काश: आज कोई राम मनोहर लोहिया देश में होता ?

काश: आज कोई राम मनोहर लोहिया देश में होता ?
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भारतीय लोकतंत्र आज केन्द्रीय तौर पर एक तरह से विपक्षहीन और अनाथ हो गया है, क्योंकि ज्यादातर विपक्षी नेता भ्रष्ट और अवसरवादी हैं, जनता का भरोसा उन पर से उठ चुका है ! ऐशोआराम की जिन्दगी और लूट के माल की रखवाली ने उनसे जद्दोजहद करने का माद्दा छीन लिया है ! बहुतों की सियासी हैसियत अपने राज्य में ही महदूद (सीमित) हो गई है। उनके लिए देश, जनता और जनहित के मुद्दों से पहले खुद का परिवार है। आज देश को फिर एक लोहिया की जरूरत है, लेकिन अफ़सोस कि लोहिया के चेलों ने ही उनके इन्कलाब को भुला दिया !
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"जिन्दा क़ौमें सरकार बदलने के लिए पांच साल तक इन्तजार नहीं करती।"
#डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया

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जयपुर (एम फारूक़ ख़ान)। डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया एक महान समाजवादी नेता और भारतीय जनता के हीरो थे, खासकर गरीबों और पिछड़ों के। वे 23 मार्च 1910 को पैदा हुए थे। वे एक स्पष्ट विचार वाले फकीर राजनेता थे। उन्होंने जनहित के मुद्दों पर कभी समझौता नहीं किया। बोलने और लिखने से कभी नहीं डरे। चाहे सरकार अंग्रेजों की थी या आजादी के बाद में कांग्रेस की। उन्होंने देशहित और जनहित के मुद्दों पर सरकार की जमकर आलोचना की, आन्दोलन किया। यही वजह थी कि अंग्रेजी सरकार में भी उन्हें कठोर यातना वाली कैद मिली और कांग्रेस के राज में भी ! 


लोहिया जी की शान में यह जुमले मैं सिर्फ इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मैं उनकी जद्दोजहद को पसंद करता हूँ, या उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हूँ। बल्कि इसलिए लिख रहा हूँ कि आज लोहिया जी का आन्दोलन खत्म कैसे हुआ और आज नाकारा और निकम्मी सरकारों के होते हुए भी विपक्ष अपाहिज क्यों है ? लोहिया जी एक ऐसे जननेता थे, जिन्होंने नेहरू सरकार की चूलें हिला दी थी। जबकि नेहरू सरकार आज की सरकारों से हजार गुणा बेहतर थी। मैं नेहरू जी को भी बेहद पसंद करता हूँ और मेरा मानना है कि अगर आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू पहले प्रधानमंत्री नहीं बनते, तो शायद हमें मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं मिलती। 

नेहरू जी भी वाकई जननेता थे और उन्होंने अनगिनत जनहित के काम भी किए थे। लेकिन लोहिया एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जिसने नेहरू को भी गलतियों पर बख्शा नहीं और उन्हें कटघरे में खड़ा किया। क्योंकि वे सच्चे लोकतंत्रवादी और समाजवादी थे। इतिहास गवाह है कि लोहिया जी ने जनहित के मुद्दों पर उस नेहरू को ललकारा था, जिन्हें देश की बड़ी आबादी अपना मसीहा मानती थी। लोहिया ने उस सरकार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा किया था, जिसका नेतृत्व नेहरू कर रहे थे। जो आज की सरकार से भी बड़े बहुमत की सरकार थी। इतिहास इस बात का भी गवाह है कि जब पहली बार उप चुनाव में जीतकर लोहिया लोकसभा में पहुंचे, तो उन्होंने समस्त विपक्ष को एकजुट कर नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की रूपरेखा तैयार की। 

यह आजाद भारत का पहला अविश्वास प्रस्ताव था, जनता ने जाना कि अविश्वास प्रस्ताव क्या चीज़ होती है और इस अविश्वास प्रस्ताव ने नेहरू सरकार की चूलें हिला दी थी। वो लोहिया ही थे, जिन्होंने जनसंघ पार्टी (भाजपा की पुरानी पार्टी) और कम्युनिस्ट पार्टियों को एक मंच पर बैठा दिया था। यानी उन्होंने समस्त विपक्षी दलों को नेहरू सरकार खिलाफ लामबन्द कर दिया था। यह लोहिया का ही संघर्ष था कि 1967 के चुनावों में देश में विपक्ष मजबूती से उभरा और कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें भी बनी। लेकिन इसी साल (12 अक्टूबर 1967 को) भारत का यह महान सपूत छोटी सी उम्र में इस दुनिया से चला गया।


उनके आन्दोलन से देश को जे पी नारायण, जाॅर्ज फर्नांडीज, मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, राज नारायण, चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल, चन्द्र शेखर जैसे महान नेता मिले। हालांकि जे पी नारायण लोहिया जी के पुराने साथियों में से थे। आजादी से पहले इस टीम के एक और महान योद्धा भी थे, जो आजादी से पहले बाॅम्बे (मुम्बई) नगर निगम के महापौर थे। जिन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो और साइमन कमीशन गो बैक का नारा दिया था। वे थे प्रख्यात समाजवादी नेता यूसुफ मेहर अली साहब, जिनका आजादी मिलने के साथ ही छोटी सी उम्र में इन्तकाल हो गया था। लोहिया जी के आन्दोलन की दूसरी पीढ़ी के नेताओं में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार आदि हैं।

