ख़ानक़ाह ए नियाज़िया बरेली शरीफ़ के सज्जादानशीन हज़रत हसनी मियां साहब एक अज़ीम शख्सियत
ख़ानक़ाह ए नियाज़िया बरेली शरीफ़ के सज्जादानशीन हज़रत हसनी मियां साहब एक अज़ीम शख्सियत
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जिनका आठ सितम्बर की देर रात को इन्तकाल हो गया था। ख़ानक़ाह ए नियाज़िया पंजतन पाक व अहले बैअत की यादों और गंगा जमुनी तहजीब व सूफीज्म का मरकज है।
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"वे सरजमीन ए हिन्द में हजारों लोगों के लिए हिदायत (मार्ग दर्शन) का सामान फरहाम (उपलब्ध) करवा रहे थे और बिला तफरीक (बिना किसी भेदभाव) रंगो नस्ल के उनका रूहानी फैजान जारी था। उनके इन्तकाल से सिलसिला ए नियाज़िया और मशायख ए तसव्वुफ़ (सूफीज्म) में अज़ीम ख़ला (बड़ा खालीपन) पैदा हो गया है, खुदा से दुआ है कि वो इस ख़ला को पुर (भरे) करे।"
-मौलाना डाॅक्टर ताहिरूल कादरी
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मशहूर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी ने हज़रत के विसाल पर अफसोस का इजहार करते हुए कहा कि "कहाँ आते हैं दुनिया में ऐसे लोग ?"
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बरेली शरीफ़/जयपुर (एम फारूक़ ख़ान)। आठ सितम्बर की देर रात को सूफीज्म के सूरज और इन्सानी भाईचारे के अलमबरदार हज़रत शाह हसनेन उर्फ हसनी मियां साहब इस दुनिया से चले गए। उनके विसाल (इन्तकाल) की खबर ज्यों ही फैली तो उनके चाहने वालों और मुरीदेन में गम की लहर दौड़ गई। दुनिया के कोने कोनेे में हज़रत के मुरीद हैं। हज़रत सरकार हसनी मियां साहब ख़ानक़ाह ए नियाज़िया बरेली शरीफ़ के पांचवें सज्जादानशीन थे। फैजाने नियाज़िया के बानी डाॅक्टर कमाल मियां नियाजी ने मीडिया को बताया कि "सरकार हसनी मियां साहब की आठ व नौ सितम्बर की दरम्यानी रात करीब डेढ़ बजे अचानक तबीयत खराब हो गई थी। उन्हें हाॅस्पिटल ले जाने की तैयारी की जा रही थी, लेकिन वहां ले जाए जाने से पहले ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।"
सरकार हसनी मियां साहब के करोड़ों मुरीद व चाहने वाले हैं। उनकी पैदाइश 1950 की है और 1980 में उन्हें ख़ानक़ाह ए नियाज़िया का सज्जादानशीन बनाया गया था। दुनिया के कोने कोने में अनलहक (खुदा/परमेश्वर) के पैगाम को फैलाने वाले सरकार हसनी मियां साहब ने हमेशा अपने पराये से ऊपर उठकर सबके लिए मुहब्बत बांटी। पूरी जिन्दगी अपने बुजुर्गों के बताए रास्ते पर चलकर लोगों को यही तालीम दी कि आपस में प्यार मुहब्बत से रहें। उन्होंने सूफीज्म के पैगाम को हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका, जर्मनी, रूस, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी फैलाया।
वे पिछले चार दशक से ख़ानक़ाह ए नियाज़िया से सूफीज्म का पैगाम लोगों तक पहुंचा रहे थे। वे एक अज़ीम शख्सियत के मालिक थे। उनकी शख्सियत की खासियत व काबिलियत का अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके जितने मुरीद मुसलमान हैं, उससे कहीं ज्यादा गैर मुस्लिम भी उनके मुरीद हैं। वे सभी की मदद करते थे। वे रोज ख़ानक़ाह में लंगर (खाना) बनवाते थे और यहाँ आने वाला हर शख्स खाना खाकर जाता था। यह सिलसिला अब भी जारी है। सरकार हसनी मियां साहब हर जुमे (शुक्रवार) को एक से डेढ़ लाख रूपये ज़रूरतमंदों में बांटते थे, यह उनकी आदत थी खिदमत ए खल्क करने की। बहुत से घरों में खाने पीने का बन्दोबस्त, बच्चों की पढाई लिखाई और स्कूलों की फीस सरकार हसनी मियां साहब के जरिए होती थी। ख़ानक़ाह ए नियाज़िया हकीकत में सूफीज्म यानी ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह यानी हज़रत मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम के खिदमत ए खल्क के पैगाम पर अमल करती है।
