भारत का बहादुर और न्यायप्रिय शासक ; शेरशाह सूरी
भारत का बहादुर और न्यायप्रिय शासक ; शेरशाह सूरी
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एम ताहिर खान
भारत के सबसे बड़े राजमार्ग जीटी रोड या सड़क ए आजम के निर्माता और सूरी वंश के न्यायप्रिय व बहादुर शासक शेरशाह सूरी, जिन्होंने अपने पांच साल के छोटे से शासनकाल में भारत को चरमोत्कर्ष पर पहुंचा दिया। इतने कम समय में शेरशाह ने बहुत से विकास कार्य किए। शेरशाह सूरी एक जनप्रिय शासक थे, जो बिना किसी भेदभाव के सभी के साथ समान व्यवहार किया करते थे।
शेरशाह सूरी का जन्म 1472 ईस्वी में पंजाब के होशियारपुर शहर में बजवाड़ा नामक स्थान पर हुआ था। इनका बचपन का नाम फरीद खान था। उनके पिता का नाम हसन खान सूरी था। जो सासाराम (बिहार) के जमींदार थे। शेरशाह सूरी में बचपन से ही एक बहादुर और न्यायप्रिय शासक के गुण थे। इतिहासकार डाॅक्टर पवित्र शर्मा की पुस्तक 'शेरशाह सूरी' के अनुसार लगभग ग्यारह वर्ष की उम्र में शेरशाह सूरी को लाहौर के गवर्नर ने उसके गुणों को देखकर उसे एक जागीर सौंपी थी।
जब शेरशाह की पढ़ाई पूरी हो गई थी तो जौनपुर के शासक जमाल खां ने शेरशाह को एक बड़ी जागीर का हाकिम बनाया। शेरशाह ने अपनी जागीर के लोगों की समस्याओं को दूर किया और किसानों को लूटने वाले डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया। शेरशाह को भ्रष्टाचारियों और अत्याचारियों से सख्त नफरत थी। उसने इन अत्याचारियों को सख्त सजा दी और अपनी जागीर के लोगों का दिल जीत लिया। लेकिन कुछ समय बाद वह बिहार के शासक बहार खां लोहानी के दरबार में चला गया और वहां नौकरी करने लगा। यह उस समय की बात है जब दिल्ली में इब्राहिम लोदी का शासन था और बाबर दिल्ली की तरफ बढ़ रहा था।
एक दिन बहार खां लोहानी शिकार पर गया और अपने साथ शेरशाह सूरी को भी ले गया। लेकिन अचानक बहार खां पर शेर ने हमला कर दिया। उसी वक्त बहादुर शेरशाह सूरी ने अपनी तलवार से शेर को एक ही वार में मौत के घाट उतार दिया। बहार खां ने खुश होकर शेरशाह जो उस वक्त फरीद खान था। उसे शेरखान की उपाधि दी और अपने बेटे का गुरु और संरक्षक बना दिया। बाबर जो पानीपत के युद्ध के बाद दिल्ली का शासक बन गया था, उसे शेरशाह सूरी अयोग्य शासक मानता था और मुगलों को भारत से खदेड़कर फिर से भारत में अफगानों के परचम को लहराना चाहता था। इसलिए शेरशाह सूरी बाबर की सेना में शामिल हो गया और आगरा रहकर मुग़लों की प्रशासनिक व सैन्य व्यवस्था की जानकारी प्राप्त करने लगा।
एक दिन इस नौजवान और बहादुर योद्धा पर बाबर की नज़र पड़ी और बाबर ने उसे देखकर अपने बेटे हुमायूँ और मंत्रियों से कहा की इस नौजवान पर नज़र रखना क्योंकि इसे देखकर ऐसा लग रहा है की यह आने वाले समय में भारत का बादशाह बनेगा। मुग़ल बादशाह बाबर की कही हुई बात आगे चलकर सत्य भी साबित हुई। कुछ समय बाद शेरशाह सूरी आगरा छोड़कर बिहार आ गया और बहार खां के बेटे को गद्दी पर बिठा कर उसका संरक्षक बन गया।
बहार खां का बेटा नाममात्र का शासक था। सारा काम काज शेरशाह सूरी सम्भालता था। बिहार में रहकर शेरशाह सूरी ने बंगाल पर आक्रमण करने की रणनीति बनाई और बंगाल को जीत लिया और बंगाल के बाद उसने चुनार के किले और रायसेन के किले पर भी कब्ज़ा कर लिया तथा धीरे धीरे शेरशाह ने अन्य पड़ौसी राज्यों को भी जीत लिया। यह बात हुमायूँ को पता चली तो वह शेरशाह का सामना करने के लिए 1539 ईस्वी में चौसा के मैदान में आ धमका। लेकिन इस युद्ध में हुमायूँ की हार हुई। हुमायूँ ने एक बार फिर 1540 ईस्वी में बिलग्राम नामक स्थान पर शेरशाह का सामना किया। लेकिन अपनी कमजोर रणनीति के कारण वह इस युद्ध में भी पराजित हो गया और दिल्ली छोड़कर भाग गया।
