चीन को पछाड़ने और देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ जरूरी कदम
चीन को पछाड़ने और देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ जरूरी कदम
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लेकिन क्या हमारे व्यवसायी, निवेशक और प्रधानमंत्री इन कदमों पर चलने का प्रयास करेंगे ?
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जयपुर (एम माहिर खान)। चीन से हमारे बढते टकराव और भारतीय क्षेत्र में घुसकर हमारे सैनिकों पर किए गए हमले के बाद देश में कड़ा रोष व्याप्त है। हालांकि वो रोष उतना नहीं है, जो पाकिस्तान वाले मामलों में देखने को मिलता है, वजह आप सब जानते हैं। फिर भी देश की जनता ने चीनी सामान का बहिष्कार करने और मौजूदा उपयोग कर रहे सामान को भी सार्वजनिक रूप से तोड़कर या जलाकर अपना विरोध जाहिर किया। साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी "वोकल फोर लोकल‘" के नारे के साथ आत्मनिर्भर भारत बनाने का दृढ संकल्प लिया और जनता से आव्हान भी किया।
चीन के खिलाफ देश ने यह कड़ा रूख और बहिष्कार करने की नीति तो अपना ली, लेकिन क्या मौजूदा हालात में भारत आत्मनिर्भर बन सकता है ? मौजूदा हालात से मेरा मतलब कोरोना महामारी से चौपट हुई अर्थव्यवस्था नहीं है, बल्कि चीनी व्यापारिक कम्पनियों के भारतीय बाजार पर एक तरह के एकाधिकार से है। यह एकाधिकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का है। आज केन्द्रीय सत्ताधीश और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लोग आत्मनिर्भर भारत की बात अपने मुंह से इस तरह निकाल रहे हैं जैसे यह कोई "थड़ी या दुकान" लगाने जितना आसान है। मैं निराशावादी विचारधारा से बिल्कुल ग्रसित नहीं हूँ बल्कि जो हकीकत है वही बता रहा हूँ।
कोरोना महामारी की वजह से हमारी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था को आघात पहुंचा है। ऐसे में पहले से ही कमजोर विकास दर वाले भारत के लिए इस दौर से निकलना और मुश्किल हो गया है। हम बात कर रहे थे भारत की आत्मनिर्भरता पर। यह बहुत ही खुशी की बात है कि भारत के लोग और प्रमुख रूप से भारत सरकार देश को आत्मनिर्भर बनाने की पहल कर चुकी है, लेकिन अगर सिर्फ चीन की ही बात की जाए, तो इसका पूरा कब्जा हमारे बाजार पर है। देश के प्रत्येक व्यक्ति की रोजमर्रा की उपभोग वस्तुओं में 80 से 90 प्रतिशत वस्तुएं आज चाइनीज और अन्य देशों की वस्तुएं हैं। इनमें अधिकतर इलेक्ट्रोनिक आइटम शामिल हैं।
चीन के लिए भारतीय दिलों में बढी नफरत के बाद चीनी बहिष्कार तो तेज हो गया, लेकिन क्या हम इस बहिष्कार को सह पायेंगे ? चीन आज भारतीय बाजार और भारतीय लोगों की आवश्यकता को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। चीन का हथियार उसके "मेड इन चाइना" प्रोडक्ट हैं, जो आज हर भारतीय उपयोग में ले रहा है। मौजूदा स्थिति यह है कि हम बहिष्कार के नारे बड़े जोश के साथ बुलन्द कर रहे हैं, लेकिन क्या हम भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तैयार हैं ? मेरे ख्याल से नहीं, क्योंकि आज विश्व स्तर की बड़ी कम्पनियों में पूर्ण रूप से भारतीय व्यापारिक कम्पनी गिनती की हैं, जो स्वदेशी उत्पादन करती हैं तथा उनकी उत्पादित वस्तुएं चीनी कम्पनियों की वस्तुओं के बराबर कीमत वाली या उनसे सस्ती बहुत कम हैं या ना के बराबर हैं।
आज या तो विदेशी कम्पनियां भारतीय बाजार का उपयोग कर रही हैं या जो कम्पनियां स्वदेशी हैं उनमें से भी कई कम्पनियां पूर्ण रूप से भारतीय नहीं हैं। इनमें चीन या अन्य देशों की कम्पनियों का पैसा लगा हुआ है। ज्यादातर कम्पनियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर चीनी निवेश है। इस बात से हम अनुमान लगा सकते हैं कि आज हम कहां खड़े हैं ? जब हम एक पिन जैसी छोटी चीजों से लेकर मोबाइल, टीवी, कपड़े, खिलौने और अन्य रोजमर्रा उपभोग की वस्तुएं विदेशी इस्तेमाल कर रहे हैं तो हम कैसे इस विदेशी निर्भरता को खत्म कर पायेंगे ?