सरकार हसनी मियां साहब के मुरीदों में देश और विदेश में ऊंचे औहदों पर बैठे अफसर, राजनेता, संगीतकार, कलाकार, निर्देशक, लेखक, कवि, शायर और गायकार भी हैं। यह लोग ख़ानक़ाह ए नियाज़िया में हाजरी लगाते थे और हज़रत के दीदार करते थे। इस ख़ानक़ाह ने पूरी दुनिया में अमन व भाईचारे का पैगाम फैलाया है। उनके इन्तकाल पर देश विदेश की नामवर शख्सियतों ने खिराज ए अकीदत पेश की है। आलमी मजहबी रहनुमा और सूफीज्म के पैरोकार मौलाना डाॅक्टर ताहिरूल कादरी साहब ने कनाडा से जारी किए अपने ऑडियो बयान में कहा है कि "हज़रत हसनी मियां साहब के इन्तकाल की खबर हमारे लिए निहायत ही अफसोसनाक है, वे सरजमीन ए हिन्द में हजारों लोगों के लिए हिदायत (मार्ग दर्शन) का सामान फरहाम (उपलब्ध) करवा रहे थे और बिला तफरीक (बिना किसी भेदभाव) रंगो नस्ल के उनका रूहानी फैजान जारी था। उनके इन्तकाल से सिलसिला ए नियाज़िया और मशायख ए तसव्वुफ़ (सूफीज्म) में अज़ीम ख़ला (बड़ा खालीपन) पैदा हो गया है, खुदा से दुआ है कि वो इस ख़ला को पुर (भरे) करे।"
उनके इन्तकाल पर प्रसिद्ध कथक नृत्य गुरू पद्मविभूषण पण्डित बिरजू महाराज के परिवार ने भी अफसोस का इजहार करते हुए खिराज ए अकीदत पेश की है। ख़ानक़ाह के प्रबन्धक शब्बू मियां नियाज़ी ने मीडिया को बताया कि बिरजू महाराज के नवासे स्वराज मिश्रा ने फोन कर अफसोस का इजहार किया है। वे कुछ दिनों पहले ही ख़ानक़ाह आकर हसनी मियां साहब से मुलाकात करके गए थे। मशहूर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी ने हज़रत के विसाल पर अफसोस का इजहार करते हुए कहा कि कहाँ आते हैं दुनिया में ऐसे लोग ?
कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने हज़रत के इन्तकाल पर कहा कि "दुनियाभर में सूफिज्म के जरिये आपसी भाईचारे तथा इंसानियत का पैगाम देने वाले ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के सज्जादानशीन शाह मोहम्मद हसनेन उर्फ हसनी मियां साहब का निधन समाज के लिए अपूरणीय क्षति है।" समाजवादी पार्टी ने बयान जारी कर कहा है कि "पूरी दुनिया में सूफिज्म का परचम लहराने वाले बरेली की ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के धर्मगुरू शाह मोहम्मद हसनेन उर्फ हसनी मियां साहब का निधन अपूरणीय क्षति है।" भाजपा नेता बरेली सांसद और केन्द्रीय मन्त्री संतोष गंगवार ने दुख का इजहार करते हुए कहा कि "कुछ साल पहले मैं ख़ानक़ाह में जश्ने चरागा में शामिल होने गया था, तब हसनी मियां साहब से मुलाकात की थी, वे बरेली की बड़ी शख्सियत थे, दुनिया से उनके जाने का दुख है।"
सरकार हसनी मियां साहब हर साल ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती ग़रीब नवाज़ साहब के उर्स मुबारक पर अजमेर शरीफ़ आते हैं और साथ में उनके साहबजादे नायब सज्जादानशीन हज़रत शाह मोहम्मद मेहदी मियाँ साहब नियाजी चिश्ती कादरी भी तशरीफ़ लाते हैं। आते जाते वक्त वे जयपुर भी कयाम करते थे। उनके नायब सज्जादानशीन हज़रत मेहदी मियां साहब जो अब ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के छठे सज्जादानशीन बन गए हैं, अमूमन वापसी में झोटवाड़ा स्थित गुलशन ए हसनेन (जो मरहूम हाजी यासीन खान नियाज़ी दौलतखानी के परिवार का आशियाना है।) में भी तशरीफ़ लाते हैं। जहाँ सूफीज्म से जुड़े हुए लोग और ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के मुरीद उनके दीदार कर उनसे दुआ की दरखास्त करते हैं। मुझ (एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका) खाकसार को भी यहाँ जाने का मौका मिलता है। यहाँ हज़रत के मुरीद और यासीन खान नियाज़ी साहब के बड़े बेटे सिकन्दर खान नियाजी साहब सभी का इस्तकबाल करते हैं।
