किसानों के नाम पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेतृत्व के घड़ियाली आंसू ?

किसानों के नाम पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेतृत्व के घड़ियाली आंसू ?
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करीब साढे 12 साल के शासनकाल में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजस्थान को अंतर्राज्यीय जल समझौतों के तहत मिलने वाले उसके हिस्से के पानी को दिलवाने में कोई विशेष गम्भीरता नहीं दिखाई है और ना ही कांग्रेस नेतृत्व ने इस सन्दर्भ में कोई विशेष प्रयास किए हैं। जिसका नतीजा यह है कि आज राजस्थान के हिस्से का पानी पंजाब व दूसरे राज्य डकार रहे हैं तथा राजस्थान के लाखों लोग पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं और बड़ा भू-भाग सिंचाई से वंचित है। 
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस के अन्य नेता पिछले कई दिनों से किसान आंदोलन के नाम पर किसानों के समर्थन में सभाएं कर हैं। जिनको किसान महापंचायत नाम दिया गया है। गहलोत के साथ साथ पार्टी नेतृत्व भी किसानों के भले की बात कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि गहलोत और पार्टी नेतृत्व के यह घड़ियाली आंसू हैं, अगर इनके दिल में किसानों का दर्द होता तो राजस्थान का अंतर्राज्यीय जल समझौतों के तहत तय किया गया उसके हिस्से का पूरा पानी दिलवाते, जिसे पंजाब और दूसरे पड़ौसी राज्य डकार रहे हैं।


गत दिनों 27 फरवरी को उप चुनाव को देखते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सुजानगढ़ के पास धनेऊ गांव में और मातृकुंडिया (मेवाड़) में दो किसान महापंचायत की। इन किसान महापंचायतों के पीछे मुख्य उद्देश्य उप चुनाव में जीत हासिल करना है। राजस्थान में कुछ दिनों बाद सुजानगढ़, सहाड़ा, राजसमंद और वल्लभनगर विधानसभा सीटों पर उप चुनाव होने वाले हैं, क्योंकि इन सीटों के जो विधायक थे उनका निधन हो गया है। इन सीटों पर चुनाव जीतना मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए प्रतिष्ठा और सत्ता बचाने का मुद्दा है, क्योंकि इनमें से तीन सीटें कांग्रेस के पास थीं। अगर इनमें से एक भी सीट कम होती है, तो एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा राजस्थान में जोर पकड़ सकता है। इसी खतरे को भांपते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीन सीटें हर हाल जीतने के लिए अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं।


इन उप चुनावों में जीत के लिए मुख्यमंत्री गहलोत और कांग्रेस नेताओं के पास एक ही मुद्दा है, वो है किसान आन्दोलन का। केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा बनाए गए तीन काले कृषि क़ानूनों के खिलाफ़ देशभर का किसान आन्दोलन कर रहा है और करीब साढे तीन महीने से किसानों ने दिल्ली को घेर रखा है। इसी आन्दोलन की आंच में गहलोत उप चुनाव जीत की बाटियां सेकना चाह रहे हैं। इसके लिए उन्होंने उक्त दो किसान महापंचायत आयोजित की। इन किसान महापंचायतों के अंदर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, कांग्रेस के प्रभारी महासचिव अजय माकन, पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, पूर्व पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट और अन्य बड़े नेता, मंत्री व विधायकों के अलावा काफी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता शरीक हुए। 


इससे पहले 12 और 13 फरवरी को कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी राजस्थान के दौरे पर आए और उन्होंने राजस्थान के अंदर चार सभाएं किसान आंदोलन के नाम पर की तथा इन तमाम सभाओं में उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन काले कृषि कानूनों को वापस लेने और उन्हें किसान विरोधी बताने की बात कही। यह बात अपनी जगह बिल्कुल सही है, यह तीनों काले कानून हैं। यह किसान विरोधी और मजदूर विरोधी कानून हैं। जनहित में इन्हें वापस लेना ही चाहिए, साथ ही एमएसपी की गारंटी का कानून जो किसान मांग कर रहे हैं, उसे भी बनाना चाहिए। 


लेकिन यह भी सच है किसानों और मजदूरों से सम्बंधित कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में कोई विशेष अंतर नहीं है, दोनों पार्टियों की नीतियां पूंजीपतियों के फायदे वाली और किसानों व मजदूरों के नुकसान वाली हैं। अगर कांग्रेस की नीतियां किसानों व मजदूरों के हित की होती, तो आज देश की यह दुर्दशा नहीं होती। देश में करीब 55 साल कांग्रेस का राज रहा है और उसके राज में किसानों व मजदूरों की पूरी तरह से कमर तोड़ दी गई। बची कसर भाजपा की मोदी सरकार ने पूरी कर दी, यानी काले कृषि क़ानून बनाकर देश के किसानों व मजदूरों को पूरी तरह से बरबाद कर दिया गया।


