मुरादनगर श्मशान हादसे और जयपुर में गरीब सब्जी वाले की खुदकुशी के बहाने••••

मुरादनगर श्मशान हादसे और जयपुर में गरीब सब्जी वाले की खुदकुशी के बहाने••••
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उत्तरप्रदेश के मुरादनगर के श्मशान घाट पर तीन जनवरी को हुए हादसे में हमारे सत्ताधीशों की करतूतों की वजह से दो दर्जन बेगुनाह लोग मारे गए, तो दूसरी तरफ राजस्थान की राजधानी जयपुर में सात जनवरी को एक गरीब सब्जी वाले ने सूदखोर से दुःखी होकर पूरे परिवार की हत्या की और फिर खुदकुशी कर ली।
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। उक्त दोनों घटनाएं विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मसार करने वाली हैं। लेकिन कुछ दिनों ऐसी घटनाओं का जिक्र होता है, मीडिया में स्टोरी बनती है और फिर हम सब इनको भूल जाते हैं तथा एक नई घटना दुर्घटना से सुबह अखबारों में हमारा सामना होता है और हम हैरान होकर व्यवस्था को कोसने लग जाते हैं। यह सब तब हो रहा है या होता है, जब हम सत्ताधीशों को खरी खौटी नहीं सुनाते हैं और उनसे व्यवस्था सुधारने की एकजुट होकर बेबाकी से मांग नहीं करते हैं।


उत्तरप्रदेश का गाजियाबाद इलाका, जो देश की राजधानी दिल्ली के नजदीक है और यहाँ की मुरादनगर नगर पालिका क्षेत्र में बने श्मशान घाट में जो हादसा हुआ वो हादसा नहीं था, बल्कि सरकारी तन्त्र द्वारा बेगुनाह लोगों की हत्या थी। यहाँ सरकारी निर्माण से बनी श्मशान की छत उस समय ढह गई जब लोग अपने किसी मृत व्यक्ति का अन्तिम संस्कार कर रहे थे। इस हादसे से अन्तिम संस्कार में शामिल करीब दो दर्जन लोग मारे गए। हादसे के बाद सरकार ने बयानबाज़ी की, कार्रवाई भी की और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन भी दिया। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे हादसे क्यों होते हैं और ऐसे हादसों में पहले कब व कितनों को सजा मिली है ? क्योंकि हर साल सरकारी निर्माण व लापरवाही से देशभर में दर्जनों हादसे होते हैं, लेकिन कार्रवाई व सजा के नाम पर अमूमन लीपापोती ही होती है।


जयपुर जो कि विश्व प्रसिद्ध गुलाबी नगरी है और देश के सबसे बड़े राज्य की राजधानी है, वहाँ गिर्राज राणा नामक एक गरीब युवक खातीपुरा तिराहे पर सब्जी का ठेला लगाता था, जो सूदखोर से दुःखी हो चुका था तथा उसने अपने दो मासूम बच्चे बच्चियों व पत्नी की गला रेतकर हत्या कर दी और फिर खुद भी फंदे से लटक कर मर गया। यह घटना बहुत डरावनी और दर्दनाक है कि चन्द हजार रूपये के कर्जे और ब्याज के शोषित मकड़जाल से एक गरीब परिवार तबाहो बरबाद हो गया। ऐसी घटनाएं देशभर में बहुत हो रही हैं, जब आर्थिक तंगी और सूदखोरों से दुःखी होकर लोग आत्महत्या कर लेते हैं या पूरे परिवार को खत्म कर लेते हैं।

बड़ी बात यह भी है कि जात पंथ का अफीम पीकर रोज दूसरों के खिलाफ़ जहर उगलने वालों को सूद के नाम पर न अपनों से कोई राहत मिलती है और ना ही परायों से। यानी जब इन्सान अपनी जात व पंथ का झण्डा उठाता है, तो उसका राजनीतिक लाभ लेने वाले ले लेते हैं, लेकिन जब कर्ज और सूद की बात आती है, तो कोई भी सूदखोर अपनी जाती वाले या अपने पंथ वाले को नहीं बख्शता है। सूद की लूट को किसी भी समाज व धर्म में स्वीकृत व सम्मान नहीं दिया गया है। फिर भी धन लोभी सूदखोर हर समाज व पंथ में मौजूद हैं और हैरानी की बात यह है कि इन लुटेरों को बहुत से लोग आदरणीय व सम्मानीय समझते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में इन्हें मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथि बनाकर माला व साफा पहनाया जाता है। यह सूदखोर मानवता के दुश्मन हैं, इनकी काली करतूतों की वजह से असंख्य हंसते खेलते परिवार बरबाद हो चुके हैं।

अब सवाल यह है कि उक्त दोनों घटनाओं जैसी कोई घटना दोबारा नहीं हो, इसके लिए क्या किया जाए ? एक कहावत है जैसी प्रजा वैसा राजा, जैसी अवाम वैसे हाकिम। इसलिए सबसे पहले हमें (जनता को) तय करना है कि भविष्य में ऐसे दर्दनाक हादसे नहीं हों। इसके लिए हमें जात पंथ की नफरत फैलाने वालों से दूर रहना पड़ेगा और लोकतांत्रिक व संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत करना होगा। हमें जनहित के हर मुद्दे पर लगातार जद्दोजहद करनी होगी और साम्प्रदायिक व भ्रष्ट सत्ताधीशों को सत्ता की कुर्सी से हटाना होगा। देश की व्यवस्था आज जिस तरह से चौपट हुई है, वो साम्प्रदायिक व भ्रष्ट सत्ताधीशों की वजह से हुई है। 

नई पीढ़ी के असंख्य लोग आज बेरोजगार हैं और सोशल मीडिया पर नफरती सन्देशों को वायरल करते रहते हैं, इन लोगों की वजह से साम्प्रदायिक व भ्रष्ट लोग सत्ता की कुर्सी पर पहुंच जाते हैं। इसलिए सोशल मीडिया पर नफरत परोसने वाली नई पीढ़ी को इस नफरती खेल को छोड़कर जनहित की बात करनी चाहिए, सत्ताधीशों से रोटी रोजगार का रोज सवाल करना चाहिए, जनहित के मुद्दों पर सत्ताधीशों को घेरना चाहिए, ताकि जनहित के मुद्दों पर काम हो, लोगों को रोजगार मिले, भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम लगे और ऐसे हादसे भविष्य में नहीं हों।
(08-01-2021)
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