलर फ्रंट का है, जो हर मुस्लिम मुद्दे पर बयान देते हैं, लेकिन मदरसा बोर्ड एक्ट के मुद्दे पर यह चुप हैं। जहाँ तक तब्लीगी जमाअत का सवाल है, तो यह एक मजहबी तन्जीम है और कभी भी किसी मुद्दे पर कोई बयानबाज़ी नहीं करती है, लेकिन चूंकि यह मुद्दा मदरसों का है और बहुत से मदरसे मस्जिदों के मातहत चलते हैं तथा मदरसों व मस्जिदों में तब्लीगी जमाअत का अच्छा खासा काम है, जो इस नए एक्ट से देर सवेर प्रभावित होना तय है।
अब सवाल यह है कि मुस्लिम तन्जीमें, इदारे और रहनुमा खामोश क्यों हैं ? इसमें दो बातें सामने आई हैं। पहली तो यह है कि सरकार कांग्रेस की है और इसके मुखिया अशोक गहलोत हैं। इसलिए बहुत से मुस्लिम रहनुमा कांग्रेस और गहलोत के खिलाफ़ मुंह खोलना मौजूदा हालात में सही नहीं समझते हैं। दूसरी बात यह है कि एक अदद राजनीतिक नियुक्ति के इन्तजार में जो रहनुमा खड़े हैं, वो मुंह खोलना अपनी किस्मत के ठोकर मारना समझ रहे हैं। जो मुसलमान सियासी तौर पर कांग्रेस से जुड़े हुए हैं, उन बेचारों की तो कोई बड़ी गलती है ही नहीं, क्योंकि जाहिर सी बात है कि उन्हें पार्टी में रहना या कुछ पद वद लेना है, तो पार्टी व सरकार के हर फैसले की वाहवाही करनी ही पड़ेगी।
ऐसा नहीं है कि यह एक्ट बिना मुस्लिम विधायकों की मौजूदगी में बन गया। विधानसभा में 9 मुस्लिम विधायक हैं और यह सभी सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के हैं और इनमें से सालेह मोहम्मद अल्पसंख्यक मामलात विभाग के कैबिनेट मंत्री हैं। अगर यह लोग चाहते तो इस एक्ट में बहुत कुछ बदला जा सकता था, जिससे मदरसों और पैराटीचर्स का भला हो सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अब इनकी क्या मजबूरी थी वो तो यही जाने ?
अब इस एक्ट के मुख्य मुद्दों की बात करते हैं, जो आगे चलकर मदरसों और यहाँ कार्यरत पैराटीचर्स के लिए नुकसानदेह साबित होंगे। पहली बात तो यह है कि सरकार को मदरसा बोर्ड एक्ट के जरिए मदरसा बोर्ड को एक ऑटोनोमस (खुदमुख्तार) बाॅडी बनाना चाहिए था, ताकि बोर्ड मदरसों, मदरसा तालीम और पैराटीचर्स के हक में बेहतर तरीके से काम करता। लेकिन इस एक्ट के जरिए गहलोत सरकार ने मदरसा बोर्ड को पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में दे दिया है, वो भी अकेले मुख्यमंत्री के। यानी बोर्ड कोई भी ऐसा फैसला नहीं ले सकता, जो मुख्यमंत्री को पसंद नहीं हो। अगर कल को कोई ऐसा व्यक्ति मुख्यमंत्री बन जाए, जो मदरसों और मदरसा तालीम के खिलाफ़ हो, तब इस एक्ट के जरिए वो मुख्यमंत्री मदरसों के कयाम के मकसद को पूरी तरह से बरबाद कर देगा।
दूसरी बात यह है कि मदरसा बोर्ड एक्ट में मदरसा बोर्ड गठन की प्रक्रिया का जो अध्याय है, उसमें लिखा हुआ है कि बोर्ड में एक चेयरमैन (अध्यक्ष) होगा और उसकी नियुक्ति राज्य सरकार करेगी, जो विख्यात शिक्षाविद या कोई ख्यातिप्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता होगा। यानी इसका सीधा सा मतलब यह है कि चेयरमैन के पद पर मुख्यमंत्री अपने किसी चहेते को नियुक्त करेंगे। इसमें विख्यात शिक्षाविद की बात तो सही है, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता वाली बात बहुत गलत है। वो इसलिए कि शिक्षाविद तो चाहे कैसा भी हो उससे भले की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता के नाम पर जो भी राजनीतिक नियुक्ति होती है, उसमें अमूमन यह देखा गया है कि मुख्यमंत्री का कोई ऐरा गैरा चेला जिसका सामाजिक कार्यों से कोई विशेष सरोकार नहीं होता है, उसे सामाजिक कार्यकर्ता कोटे से नियुक्ति दे दी जाती है।
