नगर निगम चुनाव में भाजपा का मुस्लिम उम्मीदवार उतारना मजबूरी, सोची समझी रणनीति या सम्मानजनक भागीदारी ?

नगर निगम चुनाव में भाजपा का मुस्लिम उम्मीदवार उतारना मजबूरी, सोची समझी रणनीति या सम्मानजनक भागीदारी ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान के तीन बड़े शहरों जयपुर, जोधपुर और कोटा में नव गठित छह नगर निगमों के चुनाव 29 अक्टूबर और एक नवम्बर को हैं। इन चुनावों में भाजपा ने अच्छी खासी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार भी मैदान में उतारे हैं। जिसके बारे में सियासी चौपालों पर अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसे भाजपा की मजबूरी बता रहे हैं, तो कुछ लोग एक सोची समझी रणनीति, तो कुछ लोग इसे सबका विश्वास व सबकी भागीदारी बता रहे हैं। लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं है, जितनी सरलता से कही जा रही है।

भाजपा जिसकी नीतियों व कार्यक्रमों को लेकर मुस्लिम समुदाय में यह खुली धारणा है कि भाजपा मुसलमानों की विरोधी है और उसे मुसलमानों का वजूद इस मुल्क पसंद नहीं है। मुस्लिम समुदाय में यह धारणा भाजपा के उत्थान, उसकी घोषित नीतियों व कार्यक्रमों तथा उसके नेताओं के भड़काऊ बयानों से स्थापित हुई है। बाबरी मस्जिद का विध्वंस और तब के साम्प्रदायिक दंगे, 2002 के गुजरात दंगे और मौजूदा मोदी सरकार एवं भाजपा की राज्य सरकारों की कार्य प्रणाली को देखते हुए हर मुस्लिम के दिलो दिमाग में यह बात पूरी तरह से बैठ चुकी है कि भाजपा मुस्लिम विरोधी पार्टी है। यह बात दीवार पर लिखी हुई सच्चाई की तरह है, चाहे कोई कितनी ही अगर-मगर करके सफाई दे।


अब बात नगर निगम चुनाव की, इन चुनावों में भाजपा ने काफी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। ऐसा राजस्थान में भाजपा ने पहली बार किया है। यह उस भाजपा ने टिकट दिए हैं, जिसने 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी, बिहार, बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में एक भी टिकट मुस्लिम को नहीं दी थी। यही हाल उसने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में किया, जहाँ इतने बड़े प्रदेश में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा, जबकि यहाँ काफी सीटें मुस्लिम बाहुल्य हैं। बात 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव की करें, तो यहाँ की 200 सीटों में से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा और यहाँ तक कि अपने कद्दावर कैबिनेट मंत्री यूनुस खान की भी टिकट काट दी गई तथा फिर सचिन पायलट के सामने टोंक जैसी मुस्लिम बाहुल्य सीट पर मजबूरन घोषित उम्मीदवार को हटाकर यूनुस खान को मैदान में उतारा।

ऐसी सोच वाली भाजपा के दिल में नगर निगम चुनाव में मुस्लिम प्रेम कैसे उमड़ा ? इस सवाल के दो जवाब सियासी गलियारों में मिलते हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि "एक तो भाजपा की मजबूरी है, क्योंकि उसे सभी सीटों पर चुनाव लड़ना है तथा मुस्लिम बाहुल्य वार्डों में मुस्लिम के अलावा किसी और को टिकट देने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरा जवाब यह है कि यह भाजपा की सोची समझी रणनीति है, वो कुछ जगह वोट बांटकर कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशियों को हरा देगी और अपने चहेते निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव जीताकर बाद में खुद के साथ जोड़ लेगी।" सियासी गलियारों में इस सन्दर्भ में एक चर्चा यह भी है कि "अगर इनमें से उसके कुछ मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीत जाते हैं, तो उसकी सीटों में बढ़ोतरी होगी और उसके लिए निगमों में सत्ता स्थापित करनी आसान हो जाएगी।"

जो लोग भाजपा को पसंद नहीं करते, उनका मानना है कि "इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि भाजपा निगम चुनाव जीतने के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर मुसलमानों का सहयोग चाहती है, यह उसकी चुनावी मजबूरी है। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मुसलमानों के सहयोग के बिना सत्ता स्थापित करना चाहती है, फिर तो यह उसकी दोहरी नीति है, जो न सिर्फ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है, बल्कि खुद मुस्लिम समुदाय के लिए भी बेहद नुकसानदेह है।" कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मुस्लिम वोटों को तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों की गुलामी से मुक्ति दिलाना चाहते हैं, इन लोगों का इस सन्दर्भ में मानना है कि "मुस्लिम क़ौम को किसी भी पार्टी का वोट बैंक बनने की बजाए, दूसरी क़ौमों की तरह सभी पार्टियों को अपने अवसर व लाभ देखकर वोट देना चाहिए।" 

भाजपा से जुड़े हुए मुसलमानों का मानना है कि "भाजपा सबका साथ, सबका विकास व सबका विश्वास चाहती है और इसी सन्दर्भ में उसने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, इसलिए इन वार्डों में मुसलमानों को भाजपा को वोट देना चाहिए, ताकि भाजपा नेतृत्व मुस्लिम वोटों की अहमियत की ताकत को समझ सके तथा भविष्य में मुसलमानों को सम्मानजनक भागीदारी दे।" लेकिन भाजपाई मुसलमानों की इस बात से एक भी मुस्लिम तन्जीम इत्तेफाक (सहमति) नहीं रखती है। मुस्लिम तन्जीमों (संगठनों) का मानना है कि भाजपा संवैधानिक व्यवस्था व लोकतांत्रिक मूल्यों को खोखला कर रही है, इसलिए मुसलमानों को किसी भी सूरत में भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए, चाहे भाजपा की तरफ से उम्मीदवार मुस्लिम ही क्यों न हो।"

भाजपा ने जयपुर, जोधपुर और कोटा की छह नगर निगमों में मुस्लिम उम्मीदवार सिर्फ मुस्लिम बाहुल्य वार्डों से उतारे हैं, एक भी मुस्लिम उम्मीदवार ऐसे वार्ड से नहीं उतारा है, जहाँ मुसलमानों के वोट बहुत ही कम हों। कमोबेश सभी ऐसे वार्डों में मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए हैं, जहाँ कांग्रेस ने भी मुस्लिम को ही टिकट दिया है। भाजपा ने सबसे ज्यादा जयपुर हैरिटेज नगर निगम से मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। यहाँ कुल 17 टिकट मुस्लिम को दिए हैं, जयपुर ग्रेटर नगर निगम में 3, जोधपुर के नगर निगमों में 17 और कोटा में 11 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। अब यह तो मतगणना के दिन ही मालूम चलेगा कि भाजपा अपनी इस रणनीति में कामयाब होती है या नहीं। 
(24-10-2020)
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