क्या गहलोत सरकार और उसके मुस्लिम नेता एक उर्दू अध्यापक की हत्या करवाना चाहते हैं ?
क्या गहलोत सरकार और उसके मुस्लिम नेता एक उर्दू अध्यापक की हत्या करवाना चाहते हैं ?
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एक नवम्बर से यह उर्दू अध्यापक पैदल चल रहा है, सरकार की उर्दू और मदरसा विरोधी नीतियों के खिलाफ़ चूरू से दांडी (गुजरात) तक "दांडी यात्रा" पर, लेकिन यह लेख लिखे जाने तक सरकार का कोई भी प्रतिनिधि इनसे मिलने नहीं आया और ना ही सत्ता और विपक्ष का कोई प्रमुख मुस्लिम नेता मिलने आया। पैरों में छाले पड़ गए हैं, लेकिन सत्ता को एक अध्यापक की पीड़ा नजर नहीं आ रही।
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान सरकार उर्दू विरोधी है, राजस्थान सरकार मदरसा तालीम और पैराटीचर्स की विरोधी है, यह सब सरकार की नीतियों व घोषणाओं से स्पष्ट नजर आता है। उर्दू अध्यापक और पैराटीचर्स बार-बार सरकार से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उसके कानों पर जूं भी नहीं रेंग रही है। सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पीसीसी अध्यक्ष व शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा और अल्पसंख्यक मामलात मन्त्री सालेह मोहम्मद या तो सिर्फ ठण्डे छींटे देते हैं या फिर इस विषय पर कोई बात ही नहीं करते। जिससे राजस्थान की उर्दू तालीम और मदरसा तालीम एक तरह से चौपट हो गई है।
बार-बार के मांग पत्र सौंपने और धरना प्रदर्शन करने के बाद दुखी-पीड़ित एक उर्दू अध्यापक शमशेर भालू खान (पुत्र पूर्व विधायक भालू खान चूरू) ने दांडी यात्रा निकालने की घोषणा कर दी। जो बड़ी विचित्र घोषणा थी, लेकिन अपनी घोषणा पर अमल करते हुए फौलादी इरादे वाला यह उर्दू अध्यापक एक नवम्बर से तय वक्त पर चूरू से दांडी के लिए पैदल रवाना हो गया। यात्रा 1090 किलोमीटर, वो भी सिर्फ पैदल। यह लेख लिखे जाने तक करीब 400 किलोमीटर की यात्रा पूरी हो चुकी है। चलते-चलते पांवों में सूजन आ गई है, तलवों में छाले पड़ कर जख्म हो गए हैं। कई शुभचिंतकों ने यात्रा समाप्त करने की गुजारिश की है, लेकिन इरादे का पक्का यह जूनूनी व जज़्बाती अध्यापक लगातार पैदल चल रहा है।
इस यात्रा में अभी तक इनसे सत्ता पक्ष और विपक्ष का कोई भी बड़ा नेता व विधायक मिलने नहीं आया है। चूरू से कांग्रेस के सांसद व विधायक प्रत्याशी रहे रफीक मण्डेलिया यात्रा शुरू हुई तब आए और उसके बाद कोई खैर खबर नहीं ली। मण्डेलिया मुख्यमंत्री गहलोत के नजदीकी समझे जाते हैं। सवाल यह है कि क्या गहलोत सरकार और उसके मुस्लिम नेता इस उर्दू अध्यापक की हत्या करवाना चाहते हैं ? अगर ऐसे ही पैदल चलते-चलते खुदा ना करे उर्दू के इस दीवाने को कुछ हो गया तो उसका जिम्मेदार कौन होगा ?
कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेता जैसे कैबिनेट मन्त्री व पोकरण विधायक सालेह मोहम्मद, वक्फ बोर्ड चेयरमैन डाॅक्टर खानू खान बुधवाली, शिव विधायक पूर्व मन्त्री अमीन खान, फतेहपुर विधायक हाकम अली खान, किशनपोल विधायक अमीन कागजी, आदर्श नगर विधायक रफीक खान, सवाई माधोपुर विधायक दानिश अबरार, कामां विधायक जाहिदा खान, रामगढ़ विधायक सफिया खान, नगर विधायक वाजिब अली, पूर्व मन्त्री नवाब दुर्रू मियां, पूर्व मन्त्री नसीम इन्साफ, पूर्व मन्त्री हबीबुर्रहमान, पूर्व विधायक मकराना जाकिर हुसैन गैसावत, पूर्व विधायक सवाई माधोपुर अलाउद्दीन आजाद, पूर्व विधायक चूरू मकबूल मण्डेलिया, सांसद व विधायक प्रत्याशी चूरू रफीक मण्डेलिया, विधायक प्रत्याशी सईद अन्सारी जोधपुर, विधायक प्रत्याशी प्रोफेसर अय्यूब खान जोधपुर, विधायक प्रत्याशी नईमुद्दीन गुड्डू कोटा आदि की क्या यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वो अपनी सरकार से बात करें और इस दीवाने अध्यापक की पीड़ादायक पैदल यात्रा का समापन करवाएं ?