इस बार ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ साहब के उर्स मुबारक पर सरकार हसनी मियां साहब नहीं आ सके, क्योंकि उनकी तबीयत नासाज़ थी। लेकिन सरकार मेहदी मियां साहब तशरीफ़ लाए थे और हम लोगों ने जयपुर में उनका इस्तकबाल किया और उनके दीदार कर दुआएं ली। ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के बानी हज़रत शाह नियाज़ बेनियाज़ रहमतुल्लाह अलैह के फरवरी 2018 में उर्स मुबारक पर सिकन्दर भाईसाहब नियाज़ी के साथ मैं भी बरेली शरीफ़ गया था और हम लोग तीन दिन तक ख़ानक़ाह ए नियाज़िया में ठहरे थे, तब पहली बार मुझ खाकसार ने भी सरकार हसनी मियां साहब के दीदार किए थे। वे एक आला शख्सियत के मालिक थे। उनके दर पर हर किस्म का छोटा बड़ा आदमी हाजरी लगाता था।
इस दौर में जहाँ सूफीज्म के नाम पर ढोंग, पाखण्ड और मोटी कमाई का एक बुरा रिवाज शुरू हो गया है और लोग ढोंगी पीरों की वजह से सूफीज्म से दूर होकर कट्टरपंथ की तरफ बढ रहे हैं, उस दौर में सरकार हसनी मियां साहब ख़ानक़ाह ए नियाज़िया से सूफीज्म का सही पैगाम लोगों तक पहुंचा रहे थे। वे ख़ानक़ाह ए नियाज़िया से उस दौर की याद दिला रहे थे, जब ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह हिन्दुस्तान आए और यहाँ आकर उन्होंने मजलूम अवाम के आंसू पौंछे। वे इस दौर में अवाम की हर किस्म की खिदमत कर कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह महरवली शरीफ़ (महरौली दिल्ली), बाबा फरीदुद्दीन गंजशकर रहमतुल्लाह अलैह (अजोधन पाक पट्टन) और महबूब ए इलाही निजामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह (दिल्ली) की याद दिला रहे थे।
ख़ानक़ाह ए नियाज़िया वो जगह है, जिसे इस दौर में वाकई ख़ानक़ाह कहा जा सकता है। बाकी तो बहुत ही ख़ानक़ाहें इस दौर में सिर्फ मजारें और दरगाहें बन गईं हैं। चिश्तिया सिलसिले की इस ख़ानक़ाह से सूफीज्म का जो पैगाम दिया जाता है, वैसा मैंने किस और ख़ानक़ाह में अभी तक नहीं देखा है और इसके पीछे सबसे बड़ा किरदार सरकार हसनी मियां साहब की शख्सियत का था। जिन्होंने हर किस्म के सियासी जलसे जुलूस से खुद को दूर रखते हुए सिर्फ इन्सानियत की खिदमत की और सूफीज्म का पैगाम पूरी दुनिया में फैलाया। जिस तरह से इस दौर में बहुत सी ख़ानक़ाहों और दरगाहों के जिम्मेदारान जिस अन्दाज़ में सियासी लोगों के आगे पीछे रहते हैं और उनकी दस्तारबन्दी व इस्तकबाल में पेश पेश रहते हैं, उस दौर में ख़ानक़ाह ए नियाज़िया में ऐसा कुछ नहीं होता है। यहाँ जो भी आता है वो बराबर है कोई छोटा बड़ा नहीं है।
सियासत से पूरी तरह से दूर रहे हसनी मियां साहब के पास ख़ानक़ाह में हर पार्टी का राजनेता हाजरी लगाता था और वे उनसे मिलते भी थे, लेकिन वे खुद चलकर पूरी जिन्दगी में किसी राजनेता की चौखट पर नहीं गए और यही हाल मौजूदा सज्जादानशीन और हसनी मियां साहब के नायब सज्जादानशीन हज़रत मेहदी मियां साहब का है, जो कभी किसी राजनेता की चौखट पर नहीं जाते। अगर कहीं गए भी हैं तो सिर्फ काफी इसरार के बाद अपने मुरीदेन के यहाँ गए हैं।