चीन से चल रहे विवादों और टकराव के बीच हमारी सरकार ने भी कई बड़े एक्शन लिए हैं। इसके अन्तर्गत सरकार ने कुछ समय पहले 59 चीनी एप बैन किए थे तथा अभी हाल ही में 118 चीनी एप और प्रतिबंधित किए हैं। भारतीय सेना ने भी सुरक्षा के चलते कई एप बैन किए हैं। जो एक सराहनीय काम है। इसी तरह आईपीएल ने भी मुख्य स्पाॅन्सर चाइनीज मोबाइल कम्पनी वीवो से स्पाॅन्सरशिप तोड़ ली है, लेकिन इसमें पहल वीवो ने ही की। आईपीएल को वीवो बतौर स्पाॅन्सर 440 करोड़ रूपये हर सीजन के लिए देता था। अगर देश में खेलों में चीनी कम्पनियों की हिस्सेदारी की बात की जाए तो यह करीब 50 फीसदी है। भारतीय खेलों में ही नहीं बल्कि खेल उपकरणों तक में चीनी कम्पनियों की हिस्सेदारी है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2019 से लेकर फरवरी 2020 तक चीन से 91 लाख 87 हजार रूपये के खेल उपकरण मंगाए जा चुके हैं। यही नहीं जिन कम्पनियों को हम भारतीय बता रहे हैं, उनमें भी चीन का पैसा लगा हुआ है। बायजूस, पेटीएम और ड्रीम इलेवन यह तीनों कम्पनियां टीम इंडिया और आईपीएल की स्पाॅन्सरशिप और पार्टनरशिप दोनों में हैं। इनमें चीनी कम्पनी टेंसेंट का निवेश है। वीवो के स्पाॅन्सरशिप से हटने के पश्चात कई नामी कम्पनियां स्पाॅन्सरशिप के लिए आगे आईं जिसमें पतंजलि, बायजूस, ड्रीम इलेवन, अमेजन और कोकाकोला शामिल थीं। इसमें ड्रीम इलेवन ने बाजी मार ली, जो सिर्फ 220 करोड़ रूपये की स्पाॅन्सर बन पाई। लेकिन यह भी पूरी तरह भारतीय कम्पनी नहीं है, बस भारतीय जनता को दिखाने के लिए इसे चुना गया है।
आज पूरा विश्व कोरोना महामारी और गिरती अर्थव्यवस्था से परेशान है, इसी बीच भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात शुरू हुई है। परन्तु विदेशी निवेशक कम्पनियां खासकर चीनी कम्पनियां भारतीय बाजार पर कब्जा जमाये बैठी हैं। भारत को अपना बाजार स्वदेशी बनाने के लिए इन सभी कम्पनियों को देश से बाहर करना होगा। भारतीय व्यवसायियों और निवेशकों को विदेशी कम्पनियों में हिस्सेदारी और निवेश छोड़ना होगा। लेकिन ऐसा शायद ही मुमकिन हो, क्योंकि हम भारत को आत्मनिर्भर बनाने के दावे तो ठोक सकते हैं, लेकिन उसे व्यवहारिकता देना हमारे लिए आसान नहीं है। कई बड़े भारतीय व्यवसायी और निवेशक आज अपने देश को तरजीह (प्राथमिकता) देने की बजाए विदेशों और वहां की कम्पनियों को तरजीह दे रहे हैं और उनमें अपना निवेश कर रहे हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है, जो आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए बहुत बड़ा रोड़ा है।
