साहेब उर्दू को लेकर इतनी नाइन्साफी क्यों ?
साहेब उर्दू को लेकर इतनी नाइन्साफी क्यों ?
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स्कूलों में एक अदद उर्दू टीचर नहीं होने की वजह से मजबूरन बच्चों को संस्कृत पढनी पड़ रही है। यह हाल पूरे राजस्थान का है, यहाँ तक कि पीसीसी अध्यक्ष और शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा का विधानसभा क्षेत्र भी इस भेदभाव का शिकार है।
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स्कूलों में एक अदद उर्दू टीचर नहीं होने की वजह से मजबूरन बच्चों को संस्कृत पढनी पड़ रही है। यह हाल पूरे राजस्थान का है, यहाँ तक कि पीसीसी अध्यक्ष और शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा का विधानसभा क्षेत्र भी इस भेदभाव का शिकार है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान की सरकारी स्कूलों में बरसों से उर्दू ज़बान को नजरअंदाज किया जा रहा है, चाहे सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की। वजह सिर्फ यह है कि सत्ताधीश एवं सरकारी तन्त्र उर्दू को मुसलमानों की भाषा समझते हैं। जबकि उर्दू भारत में पैदा हुई भाषा है और भारतीयों की गोद में पली बढ़ी है, एक से बढकर एक गैर मुस्लिम शायर व उर्दू भाषा के साहित्यकार हुए हैं, कुछ आज भी हैं। जिस ज़बान ने इन्कलाब जिंदाबाद और अंग्रेजों भारत छोड़ो जैसे नारे दिए, उसे आज यतीम और बेवा बना दिया गया है।
भारतीय संविधान और शिक्षा नीति कहती है कि बच्चे को उसकी मातृ भाषा में शिक्षा दें, लेकिन उर्दू पढने वाले सभी बच्चे बच्चियों को यह सहूलत नहीं मिलती, क्योंकि सभी स्कूलों में उर्दू पढाने वाले टीचर नहीं हैं। मजबूरन इन बच्चों को उर्दू की बजाए दूसरी भाषा पढनी पड़ती है। गत माह उर्दू भाषा को लेकर प्रारम्भिक शिक्षा निदेशालय राजस्थान का एक पत्र चर्चा का विषय बना था, क्योंकि यह पत्र उर्दू के खिलाफ़ था।
इस पत्र का जमकर विरोध हुआ तो दो दिन बाद ही शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने सफाई में बयान जारी किया और एक पत्र भी निदेशालय ने जारी करवाया। जो सिर्फ लीपापोती के लिए। वो इसलिए कि अगर पहले वाले पत्र से उर्दू का कोई नुकसान नहीं है, तो सफाई देने की बजाए उसे वापस ले लेना चाहिए था, लेकिन शिक्षा मन्त्री ने ऐसा नहीं किया और कहा कि इस पत्र से उर्दू का कोई नुकसान नहीं होगा तथा जो भी विद्यार्थी उर्दू पढना चाहेंगे उन्हें उर्दू टीचर उपलब्ध करवाया जाएगा। यानी जिन स्कूलों में उर्दू टीचर की आवश्यकता होगी, वहाँ टीचर लगाया जाएगा। लेकिन सच्चाई बहुत कड़वी है, वो यह है कि राजस्थान में बेशुमार स्कूल ऐसे हैं जहाँ उर्दू पढने वाले बच्चे हैं, लेकिन उर्दू सब्जेकट व टीचर नहीं हैं।
खुद शिक्षा मन्त्री डोटासरा के विधानसभा क्षेत्र का भी यही हाल है। कांग्रेस सैनिक प्रकोष्ठ से जुड़े हुए वरिष्ठ समाजसेवी रिटायर्ड सूबेदार जाफर खान खेड़ी का कहना है कि "हमारा गांव खेड़ी राडान शिक्षा मन्त्री के विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मणगढ़ में आता है और यहाँ राजकीय उच्च माध्यमिक स्कूल है और इस स्कूल में कुल 241 विद्यार्थियों में से 116 उर्दू पढने के इच्छुक हैं, इसके बावजूद यहाँ उर्दू पढाने की कोई व्यवस्था नहीं है। यहाँ लगातार