नगर निगम चुनाव में मेयर न बनाने को लेकर गहलोत के खिलाफ़ हुआ राजस्थान का मुस्लिम समुदाय
नगर निगम चुनाव में मेयर न बनाने को लेकर गहलोत के खिलाफ़ हुआ राजस्थान का मुस्लिम समुदाय
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प्रदेश कांग्रेस कमेटी के बाहर कांग्रेसी मुस्लिम नेताओं और जन संगठनों ने लगाया धरना
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान में 6 नगर निगमों के चुनाव के बाद मुस्लिम मेयर नहीं बनाने को लेकर मुस्लिम समुदाय में कांग्रेस पार्टी व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ़ गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों में जबरदस्त आक्रोश है, सोशल मीडिया पर गहलोत सरकार की जमकर आलोचना की जा रही है, आलोचना करने में कांग्रेसी मुस्लिम नेता व कार्यकर्ता भी अव्वल सफ (कतार) में खड़े हो गए हैं। कांग्रेस के कुछ जिला व विधानसभा स्तर के मुस्लिम नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया है।
गुस्से की आग इस कदर है कि कांग्रेसी नेताओं व जन संगठनों ने जयपुर स्थित प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर के आगे अनिश्चितकालीन धरना दे दिया, हालांकि बाद में पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से वार्ता करने के बाद धरना उठा लिया गया। यह धरना प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य शरीफ खान के नेतृत्व में लगाया गया। शरीफ़ खान ने पत्रकारों के सामने अपनी पार्टी के फैसले की निन्दा की और इसे मुस्लिम समुदाय के साथ धोखा बताया। विचित्र बात यह है कि पांच नवम्बर से चल रहे इस आक्रोश व गहलोत की जमकर हो रही आलोचना के बीच किसी भी मुस्लिम कांग्रेसी ने गहलोत का बचाव नहीं किया है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब गहलोत समर्थक तमाम मुस्लिम नेताओं की ज़बान बन्द है।
अब बात करते हैं कि मुस्लिम समुदाय में यह आक्रोश शुरू कैसे हुआ। राजस्थान के जयपुर, जोधपुर और कोटा शहर के तीन नगर निगमों के चुनाव नवम्बर 2019 में होने थे, लेकिन गहलोत सरकार को इन तीनों नगर निगमों में हार नज़र आ रही थी, इसलिए परिसीमन करने व वार्ड आरक्षण लाॅटरी निकालने के बावजूद सरकार ने यह कहकर चुनाव प्रक्रिया स्थगित कर दी कि तीनों शहरों में नगर निगमों का विभाजन कर 6 नए निगम बनाए जाएंगे ताकि विकास हो सके।
लेकिन इसके पीछे मन्शा यह थी कि तीनों शहरों के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों को अलग करके तीन नए नगर निगम बनाए जाएं ताकि उनमें आसानी से जीत मिल जाए। क्योंकि इसके पीछे सोच थी कि मुस्लिम वोट तो कांग्रेस पार्टी को मिलना तय है। खबर है कि यह ज्ञान मुख्यमंत्री को जयपुर की हवामहल सीट से विधायक व मुख्य सचेतक महेश जोशी ने दिया, जिसे नगरीय विकास मन्त्री शान्ति धारीवाल और मुख्यमंत्री गहलोत ने तुरंत स्वीकार कर लिया और फिर इस ज्ञान के आधार पर नगरीय विकास मन्त्री शान्ति धारीवाल ने तीनों नगर निगमों का कारीगरी से विभाजन कर दिया।
विभाजन के बाद बने नगर निगमों में जयपुर हैरिटेज, जोधपुर उत्तर और कोटा उत्तर मुस्लिम बाहुल्य हो गया। जहाँ से अन्दरखाने मुसलमानों को यह उम्मीद बंधाई गई कि कांग्रेस को जीताने के बाद इन नगर निगमों में मुस्लिम मेयर होंगे, हालांकि अधिकृत तौर पर किसी भी कांग्रेसी नेता ने यह घोषणा नहीं की थी। लाॅटरी के बाद कोटा उत्तर एससी मेयर सीट हो गई और जयपुर हैरिटेज ओबीसी महिला और जोधपुर उत्तर सामान्य महिला। इसलिए मुस्लिम समुदाय को यह पक्का यकीन हो गया कि जयपुर हैरिटेज और जोधपुर उत्तर में मुस्लिम मेयर बनना तय है।
