क्या नगर निगम चुनाव अशोक गहलोत के लिए जनमत संग्रह हैं ?

क्या नगर निगम चुनाव अशोक गहलोत के लिए जनमत संग्रह हैं ?
-------------------------------------------------
या वे हार का ठीकरा किसी और के सिर फोड़ने के लिए बलि के बकरे तलाश कर चुके हैं ?
********************************
जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान में तीन नगर निगम की छह की गई, चुनाव टालने के लिए। हालांकि सरकार की तरफ से यही कहा गया कि जयपुर, जोधपुर और कोटा बड़े शहर हैं, यहाँ के विकास के लिए आवश्यक है कि इन नगर निगमों का विभाजन किया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि इन तीनों नगर निगमों में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बुरी हार नज़र आ रही थी, तो परिसीमन करने व लाॅटरी निकलने के बाद इन निगमों के विभाजन की घोषणा कर चुनाव रूकवा दिए गए, नहीं यह चुनाव नवम्बर 2019 में ही हो जाते।


निगमों के विभाजन के बाद अप्रेल में चुनाव होने थे, जो कोरोना महामारी शुरू होने के कारण टल गए। सरकार लगातार किसी न किसी बहाने से चुनाव टालती रही, जब हाईकोर्ट ने चुनाव करवाने का आदेश दिया, तब भी उसे मानने की बजाए सुप्रीम कोर्ट गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बात नहीं मानते हुए तुरंत चुनाव करवाने का आदेश दिया। सियासी जानकारों का मानना है कि इस सारे प्रकरण से यह साफ हो गया कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत चुनाव नहीं करवाना चाह रहे थे, क्योंकि उन्हें इन चुनावों में बुरी हार नज़र आ रही थी और वे नहीं चाहते थे कि सचिन पायलट प्रकरण थोड़ा ठण्डा पड़ा है और सरकार गिरती गिरती बची है, तो शीघ्र ही नगर निगम चुनाव के नाम पर हार का ठीकरा खुद के सिर नहीं फूटे। 

जयपुर, जोधपुर व कोटा जहाँ यह छह नगर निगम बनाए गए हैं, वहाँ गहलोत खेमे का पार्टी में दबदबा है। जयपुर शहर लोकसभा की आठ में से पांच सीटें कांग्रेस के पास हैं, वहीं जिलाध्यक्ष व कैबिनेट मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने पायलट गुट को छोड़कर गहलोत की शरण ले ली है। हवा महल विधायक और मुख्य सचेतक महेश जोशी जिन्हें गहलोत का खासमखास कहा जाता है, वे पहले से ही गहलोत के विश्वसनीय सहयोगी हैं। गहलोत ने यहाँ अपने अति विश्वसनीय कैबिनेट मंत्री शान्ति धारीवाल को प्रभारी मन्त्री लगा रखा है। कुल मिलाकर जयपुर के दोनों नगर निगमों का गणित गहलोत के फेवर में है। लेकिन टिकटों को लेकर हो रही सिर फुटव्वल और नेताओं के बागी तेवर खेल को खराब करने पर उतारू हैं।

जहाँ तक जोधपुर की बात है तो वो मुख्यमंत्री गहलोत का गृह नगर है और यहाँ की लोकसभा सीट से उनके पुत्र वैभव गहलोत चुनाव लड़ चुके हैं। गहलोत खुद जोधपुर की सरदारपुरा सीट से विधायक हैं। यहाँ चुनाव की कमान उन्होंने पूरी तरह से अपने पुत्र को सौंप रखी है, यानी जोधपुर नगर निगम का चुनाव भी पूरी तरह से गहलोत के नियन्त्रण में है। इसी तरह कोटा से कैबिनेट मंत्री शान्ति धारीवाल विधायक हैं और उनकी मर्जी के बिना यहाँ की कांग्रेस में पत्ता भी नहीं हिल सकता। इस प्रकार जयपुर, जोधपुर और कोटा तीनों शहरों की छह नगर निगमों में सीधा चुनाव गहलोत के नाम पर या उनके खेमे के नाम पर लड़ा जा रहा है।


