दांडी पैदल यात्रा का चीरवा घाटा पर सामाजिक संगठनों ने किया लाजवाब स्वागत
दांडी पैदल यात्रा का चीरवा घाटा पर सामाजिक संगठनों ने किया लाजवाब स्वागत
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सरकारी बैठक व आश्वासन पत्र के बाद स्थगित हुआ आन्दोलन
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एक बार फिर सियासी साजिश के शिकार हुए उर्दू टीचर्स और पैराटीचर्स
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सरकारी बैठक व आश्वासन पत्र के बाद स्थगित हुआ आन्दोलन
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एक बार फिर सियासी साजिश के शिकार हुए उर्दू टीचर्स और पैराटीचर्स
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उदयपुर/जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान कायमखानी महासभा की जिला इकाई भीलवाड़ा और अन्य सामाजिक संगठनों ने चूरू से दांडी तक निकाली जा रही पैदल यात्रा का समर्थन किया और 17 नवम्बर को चीरवा घाटा सुरंग उदयपुर पर पैदल यात्री शमशेर भालू खान का स्वागत व सम्मान किया। महासभा ने मुख्यमंत्री के नाम एक मांग पत्र भी लिखा है, जो 18 नवम्बर को जिला कलेक्टर भीलवाड़ा को पेश किया गया। कायमखानी महासभा के अलावा मुस्लिम महासभा, मुस्लिम महासंघ और इलाकाई अन्जुमनों ने भी यहाँ पैदल यात्रियों का जबरदस्त स्वागत व सम्मान किया।
जिसका करीब एक घण्टे का पूरा लाइव इकरा पत्रिका के स्थानीय प्रतिनिधि फारूक़ खान मोनू ने बनाकर वायरल किया। इस लाजवाब सम्मान और लाइव प्रसारण के बाद उसी वक्त लोगों में जबरदस्त बेदारी आई और जो आन्दोलन 17 दिन से ठण्डा पड़ा हुआ था, उसमें अचानक ऐसा जोश आया कि उसी दिन रात को लोगों ने अपने अपने इलाके में आन्दोलन और पैदल यात्रा की घोषणा कर दी। अगले दिन 18 नवम्बर को चूरू, झुन्झुनूं, फतेहपुर, सीकर, सवाई माधोपुर में आस पास के गांवों से सैकड़ों लोग पैदल चलकर आए और विरोध प्रदर्शन किया। यह जोश 19 और 20 नवम्बर को भी जारी रहा तथा इन दो दिनों में टोंक, कोटा, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, अलवर आदि जिलों में भी जबरदस्त आन्दोलन हुआ। लेकिन 22 नवम्बर को यह आन्दोलन सियासी साजिश का शिकार हो गया।
चीरवा घाटा सुरंग उदयपुर के स्वागत कार्यक्रम के बारे में युवा कायमखानी महासभा भीलवाड़ा के जिलाध्यक्ष इमरान कायमखानी ने बताया कि भीलवाड़ा शहर और आस पास के कायमखानी गांवों से कौम के प्रमुख सरदार सुबह 11 बजे सर्किट हाउस के पास से रवाना होकर दोपहर 3 बजे चीरवा घाटा सुरंग उदयपुर पहुंचे। यहाँ सभी ने दांडी पैदल यात्रा का स्वागत और सम्मान कर उनकी हौसला अफजाई की। पैदल यात्री शमशेर भालू खान को विजय स्तम्भ का स्मृति चिन्ह, दांडी पैदल यात्रा की तस्वीर भेंट कर और उन्हें खादी की मालाएं, पगड़ी और शाॅल पहनाकर स्वागत व सम्मान किया।
राजस्थान कायमखानी महासभा जिला इकाई भीलवाड़ा के अध्यक्ष सांवत खान बेसकलाई पूर्व सरपंच और युवा जिलाध्यक्ष इमरान कायमखानी ने इस स्वागत कार्यक्रम के बाद सरकार से मांग की कि पूर्व विधायक चूरू मरहूम जनाब भालू खान के पुत्र उर्दू शिक्षक जनाब शमशेर भालू खान एक नवम्बर से दांडी (गुजरात) के लिए पैदल यात्रा कर रहे हैं। यह यात्रा चूरू जिला मुख्यालय से प्रारम्भ होकर मेवाड़ इलाके में पहुंच चुकी है। करीब 1090 किलोमीटर लम्बी इस यात्रा पर निकले शमशेर भालू खान के पैरों में छाले पड़ कर पैर जख्मी हो चुके हैं। लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से किसी प्रकार का कोई सन्देश इनकी मांगों के सन्दर्भ में नहीं आया है, जो बहुत ही अफसोसनाक बात है। हम गहलोत सरकार के इस रवैये की कड़े शब्दों में निन्दा करते हैं और शमशेर भालू खान की इस यात्रा का पूरा समर्थन करते हैं।