इस प्रकार शेरशाह सूरी 1540 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुआ और भारत का बादशाह बन गया। उसने मारवाड़, रोहतासगढ़, चूनार, रायसेन, बिहार, बंगाल आदि पर कब्ज़ा कर लिया और भारत को एकसूत्र में बांध दिया। शेरशाह सूरी बहादुर होने के साथ साथ जनप्रिय और न्यायप्रिय भी था। उसने जनता की भलाई के लिए अनेक कुओं, सरायों और अस्पतालों का निर्माण करवाया। उसने 1541 ईस्वी में भारत के सबसे बड़े राजमार्ग सड़क ए आज़म (वर्तमान ग्रांट ट्रंक रोड या जीटी रोड) का निर्माण करवाया। यह राजमार्ग अफगानिस्तान के काबुल से लेकर बांग्लादेश के चटगाँव तक है और इस रोड का निर्माण शेरशाह सूरी ने उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण के राज्यों को जोड़ने के लिए किया था, ताकि आवागमन आसान हो सके।
इसके अलावा शेरशाह ने आगरा से जोधपुर, लाहौर से मुल्तान और आगरा से बुरहानपुर तक की भी सड़कें बनवाई तथा इन सड़कों के आस पास पेड़ पौधे, कुएं, सराए आदि बनवाए और इन सरायों में सरकार की तरफ से नि:शुल्क भोजन मिलता था। जिससे राहगीरों को आसानी रहती थी। यह सड़कें आज भी प्रचलित हैं। यानी शेरशाह सूरी की सड़कें आज भी देश में मौजूद हैं और करीब पांच सौ साल बाद भी उनकी वही अहमियत है। शेरशाह सूरी आधुनिक भारत की सड़कों के निर्माता थे और बिना विशेष टेक्नोलॉजी के उनके अधिकारियों ने इतनी लम्बी सड़कें बनाई, वो भी छोटे से कार्यकाल में। आज यह एक रिसर्च का विषय है सड़क निर्माण अधिकारियों के लिए। जो आधुनिक टेक्नोलॉजी और विशेष संसाधन होते हुए भी सड़कों का समय पर निर्माण व मरम्मत नहीं कर पाते।
शेरशाह सूरी ने 178 ग्रेन का चांदी का रुपया व 380 ग्रेन का तांबे का दाम चलवाया था। शेरशाह सूरी द्वारा चलाया गया रुपया आज भी भारत समेत मालदीव, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मॉरीशस, नेपाल आदि देशों में मुद्रा के रूप में प्रचलित है। शेरशाह सूरी ने डाक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया और आमजन को इसके इस्तेमाल की इजाजत भी दी। शेरशाह सूरी ने पाटलिपुत्र को पटना नाम से पुन: स्थापित किया। इतिहासकार डाॅक्टर पवित्र शर्मा की पुस्तक 'शेरशाह सूरी' के अनुसार शेरशाह सूरी ने कई कॉलेजों का निर्माण करवाया और छात्रों को छात्रवृतियां भी प्रदान की।
शेरशाह सूरी ने किसानों से राजस्व वसूली के नियमों को सरल बनाया और उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाई तथा हर बड़े नगर में न्यायालय बनवाया। उसने सभी धर्मों के लोगों को समान अवसर दिए। कई हिन्दुओं को उसने उच्च पद भी दिए। उसका प्रमुख सेनानायक ब्रह्मजीत हिन्दू था। शेरशाह ने नगरीय प्रशासन और सैन्य प्रशासन में सुधार किए। यह सब काम सिर्फ पांच साल के शासन में ही किए थे और उस समय किए जब न तो मोबाइल, इन्टरनेट था, ना हवाईजहाज, कार, मोटरसाइकिल थी। आज के शासकों के लिए यह एक अध्ययन का विषय है। जो जनहित का ढिंढोरा तो पीटते हैं, लेकिन करते कुछ नहीं और सब कुछ होते हुए बरसों तक उनकी योजनाएं धरातल पर नहीं उतरती हैं।
22 मई 1545 ईस्वी को कालिंजर के किले को जीतने के लिए उक्का नामक आग्नेयास्त्र चलाते वक्त धमाके से शेरशाह सूरी की मौत हो गई। शेरशाह सूरी का मकबरा सासाराम (बिहार) में है, जो कला का प्रसिद्ध नमूना है। अगर शेरशाह सूरी कुछ समय और दिल्ली की गद्दी पर बैठा रहता तो आज आधुनिक भारत की तस्वीर कुछ और ही होती। विदेशी इतिहासकार एच सी कीन के अनुसार "शेरशाह सूरी जैसी बुद्धिमता किसी और सरकार ने तो क्या अंग्रेजों ने भी नहीं दिखाई।" ऐसे थे भारत के महान शासक व आधुनिक भारत के निर्माता शेरशाह सूरी।
(09-10-2020)
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