ट्रांसफर पोस्टिंग में भी दिखाया मुख्यमंत्री गहलोत ने कम्यूनल चेहरा

ट्रांसफर पोस्टिंग में भी दिखाया मुख्यमंत्री गहलोत ने कम्यूनल चेहरा
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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत दो साल में अपने एक के बाद एक फैसले से मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिकता के समर्थन की मानसिकता का सबूत दे रहे हैं, जिससे मुस्लिम समुदाय में गहलोत के प्रति कड़ा रोष व्याप्त है, जो कांग्रेस की जर्जर नैय्या को डूबोने के लिए काफी है। पहले मन्त्रिमण्डल गठन में, फिर एएजी बनाने में, फिर आरपीएससी व सूचना आयोग में नियुक्ति करने में, फिर नगर निगम मेयर बनाने में और अब अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग करने में उन्होंने पूरी तरह से यह साबित करने की कोशिश की है कि मुसलमानों की कांग्रेस को कोई जरूरत नहीं है, उनकी मर्जी है तो वोट दें या कहीं भी जाकर धक्के खाएं !
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने आपको गांधी जी का अनुयायी कहते हैं और उनके समर्थक उन्हें राजस्थान का गांधी कहते हैं। लेकिन उनके बहुत से फैसले पूरी तरह से जातिवाद, साम्प्रदायिकता और भेदभाव वाले होते हैं। उनकी डिक्शनरी में सबके भले के लिए कुछ न कुछ शब्द लिखे हुए हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय की जब बात आती है, तो उसकी भलाई के शब्द उनकी डिक्शनरी में ढूंढने से भी नहीं मिलते हैं। यह सब तब है जब वे खुद लगातार मुस्लिम बाहुल्य सरदारपुरा विधानसभा सीट से विधायक बनते आ रहे हैं तथा मुस्लिम समुदाय का एकतरफा वोट सभी विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को मिलता आ रहा है।


गहलोत की इस मानसिकता से मुस्लिम समुदाय में जबरदस्त रोष व्याप्त है और यह रोष कांग्रेस के फटे हुए तम्बू में आग लगा सकता है। हालांकि गहलोत को बारीकी से जानने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवी हमेशा से ही यह बात कहते हैं कि गहलोत सिर्फ नाम के गांधीवादी हैं, असल में वे भैरोंसिंह शेखावत और वसुंधरा राजे से भी ज्यादा कम्यूनल हैं। भैरोंसिंह शेखावत और वसुंधरा राजे दोनों राजस्थान में लम्बे समय तक भाजपा के मुख्यमंत्री रहे हैं। गत दिनों हमें एक मुस्लिम रहनुमा ने कांग्रेस के पूर्व मन्त्री के हवाले से भी यह बात कही कि मन्त्री महोदय ने एक दिन कहा था कि गहलोत पूरी तरह से कम्यूनल हैं।


गहलोत ने अपने इस कार्यकाल में साम्प्रदायिक मानसिकता का सबूत कुछ ज्यादा ही देना शुरू कर दिया है। दो साल में अपने विभिन्न निर्णयों से उन्होंने मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिकता के समर्थन की मानसिकता का सबूत स्पष्ट तौर पर दिया है। जिससे मुस्लिम समुदाय में गहलोत के प्रति कड़ा रोष व्याप्त है, जो कांग्रेस की जर्जर नैय्या को डूबोने के लिए काफी है। गहलोत ने पहले मन्त्रिमण्डल गठन में, फिर एएजी बनाने में, फिर आरपीएससी व सूचना आयोग में नियुक्ति करने में, फिर नगर निगम मेयर बनाने में और अब अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग करने में पूरी तरह से यह साबित करने की कोशिश की है कि मुसलमानों की कांग्रेस को कोई जरूरत नहीं है, उनकी मर्जी है तो वोट दें या कहीं भी जाकर धक्के खाएं !

पिछले दिनों मुख्यमंत्री गहलोत ने आईएएस, आईपीएस, आरएएस, आरपीएस, पुलिस इंस्पेक्टर एवं अन्य अधिकारियों के बड़ी संख्या में तबादले किए। लेकिन इस लम्बी सूची में एक भी मुस्लिम अधिकारी को कहीं भी ढंग की सम्मानजनक पोस्ट पर नहीं लगाया। अव्वल तो मुस्लिम अधिकारी गिनती के हैं और उनमें भी किसी को अच्छी पोस्टिंग नहीं मिले, तो फिर उन अधिकारियों का मनोबल भी कम होता है और समुदाय में भी रोष व्याप्त होता है कि जिस पार्टी को एकमुश्त एकतरफा वोट देकर सत्ता में लाए, तब भी हमारे साथ सौतेला सलूक होता है, ऐसा हमने क्या गुनाह कर दिया ?

