नगर निगम चुनाव में निर्दलीय व बागी उम्मीदवार बने कांग्रेस और भाजपा के लिए गलफांस
नगर निगम चुनाव में निर्दलीय व बागी उम्मीदवार बने कांग्रेस और भाजपा के लिए गलफांस
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जयपुर/जोधपुर/कोटा (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राजस्थान में शीघ्रता से हो रहे नगर निगम चुनावों में कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व को बहुत से वार्डों में पार्टी उम्मीदवारों की जीत पर पानी फिरता नज़र आ रहा है। जिसकी वजह निर्दलीय और बागी उम्मीदवार हैं। जो मजबूती से न सिर्फ प्रचार कर रहे हैं, बल्कि लगातार जन सम्पर्क में जनहित के लिए किए गए अपने कार्यों को याद दिलाकर यह बता रहे हैं कि "हम आपके अपने हैं और बरसों से आपकी सेवा कर रहे हैं तथा हमारी पार्टी ने हमारे से साथ धोखा किया है। इसलिए आप हमें विजयी बनाएं ताकि हम नगर निगम में पहुंच कर पहले से ज्यादा आपकी सेवा कर सकें।"
तीन शहरों की छह नगर निगमों में हो रहे चुनाव दो चरणों में हैं, पहले चरण में 29 अक्टूबर को और दूसरे चरण में एक नवम्बर को। प्रमुख रूप से इन चुनावों में दो ही पार्टी मैदान में हैं, यानी कांग्रेस व भाजपा तथा सियासी तौर पर दोनों ही पार्टियों के प्रदेश नेतृत्व का सब कुछ दांव पर लगा हुआ है, ख़ासकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री गहलोत ने नगर निगमों का विभाजन कर यह चुनाव इसीलिए टलवाए थे कि आसानी से कुछ निगम जीत जाएं, ताकि पार्टी आलाकमान के सामने इज्जत बच जाए, वरना तो यह चुनाव नवम्बर 2019 में ही हो जाते।
वहीं भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया जो पूर्व मुख्यमन्त्री वसुंधरा राजे की जगह भरने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए भी यह चुनाव बड़ी अहमियत वाले हैं, क्योंकि अगर भाजपा इन चुनावों में तीन या चार निगमों पर अपनी सत्ता कायम कर लेती है, तो इसका सीधा लाभ सतीश पूनिया को होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर वसुंधरा खेमा हार का ठीकरा सतीश पूनिया के सिर फोड़ेगा और पार्टी नेतृत्व पर प्रदेशाध्यक्ष बदलने का दबाव बढाएगा। ऐसा ही मुख्यमंत्री गहलोत के साथ होगा, अगर तीन या चार निगमों में कांग्रेस की जीत हो जाएगी, तो फिर गहलोत की कुर्सी और मजबूत हो जाएगी तथा फिर सचिन पायलट गुट के गहलोत विरोधी नेताओं को पूरी तरह से सत्ता व संगठन से बेदखल कर दिया जाएगा। अगर इन चुनावों में कांग्रेस की हार हो जाएगी, तो यह हार सीधी गहलोत की हार मानी जाएगी और एक बार फिर उनको हटाने की मांग जोर पकड़ेगी।
इसलिए दोनों पार्टियों ने निगम चुनाव जीतने के लिए पूरा दमखम लगा रखा है। इस दमखम का मतलब कांग्रेस में सिर्फ गहलोत गुट का दमखम है, क्योंकि गहलोत विरोधी तमाम कांग्रेसी नेता अन्दरखाने सभी निगमों में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को हराने का तिकड़म लगा रहे हैं, ताकि इस हार के बाद वे मुख्यमंत्री गहलोत को हटाने के अभियान को और मजबूत कर सकें। वहीं भाजपा में इस दमखम का मतलब है कि आरएसएस के सभी संगठन छह के छह नगर निगमों पर सत्ता स्थापित करने के लिए कमर कस चुके हैं। यह इसलिए कि इस चुनाव में जीत के बाद आरएसएस नेतृत्व और खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह यह साबित करना चाहते हैं कि राजस्थान में वसुंधरा राजे के बिना भी आसानी से चुनाव जीता जा सकता है तथा वसुंधरा राजे का विकल्प सतीश पूनिया के रूप में मिल चुका है। लेकिन आरएसएस के इस प्रयास की पकती खीर में वसुंधरा राजे का गुट अन्दरखाने खामोशी से मिट्टी डालने की पूरी कोशिश कर रहा है।
कांग्रेस व भाजपा एक दूसरी पार्टी के उम्मीदवारों को पटकनी देने और खुद की जीत सुनिश्चित करने के लिए बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में उतार चुकी हैं। वहीं काफी उम्मीदवार ऐसे भी मैदान में हैं, जो टिकट नहीं मिलने की वजह से अपनी पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ रहे हैं। कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवार भी मैदान में हैं और वे भी अपनी किस्मत का दरवाज़ा खोलने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार निर्दलीय, बागी और क्षेत्रीय पार्टियों के काफी उम्मीदवार मैदान में हैं और इनमें से बहुत से मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं तथा दोनों पार्टियों के अधिकृत उम्मीदवारों के पसीना ला चुके हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि सभी नगर निगमों में एक अच्छी खासी संख्या निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत कर आएगी तथा इसी जानकारी ने कांग्रेस व भाजपा नेतृत्व के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है। हालांकि दोनों ही पार्टियां अभी से ही जीताऊ निर्दलीयों से सम्पर्क साध रही हैं।
जो मजबूत निर्दलीय या बागी उम्मीदवार मैदान में हैं वे बरसों से अपने क्षेत्र में जनता की सेवा कर रहे हैं तथा कुछ किसी विशेष जाति या गली मोहल्ले से सम्बन्धित भी हैं। जो अपने साथ टिकट वितरण में हुए अन्याय को प्रचारित कर रहे हैं, साथ ही जनहित में खुद के किए कामों व सेवा को भी बता कर विजयी बनाने की अपील कर रहे हैं। इस प्रकार निर्दलीय व बागी उम्मीदवार दोनों पार्टियों के लिए गलफांस बन चुके हैं। जहाँ तक बात राजधानी जयपुर के दोनों निगमों की है, तो इनके बारे में सियासी चौपालों पर चर्चा है कि 40 से 50 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत सकते हैं। यानी दोनों निगमों में कांग्रेस व भाजपा को निर्दलीयों के सहयोग से ही सत्ता मिलनी लग रही है तथा ऐसी हालत में मतगणना के बाद हाॅर्स ट्रेडिंग, बाड़ेबन्दी आदि का खेल शुरू होगा, जो किसी भी लिहाज से जनता और इन शहरों के विकास के हित में नहीं होगा, क्योंकि खरीद फरोख्त से स्थापित नगर निगमों की सत्ता पार्षद के रूप में जन सेवक नहीं बल्कि दलाल पैदा करेगी।
(24-10-2020)
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