क्या मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी आंखों व कानों के पट्टी बांध रखी है, जो उनके पास यह सूचना किसी अधिकारी व नेता ने नहीं पहुंचाई ? अगर पहुंचाई है तो उन्होंने अभी तक किसी आरएएस स्तर के अधिकारी को भेजकर मांग पत्र लेकर यात्रा समाप्त क्यों नहीं करवाई ? जब गुर्जर आन्दोलन में आईएएस अधिकारी और मन्त्री को गहलोत धरना स्थल पर भेज सकते हैं, तो उर्दू आन्दोलन पर मांग सुनने के लिए एक आरएएस अधिकारी और विधायक को क्यों नहीं भेज सकते ? यह शर्मनाक भेदभाव और अत्याचार है उर्दू ज़बान व इस उर्दू अध्यापक के साथ।
सवाल विपक्षी पार्टी भाजपा से भी है, लेकिन उसकी डिक्शनरी में तो उर्दू व मदरसा तालीम के विकास के शब्द ही नहीं छपे हुए हैं। उर्दू और मदरसा तालीम का सबसे ज्यादा बेड़ागरक भाजपाई मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के शासन में शिक्षा मन्त्री वासुदेव देवनानी ने किया, तब सरकार में नम्बर दो की हैसियत वाले कैबिनेट मन्त्री यूनुस खान उर्दू तालीम, मदरसा तालीम और पैराटीचर्स के साथ हुए इस घौर अन्याय पर चुप्पी साधे बैठे रहे। लेकिन अब तो यूनुस खान चुनाव हार चुके हैं, सरकार उनकी नहीं है। उन्हें विपक्षी नेता होने का सबूत देना चाहिए। उन्हें उर्दू और मदरसा तालीम पर अपना मुंह खोलना चाहिए, लेकिन वे खामोश हैं।
उनकी खामोशी यह सवाल पैदा करती है कि अगर यूनुस खान को उर्दू और मदरसा तालीम से कोई मतलब नहीं है, तो फिर उन्हें ऐसी किसी भी सीट से चुनाव लड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जहाँ उर्दू तालीम से मुहब्बत करने वाले वोटर अच्छी संख्या में हों ? आप उनकी सोच को देखिए यह पैदल यात्रा उनके पुराने विधानसभा क्षेत्र डीडवाना से होकर निकली, तब वे आस-पास के इलाकों में थे, लेकिन पैदल चलते इस उर्दू अध्यापक का हौसला बुलंद करने के लिए माला पहनाने भी कहीं सड़क पर आकर खड़े नहीं हुए। होना तो यह चाहिए था कि वे डीडवाना में एक बड़ा कार्यक्रम करते और इस उर्दू अध्यापक का इस्तकबाल कर सरकार को खरी-खौटी सुनाते, लेकिन यह मौका उन्होंने गंवा दिया। या तो खुद उनमें सियासी सूझ-बूझ नहीं है, या फिर उनके सलाहकार इस लायक नहीं हैं कि वो अपने बाॅस कोई अच्छी सलाह समय पर दे दें ? ऐसा ही सवाल पूर्व विधायक धौलपुर एडवोकेट सगीर अहमद से भी है कि वे कहां हैं और उनकी सोच भी यूनुस खान जैसी है या कुछ और ?
यहाँ सबसे बड़ा सवाल रफीक मण्डेलिया से है कि उन्होंने क्यों एक मासूम भोलेभाले जूनूनी उर्दू अध्यापक को चने के पेड़ पर चढाया ? सवाल वक्फ बोर्ड चेयरमैन डाॅक्टर खानू खान बुधवाली से भी है कि आप मुख्यमंत्री के खासमखास हैं और आपके राज में एक पूर्व विधायक का पुत्र वो भी कांग्रेसी घराने का पैदल चल रहा है और आपको उससे मिलने की भी फुरसत नहीं मिली ? जनाब जिस कुर्सी पर आप बैठे हैं, वहाँ कल कोई और भी बैठा था, जिसे लोग भूल गए। यही सवाल फतेहपुर विधायक हाकम अली खान से है कि जनाब आप कहाँ हैं ? आपकी यह खामोशी आपको ही भारी पड़ेगी। अपनी पार्टी की गुलामी कीजिए, मुख्यमंत्री की हाँ में हाँ मिलाइए, लेकिन उर्दू तालीम, मदरसा तालीम, पैराटीचर्स आदि मुद्दों पर खामोश तमाशबीन बनना अक्लमंदी नहीं है। आप तो सिर्फ विधायक हैं, यूनुस खान तो नम्बर दो की हैसियत वाले कैबिनेट मन्त्री थे !
(11-11-2020)
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जब तक दूसरे समाज की तरह अपना हक लेना हम नही सीखेंगे ऐसे हो नज़रंदाज़ किया जाएगा।।
ReplyDeleteवोट पूरे दिए है तो काम भी पूरे करवाने के लिए इनका बाइकाट और विरोध ही सहारा है