उन्होंने कहा कि कायमखानी महासभा मुख्यमंत्री से मांग करती है कि आप उर्दू टीचर, उर्दू तालीम, मदरसा पैराटीचर्स से सम्बंधित इनकी सभी मांगों को शीघ्रता से माने और उसका आदेश जारी कर इस यात्रा का ससम्मान समापन करवाएं। साथ ही शमशेर भालू खान को पूरी तरह से पुलिस सुरक्षा और चिकित्सा सेवा उपलब्ध करवाएं। खुदा ना करे अगर इस पीड़ादायक पैदल यात्रा में इनके साथ कोई अनहोनी हो जाती है या यह बीमार हो जाते हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी गहलोत सरकार की होगी और ऐसी किसी दुखदायक बात को कायमखानी क़ौम और उर्दू से मुहब्बत करने वाले समस्त लोग बरदाश्त नहीं करेंगे तथा किसी भी प्रकार का कोई विरोध प्रदर्शन होगा तो उसके लिए स्वयं मुख्यमंत्री जिम्मेदार होंगे।
इस सम्मान कार्यक्रम में सांवत खान बेसकलाई पूर्व सरपंच जिलाध्यक्ष कायमखानी महासभा भीलवाड़ा, हमीद खान पूर्व पार्षद शाहपुरा, रमजान खान नाहर सागर, नवाब खान पूर्व जिलाध्यक्ष कायमखानी महासभा भीलवाड़ा, नाहर खान भीलवाड़ा, मास्टर यासीन खान, मास्टर इस्माईल खान शाहपुरा, यूनुस अली थानेदार, नाहर जी ऑपरेट भीमपुरा, निसार खान बनेड़ा, फारूक खान मोनू, मुस्लिम महासंघ उदयपुर के हाजी मोहम्मद बख्श, राजसमन्द के हाजी मोहम्मद इकबाल सहित काफी लोग शरीक हुए।
आपको बता दें कि चीरवा घाटा सुरंग जंगल में है, जहाँ खतरनाक घाटियां हैं और आबादी न के बराबर है। यह उदयपुर सिटी से करीब 12 किलोमीटर दूर है। यहां भीलवाड़ा, उदयपुर चित्तौड़गढ़, राजसमन्द आदि जिलों के 170 किलोमीटर दूर से भी लोग शमशेर भालू खान का स्वागत करने आए थे। इनका जोश लाजवाब था तथा ऐसा स्वागत पूरी यात्रा में कहीं नहीं हुआ। इकरा पत्रिका के सम्पादक एम फारूक़ ख़ान और उनके साथियों ने इस प्रोग्राम को सफल बनाने के लिए लगातार चार दिन इस इलाके में दौरे किए। इससे पहले 11 नवम्बर को थार न्यूज़ इकरा पत्रिका की साइट पर एक लेख प्रकाशित किया था, "क्या गहलोत सरकार और उसके मुस्लिम नेता एक उर्दू अध्यापक की हत्या करवाना चाहते हैं ?" यह लेख बहुत वायरल हुआ और इसने तहलका मचा दिया। इसी दिन हमने राजसमन्द जिले के हमारे तमाम साथियों को फोन किया, क्योंकि यहाँ शमशेर भालू खान अकेले थे और उनके पैरों में छाले पड़ गए थे। यह बात तब की है जब वे भीम के आस पास जंगल में अकेले पैदल चल रहे थे।
अगले दिन राजनगर, कांकरोली, केलवा, कुंवारिया आदि गांव कस्बों के लोगों ने उनका दिल खोलकर साथ दिया और फिर हर जगह उनका स्वागत करते हुए राजसमन्द जिला मुख्यालय पर 14 नवम्बर को लाजवाब स्वागत किया। जिसके लिए राजसमन्द जिले के लोग बधाई के पात्र हैं। फिर यह यात्रा नाथद्वारा होती हुई देलवाड़ा पहुंची और यहाँ भी काफी लोगों ने इनका स्वागत किया। इस आन्दोलन में सबसे ज्यादा साथ राजसमन्द जिले के लोगों का मिला, जो एक सच्चाई है और दूसरी सच्चाई यह है कि मेवाड़ के लोगों ने जिस अन्दाज़ में इस दांडी पैदल यात्रा का साथ दिया, वैसा नहीं देते तो यह यात्रा 11 नवम्बर को ही पूरी तरह से फ़ेल हो जाती। इसलिए मेवाड़ की धरती के स्नेह व साथ का हमेशा हम लोग (आन्दोलनकारी साथी) कर्जदार रहेंगे।
कैसे फ़ेल हुआ आन्दोलन और क्या हुई सियासी साजिश ?
