कहानी गुलामी की•••••

कहानी गुलामी की•••••
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चापलूसी पसंद एक अयोग्य राजा था, जिसको दरबारियों की चापलूसी बहुत पसंद थी। दरबारी भी चापलूसी करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते थे। राजा के पांच वर्षीय पोते को भी दरबारी "हुक्म" कहकर सम्बोधित करते थे और झूक कर तीन बार सलाम करते थे। दरबार में एक चालाक मन्त्री था, जिसने एक दिन शाम को राजा से निवेदन किया कि आपके दरबारी सिर्फ चापलूस हैं वफादार नहीं हैं। 

राजा ने कहा तुमने मेरे दरबारियों की वफादारी देखी ही कब है ? सुबह देखना, यह कहकर राजा ने तुरंत एक आदेश जारी करवाया कि "कल सूर्योदय के साथ सभी दरबारी मुझे अपनी जूतियाँ सिर पर रखे हुए महल के सामने मिलने चाहिए।" आदेश सुनकर सूर्योदय का कौन इन्तजार करता, दरबारी रात को ही जूतियाँ सिर पर रख कर महल के सामने खड़े हो गए। यह दृश्य देखकर वहाँ से गुजर रहे एक साधु ने जब दरबारियों से पूछा, तो उन्होंने पूरी बात बता दी। साधु भी वहीं खड़ा हो गया और जब सूर्योदय के साथ राजा ने महल की छत से देखा, तो उसने उस चालाक मन्त्री को कहा कि देखी मेरे दरबारियों की वफादारी ? 

साधु को यह सारा वाकिया समझ में आ गया, तो उन्होंने ऊंची आवाज़ में कहा राजा श्री इनमें से एक भी आपका वफादार नहीं है, यह सब पद व सत्ता के अति लालच में अवसरवादी व चापलूस बनकर आपके पूरी तरह से गुलाम बन गए हैं, इन्होंने भले बुरे की समझ भी खो दी है, अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है, तो जिस दिन आप पर कोई विपदा आएगी, तब यह सब आपको अकेला छोड़कर भाग जाएंगे। यही हुआ कुछ दिनों बाद राजा के उस चालाक मन्त्री ने योजनाबद्ध तरीके से तख्तापलट कर दिया और राजा का साथ देने वाला कोई नहीं था, क्योंकि सभी गुलाम दरबारी पहले ही अपना सौदा कर चुके थे। राजा अकेला रह गया और उसका राज चला गया। 
लेखक:-- एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका।
(14-11-2020)
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