ख़ानक़ाह ए नियाज़िया एक सिलसिला ए जारिया वाली ख़ानक़ाह है, यानी यहाँ आका मुहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम और मौला अली अलैहिस्सलाम से लेकर आज तक पूरा एक लगातार सिलसिला है और इस सिलसिले के करोड़ों मुरीद व चाहने वाले पूरी दुनिया में हैं। यहाँ बड़े पीर साहब गौस ए पाक रहमतुल्लाह अलैह और ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह दोनों की मसनद आज भी मौजूद हैं। सूफीज्म से जुड़े हुए जिम्मेदार लोग कहते हैं कि अगर वाकई इस दौर में कोई मौलाई ख़ानक़ाह है, तो वो ख़ानक़ाह ए नियाज़िया है।
ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के मुरीद सिकन्दर खान नियाज़ी ने इकरा पत्रिका को बताया कि प्रख्यात संगीतकार रवीन्द्र जैन, पण्डित रविशंकर, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पण्डित भीमसेन जोशी, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, शकील बदायूंनी, हसरत जयपुरी, शमीम जयपुरी, बेगम अख्तर, अमजद अली ख़ां, अमान अली, अयान अली, पण्डित बिरजू महाराज, उस्ताद सुल्तान खां, फहीमुद्दीन खां डागर, जहीरूद्दीन खां डागर, वासीफुद्दीन खां डागर, कपूरथला महारानी नैना देवी, बहज़ाद लखनवी, उस्ताद अल्लाहरखा खां, ज़ाकिर हुसैन जैसे बड़े बड़े कलाकार, शायर, फिल्म स्टार और देश की बड़ी बड़ी राजनीतिक हस्तियों ने सदा इस खानकाह नियाज़िया में हाजरी दी है और इनमें से ज्यादातर इसी ख़ानक़ाह से मुरीद भी थे।
उन्होंने बताया कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू, पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती आदि बड़ी बड़ी राजनीतिक हस्तियों ने ख़ानक़ाह ए नियाज़िया बरेली शरीफ़ की चौखट पर हाजरी दी है। यह ख़ानक़ाह गंगा जमुनी तहज़ीब को फरोग देती है। इस ख़ानक़ाह में हर धर्म, हर सम्प्रदाय का व्यक्ति हाजरी देता है। सरकार हसनी मियां साहब का किरदार बहुत बुलन्द था, वे हमेशा ग़रीबों की मदद करते थे और किसी के साथ कोई भी भेदभाव नहीं करते थे। आप ने पूरी जिन्दगी अल्लाह के बन्दों की खिदमत में वक्फ कर दी थी। कोई भी मांगने वाला यहाँ आया उसको कभी खाली हाथ नहीं जाने दिया। उन्हें सूफीज्म के चौदह सिलसिलों में खिलाफत की इजाजत थी। आपको जानशीने गौसो ख्वाज़ा कहा जाता है।
सरकार हसनी मियां साहब ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के पांचवें सज्जादानशीन थे। उनके वालिद मोहतरम हज़रत शाह मोहम्मद सज्जाद उर्फ हसन मियां साहब इस ख़ानक़ाह के चौथे सज्जादानशीन थे। सरकार हसनी मियां साहब के विसाल के बाद उनके नायब सज्जादानशीन हज़रत मेहदी मियां साहब ख़ानक़ाह ए नियाज़िया के छठे सज्जादानशीन बन गए हैं। नौ सितम्बर की शाम को सरकार हसनी मियां साहब के जनाजे को तैयार कर ख़ानक़ाह के समाखाने (महफिलखाने) में रखा गया। ख़ानक़ाह मुरीदेन से खचाखच भरी हुई थी, हर शख्स हसनी मियां साहब के आखिर दीदार करना चाहता था, हर शख्स उनके जनाजे को छूना चाहता था। तमाम मुरीदेन के आंखों से आंसू जारी थे और वे या हुसैन के नारे लगा रहे थे। यह मुहब्बत थी अपने पीर और मुरीदेन की। ज्यों ही मगरिब की अजान हुई तो सज्जादानशीन हज़रत मेहदी मियां साहब मुसल्ले पर तशरीफ़ लाए और उन्होंने पहले मगरिब की नमाज अदा करवाई और बाद में अपने वालिद और पीरो मुर्शिद सरकार हसनी मियां साहब के जनाजे की नमाज अदा करवाई। फिर वहीं ख़ानक़ाह ए नियाज़िया में अपने बुजुर्गों की आरामगाह (कब्रों) के पास उन्हें सुपुर्द ए खाक कर दिया गया।
(15-09-2020)
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