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17 नवम्बर के ऐतिहासिक स्वागत और फिर 18 व 19 नवम्बर के प्रदेशभर के विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार की आंखें खुली। अगले दिन 20 नवम्बर को मुख्यमंत्री से पांच आदमी की वार्ता करने का सन्देश आया, जिसे शमशेर भालू खान ने ठुकरा दिया और 21 नवम्बर की सुबह यह उदयपुर से निकल गए तथा छह किलोमीटर पैदल चलने के बाद वापस उदयपुर आ गए। यहीं से सब सियासी हथकण्डे शुरू हुए। अगले दिन 22 नवम्बर को वक्फ बोर्ड चेयरमैन डाॅक्टर खानू खान बुधवाली उदयपुर पहुंचे और उन्होंने शमशेर भालू खान से मिलकर एक वार्ता या सहमति पत्र तैयार किया।
इससे पहले शमशेर भालू खान एक ही बात कह रहे थे कि "हमें किसी से नहीं मिलना है, हमारी सभी मांगें सरकार मान ले और उसका आदेश निकाल दे, अगर वार्ता भी होगी तो सिर्फ मुख्यमंत्री जी से आमने सामने बैठकर होगी।" जब 22 नवम्बर के सहमति पत्र व वक्फ बोर्ड चेयरमैन से हुई वार्ता पर सवाल उठने लगे, तो कहा गया कि कल यानी 23 नवम्बर को जयपुर में मुख्यमंत्री से वार्ता होगी और वहीं मांगों को मानने का आदेश जारी होगा। लेकिन 23 नवम्बर को मुख्यमंत्री से कोई वार्ता नहीं हुई और सिर्फ शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा से इनकी देर रात को वार्ता हुई तथा कोई भी मांग नहीं मानी गई और सिर्फ एक नया आश्वासन का पत्र जारी हो गया।
एक और बात, जिसे समझना व याद करना भी यहाँ जरूरी है। वो यह है कि 18 नवम्बर को इन्हीं मुद्दों को लेकर शिक्षा मन्त्री डोटासरा से एक प्रतिनिधि मण्डल मिला था, जिसमें विधायक हाकम अली खान, वक्फ बोर्ड चेयरमैन डाॅक्टर खानू खान बुधवाली और पीसीसी सदस्य शरीफ़ खान आदि शामिल थे। इस प्रतिनिधि मण्डल को डोटासरा ने यह स्पष्ट कहा था कि "यह मांग मुख्यमंत्री जी के स्तर की हैं और मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, आपकी वार्ता जरूर मुख्यमंत्री जी से करवा सकता हूँ।" इतना होने और कहने के बावजूद डोटासरा से वार्ता करने और आश्वासन पत्र लेने का क्या औचित्य है ? यह उर्दू टीचर्स और मदरसा पैराटीचर्स के आन्दोलन के साथ सबसे बड़ी नाइन्साफी व सियासी ठगी हुई है तथा इसके लिए पूरी तरह से वक्फ बोर्ड चेयरमैन डाॅक्टर खानू खान बुधवाली और शमशेर भालू खान जिम्मेदार हैं।
(24-11-2020)
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