भारत ने आत्मनिर्भर बनने की पहल जरूर शुरू कर दी है, लेकिन सिर्फ आत्मनिर्भर भारत का ढिंढोरा पीटने से हम आत्मनिर्भर नहीं बन जाएंगे, बल्कि हमें समर्पित और एकजुट होकर काम करना होगा। भारत को आत्मनिर्भर बनाने को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार देश को सम्बोधित किया है, लेकिन मैं प्रधानमंत्री जी से यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि क्या आपने अपने अभी तक के कार्यकाल में देश को इतना मजबूत बनाया है कि भारत आत्मनिर्भर देश बनने की तरफ तेजी बढ सके ? जाहिर है कि नहीं, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और उनके मंत्री व अफसर यही कहते हैं कि देश की हालत बिल्कुल सही है। लेकिन हकीकत यह है कि केन्द्र सरकार की गलत नीतियों ने आज देश को आर्थिक, सामाजिक और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक गहरी खाई में धकेल दिया है। भारतीय विकास दर तेजी से गिरी है। देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) माइनस 23.9 प्रतिशत पर गिर चुकी है, जो कि एक बेहद अफसोसनाक बात है।
यही नहीं अगर देश की आन्तरिक व्यवस्था की बात की जाए तो यह भी सरकारी तंत्र की कमजोरी और कामचोरी की भेंट चढ चुकी है। लाॅकडाउन लगाने के बाद सरकार, चाहे व राज्य की हो या केन्द्र की, दोनों ही लाॅकडाउन को सही तरीके से लागू नहीं कर पाई और नतीजतन अव्यवस्था हो गई। सरकारों के सामने सबसे बड़ा काम लाॅकडाउन में प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजना और जनता की आवश्यकताओं को पूरा करना था, जो सरकार सही तरीके से नहीं कर पाई। जब इतनी छोटी छोटी चीजें सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं तो क्या खाक भारत चीन को पटकनी दे पाएगा ? जिस चीन से कोरोना महामारी शुरू हुई और सबसे पहले वहीं पर स्थिति सामान्य हुई, उस चीन से भारत टकराने की बात तो करता है, लेकिन क्या हम टकराने के लिए तैयार हैं ? क्या हमने देश को हर क्षेत्र में इतना मजबूत कर दिया है कि हम चीन को पछाड़ खिला दें ?
यकीनन हमारा देश चीन को हर क्षेत्र में पछाड़ खिला सकता है। लेकिन इसके लिए कुछ सख्त कदम उठाने होंगे और दिल को बड़ा करना होगा। पहला कदम, चीनी सामान का आयात पूरी तरह से बन्द कर दें। दूसरा कदम, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप निवेश वाली तमाम चीनी कम्पनियों की एन्ट्री देश में बन्द कर दें। तीसरा कदम, कुटीर एवं छोटे उद्योगों को आर्थिक सहायता देकर मजबूत करें। चौथा कदम, चीन को छोड़कर बाकी सभी पड़ौसी देशों से सम्बन्ध सुधारने और वहाँ से चीनी दबदबे को खत्म करने की कोशिश करें। पांचवां कदम, सार्क देशों की एकता व व्यापार पर विशेष बल दें। छठा कदम, देश में बढती साम्प्रदायिकता व नफरती माहौल को पूरी तरह से नियंत्रित करें। और यह तभी हो सकता है, जब केन्द्र सरकार इस और गम्भीरता से कदम बढाए। यानी खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन मुद्दों पर गम्भीरता दिखाएं। उनके पास पूर्ण बहुमत की सरकार है, इसलिए वे ऐसा कर सकते हैं। अगर करना चाहें तो ? अगर प्रधानमंत्री ने ऐसा कर दिखाया, तो फिर देश आत्मनिर्भर भी बन जाएगा और मौका पड़ने पर हर क्षेत्र में चीन को पछाड़ भी खिला देगा। (21-09-2020)
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