इस तबादला सूची में हर जाति व समुदाय के अधिकारियों को गहलोत ने अच्छे पदों से नवाजा है। यहाँ तक कि जिन अधिकारियों को भाजपा राज में मलाईदार पदों पर नियुक्ति दी गई थी, उन्हें गहलोत की कांग्रेस सरकार ने भी मलाईदार पदों का इनाम दिया है, लेकिन मुस्लिम अधिकारियों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया है। राजस्थान के एक मात्र मुस्लिम आईपीएस अधिकारी अरशद अली, जो एक काबिल अफसर हैं और जिला एसपी लगने के योग्य भी हैं, लेकिन उन्हें जिला एसपी नहीं लगाया गया।

इसी तरह से कमरूजमां चौधरी जो कि एक काबिल व युवा आईएएस अधिकारी हैं और उनके बैच के कुछ अधिकारियों को जिला कलेक्टर लगा दिया गया है, लेकिन उन्हें अभी तक जिला कलेक्टर नहीं लगाया गया है। बात आरएएस अधिकारियों की करें, तो वरिष्ठ आरएएस अधिकारी सत्तार खान जिनको चूरू जिला परिषद में लगाया है, जबकि आठ साल पहले वे इसी चूरू जिले के अतिरिक्त जिला कलेक्टर (एडीएम) रह चुके हैं। 

राजस्थान में सिर्फ 21 मुस्लिम आरएएस अधिकारी हैं, जिनमें से चार पांच को छोड़कर सबको बिना महत्व के पदों पर लगा रखा है या अभी लगाया है। यही हाल दो दर्जन के करीब मुस्लिम आरपीएस अधिकारियों का है, जिनमें से तीन को ढंग की पोस्टिंग दे रखी है। बाकी को अधिकारियों की भाषा में बर्फ में लगा रखा है, यानी कोई खास पद नहीं दे रखे हैं। बात तहसीलदार, सब इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर जैसे अधिकारियों की करें, तो इनमें भी कुछ को छोड़कर बाकी को बिना महत्व की पोस्टिंग दे रखी है। 

यही हाल शिक्षा विभाग के पदों का है, खासकर शिक्षा संकुल का, जहाँ आपको ढूंढने से ही शायद कोई मुस्लिम अधिकारी मिल जाए। बात राजधानी जयपुर के प्रमुख पुलिस स्टेशनों की करें तो यहाँ भी आपको ढूंढने से मुस्लिम पुलिस अधिकारी नहीं मिलेगा। राजधानी के प्रमुख पुलिस स्टेशन माणक चौक, रामगंज, कोतवाली, गलता गेट, विधायकपुरी, जालूपुरा, ब्रह्मपुरी, आदि में आज तक शायद ही कोई मुस्लिम थानाधिकारी लगाया हो।

विधानसभा चुनाव 2018 का अध्ययन करने वाले एक मुस्लिम थिंक टैंक के मुताबिक मुस्लिम समुदाय ने 90 प्रतिशत या इससे अधिक वोट पोल किया था और यह समस्त वोट एकतरफा कांग्रेस को मिला था तथा कांग्रेस ने 200 सीटों में से जो 106 सीटें जीती थी, उनमें से 96 सीटें मुस्लिम वोटर के बलबूते जीती थी। इस थिंक टैंक का अध्ययन यह भी बताता है कि अगर मुस्लिम वोट 20 प्रतिशत कम पोल होते या प्रदेश की औसत पोलिंग के बराबर पोल होते तो कांग्रेस की 60 सीटें भी नहीं आती। यानी आज राजस्थान में गहलोत के नेतृत्व वाली जो कांग्रेस सरकार है, वो मुस्लिम वोटर की देन है। इसके बावजूद सरकार बनते ही पहला भेदभाव मन्त्रिमण्डल गठन में किया गया।

कांग्रेस से 9 मुस्लिम विधायक बने, लेकिन सिर्फ एक मन्त्री बनाया गया और उसे भी कोई खास महकमा नहीं दिया गया। इसके बाद सरकारी वकीलों की नियुक्ति हुई, उसमें मुस्लिम एडवोकेट को उस तादाद में नियुक्त नहीं किया गया, जितना उनका हक बनता था। सबसे बड़ा भेदभाव एएजी (अतिरिक्त महा अधिवक्ता) की नियुक्ति में किया गया। राजस्थान के करीब आठ हजार मुस्लिम वकीलों में से एक को भी गहलोत ने एएजी नहीं बनाया। 

फिर करीब ढाई महीने पहले मुख्यमंत्री गहलोत ने आरपीएससी (राजस्थान लोकसेवा आयोग) के गठन में मुस्लिम समुदाय को पूरी तरह से नजरअंदाज किया और मेम्बर तक नहीं बनाया। इसके बाद राजस्थान सूचना आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति की गई, तो उसमें भी मुसलमानों को नजरअंदाज किया गया। इसी तरह उर्दू ज़बान, उर्दू टीचर और मदरसा पैराटीचर्स के साथ गहलोत सरकार का सलूक सही नहीं है। गहलोत सरकार इनके साथ सौतेला सलूक कर रही है। 

दो महीने पहले 6 नगर निगमों के चुनाव में एकतरफा मुस्लिम समुदाय के वोट लेने के बावजूद एक भी मेयर न बनाकर गहलोत ने साफ सन्देश दे दिया था कि मुसलमान खामोशी से कांग्रेस को वोट दे और उसको सत्ता में बैठाए, लेकिन बदले में भागीदारी नहीं मांगे, क्योंकि हम मुसलमानों को सत्ता में भागीदारी नहीं दे सकते। तब जयपुर हैरिटेज नगर निगम से मुस्लिम मेयर नहीं बनाने के कारण मुसलमानों ने जमकर रोष व्यक्त किया था और इसे बहुत बड़ा धोखा बताया था। दो साल से लगातार भेदभाव झेल रहे मुस्लिम समुदाय में मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ़ जमकर रोष व्याप्त है और वो इस रोष को तीन विधानसभा सीटों पर होने वाले उप चुनाव में निकाल सकता है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि अगर गहलोत का यही रवैया रहा तो वे राजस्थान में कांग्रेस की सलतनत के बहादुर शाह जफर साबित होंगे !
(06-01-2021)
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