पूर्व में ऐसा बहुत सी बार हुआ है और ऐसे तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता वाले चेयरमैनों ने अपने बोर्डों का बेड़ागरक करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। जब मदरसा बोर्ड शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाला इदारा है तो फिर यहाँ चेयरमैन सिर्फ और सिर्फ शिक्षाविद को ही बनाया जाए और वो भी ऐसा जिसे उर्दू व अरबी ज़बान की अच्छी मालूमात हो। इसलिए इस एक्ट में फ़ौरन यह संशोधन किया जाए कि मदरसा बोर्ड का चेयरमैन सिर्फ शिक्षाविद होगा और वो भी उर्दू व अरबी ज़बान का अच्छा जानकार तथा चेयरमैन का पद मनोनीत की बजाए बोर्ड सदस्यों द्वारा निर्वाचित होगा।
तीसरी बात यह है कि इस एक्ट में तय किया गया है कि मदरसा बोर्ड में विभिन्न विभागों जैसे अल्पसंख्यक मामलात, वित्त, स्कूल शिक्षा, समाज कल्याण, कार्मिक आदि के 9 उच्चाधिकारी (प्रभारी सचिव) पदेन सदस्य होंगे। अब जाहिर सी बात है कि यह अधिकारी आईएएस और आरएएस होंगे तथा इनमें बहुतों को उर्दू, अरबी, मदरसा तालीम, मदरसों के कयाम के मकसद और मदरसों के इतिहास की कोई जानकारी नहीं होगी। बोर्ड में एक तरह का इनका वर्चस्व रहेगा, क्योंकि बाकी 11 सदस्य मनोनीत होंगे और उनमें भी 6 मदरसा इन्तजामिया कमेटियों के सदर और 4 सामाजिक कार्यकर्ता। इसलिए इन अधिकारियों से मदरसा बोर्ड का पदेन सदस्य होने के नाते यह उम्मीद करना कि इनसे मदरसों और पैराटीचर्स का भला होगा, बात गले नहीं उतरती है। यह सब लोग मदरसा बोर्ड संचालन के बहाने मदरसों के वजूद और कयाम के मकसद को ही खत्म कर देंगे।
इस एक्ट के सन्दर्भ में चौथी बात यह है कि इसमें 6 सदस्य जो मदरसा इन्तजामिया कमेटियों के सदर की हैसियत से मनोनीत किए जाएंगे, उनकी संख्या ज्यादा होने और मफाद एक जैसा होने की वजह से यह लोग बोर्ड में ज्यादातर वो प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश करेंगे, जिससे इनके मदरसे या इनके चहेते मदरसों का फायदा हो। यह बात तय है कि यह 6 सदस्य भी सत्ताधारी पार्टी और मुख्यमंत्री के नजदीकी होंगे और इनकी राय व कोशिश मदरसा पैराटीचर्स को बोर्ड की बजाए मदरसा इन्तजामिया कमेटियों के नियन्त्रण में लेने की रहेगी, जिससे पैराटीचर्स का नुकसान होना तय है।
पहले भी मदरसा इन्तजामिया कमेटियों के जिम्मेदारान ने मुख्यमंत्री गहलोत से दूसरे कार्यकाल में अपनी यह मांग मनवा ली थी कि पैराटीचर्स का मानदेय मदरसों के खाते में आना चाहिए। तब छठे चरण के पैराटीचर्स की जो भर्ती हुई थी, उसमें यह प्रावधान कर दिया गया था, जिससे पैराटीचर्स बहुत परेशान हुए थे और बहुत सी मदरसा इन्तजामिया कमेटियों ने उनका शोषण करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। हालांकि चार पांच साल की जद्दोजहद के बाद इन पैराटीचर्स का मानदेय अब इनके खाते में आ रहा है। लेकिन इसकी पूरी सम्भावना है कि भविष्य में इस एक्ट के तहत गठित बोर्ड में सभी पैराटीचर्स का मानदेय उनकी बजाए मदरसा इन्तजामिया कमेटियों के खाते में आएगा, जिससे पैराटीचर्स शोषण की दोहरी चक्की में पिसे जाएंगे।
पांचवीं बात यह है कि एक्ट के मुताबिक 4 सदस्य सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मनोनीत होंगे और एक सदस्य राजस्थान के किसी विश्वविद्यालय के उर्दू, अरबी, फारसी अध्यापन संकाय का होगा। यानी यह एक सदस्य उर्दू, अरबी, फारसी का जानकार होगा, जो अच्छी बात है, लेकिन बाकी सभी सदस्य ऐसे भी हो सकते हैं जिनको उर्दू, अरबी, फारसी ज़बान की नाॅलेज नहीं हो। तब ऐसे एक्ट और बोर्ड से मदरसों के भले की उम्मीद करना बेवकूफी नहीं तो और क्या है ? क्योंकि उर्दू, अरबी, फारसी तो मदरसों की रूह (आत्मा) हैं। जो 4 सदस्य सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मनोनीत किए जाएंगे, वे भी जाहिर है मुख्यमंत्री के चहेते चेले होंगे, चाहे मुख्यमंत्री कोई भी हो और किसी भी पार्टी का हो। तब आप सोच सकते हैं कि इस एक्ट के तहत गठित बोर्ड से मदरसों और पैराटीचर्स का कितना भला होगा ?