मुस्लिम इलाकों में जमकर वोटिंग हुई और मुस्लिम बाहुल्य तीनों नगर निगमों में कांग्रेस को जीत मिल गई। साथ ही तीनों निगमों में सबसे ज्यादा पार्षद भी मुस्लिम समुदाय के जीतकर आए। लेकिन मेयर का टिकट किसी भी मुस्लिम को नहीं दिया गया, टिकट की घोषणा होते ही जयपुर हैरिटेज और जोधपुर उत्तर नगर निगम मेयर को लेकर मुस्लिम समुदाय में गुस्सा फूट पड़ा। सोशल मीडिया पर टिकट घोषित होते ही कांग्रेस व गहलोत की जमकर आलोचना होने लगी।
विचित्र बात देखिए कि जिन लोगों ने मुस्लिम समुदाय को नजरअंदाज किया, उनके खुद के वार्ड में कांग्रेस चुनाव हार गई। खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के वार्ड और विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस नगर निगम चुनाव हार गई। महेश जोशी, प्रताप सिंह खाचरियावास, रफीक खान आदि बड़े नेताओं व विधायकों के वार्ड में भी कांग्रेस चुनाव हार गई। इसके बावजूद इन्होंने अपनी मर्जी से मेयर का टिकट वितरण किया। हालांकि सभी नगर निगमों में मेयर टिकट सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मर्जी से आवंटित हुए, यहाँ तक कि टिकट वितरण में पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की भी नहीं चली।
कौन बने मुस्लिम मेयर के लिए रोड़ा ?
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मुस्लिम मेयर न बनवाने के पीछे सबसे पहला रोड़ा खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बने, जिनका पूरा राजनीतिक जीवन यह बताता है कि उन्हें मुस्लिम नेताओं का उभार पसंद नहीं है। इसीलिए जब से वे राजनीति के शिखर की तरफ बढे हैं, तब से उनके गृह नगर जोधपुर से एक बार भी मुस्लिम विधायक नहीं बना है। हालांकि टिकट वे हर चुनाव में यहाँ से अपने चहेते मुस्लिम नेता को देते हैं, लेकिन चुनाव जीताने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। जबकि वे खुद बगल की सरदारपुरा सीट से 1998 से लगातार विधायक बनते आ रहे हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य सीटी है। यह वही जोधपुर है जहाँ से राजस्थान के एकमात्र मुस्लिम मुख्यमंत्री बरकतुल्लाह खान विधायक बने थे, यह वही जोधपुर है जहाँ से कांग्रेस के कद्दावर व दबंग नेता अहमद बख्श सिन्धी विधायक बनकर कैबिनेट मंत्री बने थे। लेकिन यह वो दौर था जब गहलोत सियासी मैदान के तालिब ए इल्म थे, यानी उनकी सियासी जिन्दगी तब शुरू ही हुई थी।
दूसरा रोड़ा मुख्य सचेतक महेश जोशी, तीसरा रोड़ा नगरीय विकास मन्त्री शान्ति धारीवाल, चौथा रोड़ा कैबिनेट मंत्री व सिविल लाइन्स विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास, पांचवां रोड़ा किशनपोल विधायक अमीन कागजी और छठा रोड़ा आदर्श नगर विधायक रफीक खान बने। जिसकी वजह यह रही कि हवामहल, किशनपोल व आदर्श नगर मुस्लिम बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र हैं और सिविल लाइन्स में भी अच्छे खासे मुस्लिम वोट हैं, इसलिए यह नहीं चाहते कि जयपुर हैरिटेज से मुस्लिम मेयर बनाकर विधानसभा चुनाव में एक नया दावेदार पैदा किया जाए। यही सोच गहलोत की रही कि जोधपुर में मुस्लिम मेयर बनाकर एक मजबूत दावेदार पैदा करना कोई अक्लमंदी नहीं है।
मुस्लिम मेयर न बनाने के पीछे एक वजह यह भी रही कि कांग्रेस पूरी ताक़त से भाजपा की बी टीम बनने की कोशिश कर रही है और ऐसा उसने पिछले तीन साल से तेजी करना शुरू कर रखा है। जिसकी शुरुआत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान की थी, जब वे वहाँ प्रभारी महासचिव थे।
(07-11-2020)
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