आठ साल तक उर्दू टीचर था, अब पांच साल से अधिक हो गए, लेकिन सरकार ने एक उर्दू टीचर नहीं लगाया है। हमने शिक्षा अधिकारी, शिक्षा निदेशालय और शिक्षा मन्त्री सब जगह चक्कर लगा लिए, लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। उन्होंने कहा कि यही हाल हमारे जिले की अन्य बहुत सी स्कूलों का है, जिसमें खींवासर, कासली व किरड़ोली जैसे बड़े गांवों की सरकारी स्कूलों में भी उर्दू टीचर नहीं हैं। हमारे विधानसभा क्षेत्र की 14 सरकारी स्कूलों में उर्दू टीचर की जरूरत है, लेकिन सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही है। "
राजस्थान उर्दू शिक्षक संघ के अध्यक्ष अमीन कायमखानी ने बताया कि "सरकार उर्दू ज़बान के प्रति कतई गम्भीर नहीं है और जिन बच्चों की इच्छा है कि वे उर्दू पढें वे मजबूरन या तो संस्कृत पढते हैं या फिर सरकारी को छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में दाखला लेते हैं, जिससे सरकारी स्कूलों में नामांकन घट रहा है। उन्होंने बताया कि गांवों की स्कूलों जैसा ही हाल राजधानी की स्कूलों का है। यहाँ कहीं उर्दू सब्जेकट नहीं है और कहीं उर्दू टीचर नहीं है और कहीं उर्दू पोस्ट पर सामान्य टीचर लगा दिया गया है। यह सच है कि स्टाफिंग पैटर्न और समानीकरण को लेकर भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार ने उर्दू विद्यार्थियों का बहुत नुकसान किया है, लेकिन कांग्रेस सरकार भी कोई दूध की धुली हुई नहीं है, कांग्रेस सरकार ने पूर्व में उर्दू का बहुत नुकसान किया है और अब दो साल होने को आ गए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा क्या कर रहे हैं ? क्यों उर्दू ज़बान के साथ लगातार नाइन्साफी कर रहे हैं ?"
उन्होंने आगे बताया कि "राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल वार्ड 41 जोशी मार्ग झोटवाड़ा के नाम से स्थित स्कूल में 2002 से उर्दू की तालीम निरन्तर दी जा रही थी। यहाँ उर्दू शिक्षिका भी 2002 से वर्तमान तक कार्यरत हैं। इसको लेवल प्रथम सामान्य बना दिया गया। इस विद्यालय में कक्षा 1 से 8 तक की उर्दू तालीम पूरी तरह से बन्द कर दी गई है और कक्षा 6 से 8 के भाषायी अल्पसंख्यक समुदाय स्टूडेंट्स पर तृतीय भाषा उर्दू के स्थान पर जबरन संस्कृत थोप दी गई है। ज़िला कलेक्टर जयपुर से लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक मांग की गई कि इसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए। लेकिन विभाग के अधिकारियों ने लीपापोती कर अकलियत ज़बान व उर्दू भाषी स्टूडेंट्स के साथ नाइन्साफी की है। उन्हें शिक्षा के अधिकार कानून 2009 की धारा 29 के बिंदु (एफ) और भारतीय संविधान के प्रावधान 350 (क) के क़ानूनी अधिकारों व संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया है। गत वर्ष तत्कालीन ज़िला कलेक्टर जगरूप सिंह यादव ने भी जांच करवाने के आदेश दिए थे तथा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खुद फॉलोअप मांगी थी। लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर संकीर्ण मानसिकता के चलते उर्दू तालीम को बंद कर रहे हैं। उर्दू तालीम के साथ यह सौतेला बर्ताव व भेदभाव ना क़ाबिले बर्दाश्त है।"
(07-10-2020)
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