छठी बात यह है कि मदरसा बोर्ड एक्ट में एक सलाहकार समिति के गठन का प्रावधान किया गया है। जो मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित की जाएगी और अल्पसंख्यक मामलात मन्त्री इस समिति के पदेन उपाध्यक्ष होंगे। इस समिति में सात पदेन सदस्य होंगे, जो विभिन्न विभागों के मन्त्री, वक्फ बोर्ड, मदरसा बोर्ड व राज्य अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन होंगे। इसमें एक सदस्य सचिव भी होंगे, जो अल्पसंख्यक मामलात विभाग के प्रभारी सचिव होंगे। एक्ट कह रहा है कि यह सलाहकार समिति मदरसा बोर्ड को सलाह देगी और बोर्ड के कार्य सम्पादन का समय समय पर पुनर्विलोकन करेगी।
यानी इस सलाहकार समिति की किसी भी सलाह को मदरसा बोर्ड नजरअंदाज नहीं कर सकेगा, क्योंकि बोर्ड पूरी तरह से मुख्यमंत्री के नियन्त्रण में होगा और बोर्ड चेयरमैन सहित सभी सदस्यों की नियुक्ति भी मुख्यमंत्री की मर्जी से ही होगी। इस प्रकार इस एक्ट के तहत गठित बोर्ड पूरी तरह से वो काम करेगा, जो मुख्यमंत्री चाहेगा। अगर कोई सदस्य या चेयरमैन मुख्यमंत्री की मर्जी के हिसाब से काम नहीं करेगा या मुख्यमंत्री की मर्जी को नजरअंदाज करेगा, तो उसे हटा दिया जाएगा, क्योंकि यह सभी मनोनीत होंगे और इस एक्ट के मुताबिक इन्हें हटाना बहुत आसान है। इसलिए बोर्ड चेयरमैन और सभी सदस्य यहाँ मदरसों व पैराटीचर्स के फेवर में निर्णय लेने की बजाए, सर्व सहमति से वो निर्णय लेंगे, जो मुख्यमंत्री को पसंद हो। अब कल को कोई ऐसा व्यक्ति मुख्यमंत्री बन गया, जो मदरसों के वजूद के खिलाफ़ हो, तो अपने चेलों को मदरसा बोर्ड में बैठाकर उनके हाथ से मदरसों को पूरी तरह से बरबाद कर देगा।
अब सवाल यह उठता है कि इस एक्ट में क्या संशोधन किया जाए ? पहला संशोधन तो यह हो कि मदरसा बोर्ड को पूरी तरह से ऑटोनोमस (खुदमुख्तार) बाॅडी बनाया जाए। दूसरा संशोधन यह हो कि चेयरमैन और सभी सदस्यों को मनोनीत करने के बजाए निर्वाचित किया जाए। तीसरा संशोधन यह हो कि निर्वाचन के लिए सभी रजिस्टर्ड मदरसों की इन्तजामिया कमेटियों (प्रबन्ध समितियों) से एक एक प्रतिनिधि लेकर वोटर लिस्ट तैयार की जाए और कम से कम 11 सदस्यों का चुनाव हो। यह 11 सदस्य चुनने के लिए यह प्रावधान किया जाए कि यह सभी कम से कम ग्रेजुएट डिग्रीधारी हों और इन्हें हिन्दी, उर्दू व अंग्रेजी ज़बान की अच्छी जानकारी हो और शिक्षण संस्थान संचालित करने या अध्यापन का कम से कम पांच साल का अनुभव हो।
चौथा संशोधन यह हो कि शेष 10 सदस्यों को राज्य सरकार मनोनीत करे। जिनमें दो उर्दू, अरबी, फारसी के लेक्चर्र या प्रोफेसर, दो आलिम (एक सुन्नी और एक शिया), एक विधायक, एक सीनियर एडवोकेट, एक कम्प्यूटर व टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट, दो आरएएस अधिकारी, एक सामाजिक कार्यकर्ता आदि। पांचवां संशोधन यह हो कि पदेन सदस्य और सलाहकार समिति का प्रावधान पूरी तरह से खत्म किया जाए। छठा संशोधन यह हो कि इन 21 सदस्यों में चुनाव के जरिए चेयरमैन बनाया जाए और सातवां संशोधन यह हो कि चेयरमैन, सचिव और सभी सदस्य मुस्लिम होंगे तथा बोर्ड का कार्यकाल पांच साल का होगा।