यह लोहिया का ही आन्दोलन था कि उनके मरने के बाद उनके चेलों ने इन्दिरा गांधी सरकार की ईंट से ईंट बजा दी। यह लोहियावादियों के आन्दोलन का ही कमाल था कि 1977 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार केन्द्र में स्थापित हुई। यह लोहियावादियों का ही कमाल था कि मण्डल कमिशन बैठाया गया और उसकी सिफारिशों को लागू करते हुए पिछड़ों (ओबीसी) को आरक्षण दिया गया। ओबीसी के इस शब्द की उत्पत्ति लोहियावादियों ने की थी, ना कि कांग्रेसियों और भाजपाइयों ने ! यह लोहिया के आन्दोलनकारी विचारों का ही कमाल था कि वी पी सिंह अपनी ही सरकार के घोटाले के खिलाफ उग्र हो गए और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। फिर सारे कुनबे को इकट्ठा कर जनता दल बना और जनता दल की इन्कलाबी लहर ने राजीव गांधी की सरकार को उखाड़ दिया !

इतिहास के पन्नों को जरा और पलटेंगे, तो लोहिया के समाजवादी आन्दोलन के इन्कलाब और बदलाव के साथ उनकी जद्दोजहद के कई किस्से सामने आते हैं। वो लोहिया ही थे, जिन्होंने आजाद भारत के प्रथम घोटाले, यानी सेना के लिए खरीदी गई जीप गाड़ियों के घोटाले पर नेहरू सरकार को जमकर आड़े हाथों लिया। यह लोहिया ही थे, जिन्होंने 1962 के भारत चीन युद्ध में हारने के बाद प्रधानमंत्री नेहरू को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि नाकाम वज़ीर ए आज़म को इस्तीफा दे देना चाहिए। लोहिया कहते थे कि राष्ट्रपति का बेटा हो, या चपरासी की हो सन्तान, टाटा या बिड़ला का हो छौरा, सबकी शिक्षा एक समान। वे कहते थे कि जिन्दा कौमें सरकार बदलने के लिए पांच साल तक इन्तजार नहीं करती। लेकिन काश: आज देश में कोई लोहिया होता ? क्योंकि इस वक्त देश को फिर एक लोहिया की जरूरत है।

वो इसलिए कि आज विश्व का सबसे बङा लोकतंत्र एक तरह से विपक्षहीन हो गया है। कहने को देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यानी कांग्रेस जिसने देश पर करीब 55 साल तक एकछत्र राज किया है, वो कुछ राज्यों तक सिमट गई है। बाकी विपक्षी पार्टियों का तो और भी बुरा हाल है, इनमें ज्यादातर तो एक ही राज्य की पहलवान हैं। अन्य राज्यों में उनकी कोई सियासी जमीन नहीं है। आज भारतीय लोकतंत्र केन्द्रीय विपक्षी नेता के तौर पर अनाथ हो गया है, यह सच्चाई है, चाहे कोई माने या नहीं माने ! लोकतंत्र तभी जिन्दा रहता है, या मजबूत होता है, जब विपक्ष मजबूत हो। कमजोर और लाचार विपक्ष लोकतंत्र के खात्मे की निशानी है !

विपक्ष कमजोर क्यों हुआ ? विपक्ष कमजोर इसलिए हुआ, क्योंकि आज एक भी विपक्षी नेता ऐसा नहीं है, जिसकी देशभर में पकड़ हो और वो जनहित के मुद्दों पर सड़क पर आकर जद्दोजहद करता हो। यह कमी इसलिए पैदा हुई, क्योंकि ज्यादातर विपक्षी नेता चोर हैं और इनमें लूट के माल की रखवाली करने तथा परिवारवाद को बढ़ावा देने के कारण जनहित के मुद्दों पर जद्दोजहद करने का माद्दा खत्म हो गया है। ऐशोआराम की जिन्दगी तथा मैं और मेरे परिवार के विकास की नीति पर चलने के कारण इन विपक्षी नेताओं से जनता का भरोसा उठ चुका है। जनता चाहती है कि कोई उनके मुद्दे उठाए, कोई तो जनहित के लिए संघर्ष करे। 

आज ज्यादातर नेताओं की कोई विचारधारा नहीं है, खुद की सत्ता और अवसर ही उनकी विचारधारा है। रातों रात पार्टियां बदल लेते हैं और ऐसी पार्टी में चले जाते हैं, जिसको जिन्दगी भर गालियां निकाली, जिसकी विचारधारा से कतई सहमत नहीं हों, लेकिन सत्ता की कुर्सी और लूट के माल को बचाने के लिए कुर्ते की तरह पार्टी बदल लेते हैं। आज भारतीय लोकतंत्र में दूर दूर तक कोई चन्द्र शेखर नजर नहीं आता, जो युवा तुर्क बनकर बगावत और इन्कलाब का झण्डा उठा ले ! आज कोई वी पी सिंह नजर नहीं आता, जो सत्ता के ठोकर मार कर इन्कलाब पैदा कर दे ! आज कोई जाॅर्ज फर्नांडीज और राज नारायण नजर नहीं आता, जो अपने इन्कलाबी आन्दोलन से लुटेरे सत्ताधीशों की चौखट हिला दे ! इसलिए यह दर्द महसूस होता है कि काश: आज देश में कोई लोहिया होता ? लेकिन लोहिया और लोहिया के सिद्धांतों को तो उनके अपनों (समाजवादियों) ने ही भुला दिया है !
(10-10-2020)
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