जहाँ तक पार्टी नेताओं की गुटबाजी और गहलोत विरोधी खेमों की बात की जाए, तो वे भी पूरी तरह से अन्दरखाने एक्टिव हैं, जिनमें खासतौर पर पायलट गुट। अगर गहलोत विरोधी गुट के नेताओं के साथ टिकट वितरण में भेदभाव हुआ, तो फिर लाख मान मनोवल के बाद भी यह लोग पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों की खटिया पलटने के लिए पूरा जोर लगा देंगे, जैसा अमूमन कांग्रेस में होता आया है। पायलट गुट की इस कारस्तानी से गहलोत पहले से भलीभांति परिचित हैं, इसलिए वे अन्तिम दिन तक टिकट वितरण करवाएंगे, ताकि बागी नेता अपने पर्चे भी दाखिल नहीं कर सकें। लेकिन खबर है कि बागियों ने पहले से पूरी तैयारी कर रखी है, यानी वे अन्तिम दिन भारी संख्या में पर्चे दाखिल करेंगे और फिर चुनाव पूरी तरह से गहलोत समर्थकों व विरोधियों के बीच हो जाएगा।


29 अक्टूबर और एक नवम्बर को होने वाले इन चुनावों में मुख्यमंत्री गहलोत का सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। बगावत होनी तय है, क्योंकि सभी को सन्तुष्ट करना असम्भव है और बागियों के सिर पर हाथ रखने वाले गहलोत विरोधी नेता भी कांग्रेस में खूब हैं, खासकर पायलट गुट। सियासी जानकारों का मानना है कि गहलोत के लिए यह छह नगर निगम जीतने बहुत जरूरी हैं, क्योंकि इनका विभाजन और चुनाव देरी से करवाने का सारा खेल ही इसीलिए किया गया कि पुरानी तीनों निगमों में हार साफ नजर आ रही थी, इसलिए छह कर दी गई ताकि आधी अधूरी जीत लें।

सियासी गलियारों की उच्च चौपालों में चर्चा यह भी है कि यह चुनाव गहलोत के लिए एक तरह का जनमत संग्रह हैं। अगर इन चुनावों में कांग्रेस की हार होती है या वो तीन या इससे कम नगर निगम जीत पाती है, तो विरोधी खेमा इसे गहलोत की करारी हार बताएगा और मुख्यमंत्री बदलने की मांग करेगा। लेकिन गहलोत ने भी इसका तोड़ निकाल रखा है। अगर इन चुनावों में हार होती है तो वे इस हार का ठीकरा फोड़ने के लिए बलि के बकरे तलाश कर चुके हैं। वे इन चुनावों की हार का ठीकरा विरोधी खेमे के अलावा इन तीनों शहरों के प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के माथे फोड़ देंगे। यह कह कर कि तुम्हारे कहने पर टिकट दिए गए और तुम्हारी रणनीति पर चुनाव लड़ा गया, फिर यह क्या हुआ ? 
(18-10-2020)
--------------------------------------------------
➡️अगर आपको हमारा यह लेख/खबर पसंद आया हो, तो प्लीज इसे शेयर/फॉरवर्ड कीजिए और साथ ही हमारे अखबार की आर्थिक मदद भी कीजिए। 
अकाउंट डिटेल्स:- इकरा पत्रिका
A/c no. 613900 55000 00252 
IKRA PATRIKA 
IFSC:- PUNB 0613900
PNB, MUSLIM SR. SEC. SCHOOL, MOTI DUNGARI ROAD, JAIPUR. 
***************************

©️ Copyright :- इस सम्पूर्ण लेख/खबर को या इसके किसी पैराग्राफ़ को हुबहू या तोड़ मरोड़ कर प्रकाशित करना मना है। अलबत्ता आप चाहें तो लेखक और हमारे अखबार के नाम के साथ इस सम्पूर्ण लेख/खबर को सोशल मीडिया पर शेयर जरूर कर सकते हैं।
-------------------------------------------------
-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
09602992087, 09414361522

©️ Copyright Thar News & Ikra Patrika.
All Rights Reserved.

Comments

Popular posts from this blog

झुंझुनूं में रीटा चौधरी को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बनाने पर जबरदस्त रोष

चित्तौड़गढ़ अन्जुमन स्कूल में किया मुस्लिम शिक्षकों का सम्मान

कुरैशी समाज की नो दहेज, नो गार्डन, नो डिनर मुहिम के तहत सादगी से हुई शादी