इन संशोधनों से बने एक्ट द्वारा गठित ऑटोनोमस बाॅडी वाले मदरसा बोर्ड से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो मदरसा तालीम, पैराटीचर्स के अधिकारों और मदरसों के कयाम के मकसद की पूरी तरह से हिफाज़त करेगा। सरकार चाहे अशोक गहलोत की हो या वसुंधरा राजे की, दोनों ने मदरसों को वैकल्पिक शिक्षा केन्द्र बनाने और उर्दू, अरबी, फारसी व इस्लामी तालीम के साथ आधुनिक स्कूली शिक्षा व कम्प्यूटर शिक्षा देने की कई बार घोषणा की है, लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि यह घोषणाएं सिर्फ कागजी साबित हुई हैं और सरकारी मदरसों का हाल बहुत बुरा है। जिसकी वजह यह है कि इन मदरसों के पास भवन, पाठ्य सामग्री और प्रयाप्त संख्या में टीचर नहीं हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वो सभी पैराटीचर्स को नियमित करे और नियमित नहीं कर सके तो तृतीय श्रेणी अध्यापक के बराबर इन्हें तनख्वाह दे और सभी मदरसों को भूमि आवंटित करे व भवन निर्माण में आर्थिक सहायता दे एवं आवश्यकता के अनुसार यहाँ टीचरों की संख्या बढाए, ताकि मदरसों और यहाँ पढने वाले बच्चों का विकास हो सके।
लेकिन यह कौन करेगा ? जवाब है सरकार। और सरकार की नीयत इस एक्ट देखकर साफ जाहिर हो रही है कि उसकी नीयत में खोट है। यह मांग कौन करेगा और सरकार पर दबाव कौन बनाएगा ? जवाब है समाजी, सियासी और मजहबी मुस्लिम रहनुमा। लेकिन जब यह सब रहनुमा इस पंगु और मदरसों को खत्म करने वाले एक्ट पर झुक झुक कर मुख्यमंत्री को बधाई देंगे या खामोश रहेंगे, तो मदरसों व पैराटीचर्स का भला कैसे होगा ? यह एक्ट गहलोत सरकार का मदरसों और पैराटीचर्स के साथ एक नए फरेब के अलावा कुछ नहीं है। इस एक्ट को पढकर ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री गहलोत ने एक सोची समझी साजिश के तहत मदरसों के कयाम के मकसद और मदरसों की रूह को खत्म करने की शुरुआत कर दी है !! (29-08-2020)
------------------------------------------------
➡️अगर आपको हमारा यह लेख/खबर पसंद आया हो, तो प्लीज इसे शेयर/फॉरवर्ड कीजिए और साथ ही हमारे अखबार की आर्थिक मदद भी कीजिए।
अकाउंट डिटेल्स:- इकरा पत्रिका
A/c no. 613900 55000 00252
IKRA PATRIKA
IFSC:- PUNB 0613900
PNB, MUSLIM SR. SEC. SCHOOL, MOTI DUNGARI ROAD, JAIPUR.
***************************
©️ Copyright :- इस सम्पूर्ण लेख/खबर को या इसके किसी पैराग्राफ़ को हुबहू या तोड़ मरोड़ कर प्रकाशित करना मना है। अलबत्ता आप चाहें तो लेखक और हमारे अखबार के नाम के साथ इस सम्पूर्ण लेख/खबर को सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कर सकते हैं।
-------------------------------------------------
-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
09602992087, 09414361522
©️ Copyright Thar News & Ikra Patrika.
All Rights Reserved.





आप ने बहुत गौर व फिक्र से एक्ट को पढ़ा है और बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ इस एक्ट की ज़रूरी खामियां उजागर करके उसमे संशोधन की मांग की है।
ReplyDelete📞 8115877786