इस सच्चाई के बावजूद कांग्रेस किसानों के नाम पर घड़ियाली आंसू क्यों बहा रही है ? क्योंकि उसे उप चुनाव जीतने हैं। यहाँ हम राजस्थान के पड़ौसी राज्यों के साथ हुए अंतर्राज्यीय जल समझौतों के बारे में आपको संक्षिप्त तौर पर बताएंगे कि कैसे राजस्थान के हिस्से का पूरा पानी उसे नहीं मिल रहा है और इस पानी को दिलवाने में अशोक गहलोत ने कोई विशेष गम्भीरता नहीं दिखाई, जबकि वे 1998 में पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे और अब तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री हैं।


देश आजाद होने से पहले जब राजस्थान रियासतों में बंटा हुआ था, तब 1920 में बीकानेर स्टेट, पंजाब की स्टेट, बहावलपुर स्टेट, ब्रिटिश गवर्नमेंट आदि के बीच में एक जल समझौता हुआ था। उसके बाद और कई जल समझौते भी हुए। लेकिन आज तक यानी पहले समझौते को सौ साल और बाद के समझौतों को कई दशक बीत जाने के बावजूद राजस्थान को उसके हिस्से का पूरा पानी नहीं मिला है। इन समझौतों में सबसे बड़ा समझौता 24 जुलाई 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और शिरोमणि अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच हुआ था। जिस समझौते को राजीव लोंगोवाल जल समझौता कहा जाता है। यह समझौता पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के संदर्भ में हुआ था।

इसके अलावा आजादी के बाद राजस्थान का अंतर्राज्यीय जल समझौता 29 जनवरी 1955 को पंजाब से हुआ था। फिर 13 जनवरी 1959 को एक और समझौता राजस्थान व पंजाब के बीच सतलुज नदी के पानी को लेकर हुआ था। फिर 31 दिसंबर 1981 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की अध्यक्षता में रावी व व्यास नदियों के अतिरिक्त पानी को लेकर हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर व दिल्ली के मुख्यमंत्रियों के बीच तीसरी बार समझौता हुआ था। 


इसके अलावा चंबल नदी जल समझौता मध्यप्रदेश व राजस्थान के बीच हुआ तथा माही नदी जल समझौता गुजरात व राजस्थान के बीच 10 जनवरी 1966 को हुआ था। रावी, व्यास व सतलुज नदियों से मिलने वाले पानी में पंजाब व हरियाणा के अलावा राजस्थान का भी हिस्सा है। इस समझौते के तहत केंद्र सरकार ने भाखड़ा व्यास प्रबंधन निगम बना रखा है। 1994 में पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच यमुना जल समझौता हुआ था, इसमें हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व दिल्ली यानी पांच राज्य शामिल हैं। इन सब समझौतों के बावजूद राजस्थान को उसके हिस्से का पूरा पानी नहीं मिल रहा है। राजस्थान के साथ बरसों से भेदभाव व सौतेला सलूक हो रहा है तथा इसके लिए कांग्रेस व भाजपा दोनों जिम्मेदार हैं, क्योंकि केन्द्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि में इन्हीं दोनों पार्टियों या इनके गठबंधन की सरकार रही हैं या आज हैं।

अगर राजस्थान को उसके हिस्से का पूरा पानी मिलता, जो विभिन्न अंतर्राज्यीय जल समझौतों के तहत तय हुआ था, तो बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, झुन्झुनूं, सीकर, नागौर आदि जिलों का पूरा इलाका सींचा जाता और यहां हर किस्म की फसल का उत्पादन होता। साथ ही इस पूरे इलाके को भरपूर पेयजल भी उपलब्ध होता। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिस सुजानगढ के पास उक्त किसान महापंचायत की वहाँ पानी की बेहद किल्लत है, किसान पूरी तरह से बरसात के पानी पर आश्रित हैं।

राजस्थान को मिलने वाले पानी के मुद्दे पर सबसे अधिक भेदभाव या अन्याय पंजाब ने किया है। 2004 में पंजाब ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पास किया और इस प्रस्ताव के जरिए उसने समस्त अंतर्राज्यीय जल समझौतों को निरस्त कर दिया और इस तरह राजस्थान से किए हुए समझौते भी निरस्त हो गए और राजस्थान ने इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब की इस हरकत को असंवैधानिक करार देकर मामले को रेफरेंस के लिए 2016 में राष्ट्रपति जी के पास भेज दिया। अब यह मुद्दा राष्ट्रपति जी के पास है। केन्द्र की मोदी सरकार, पंजाब की कैप्टेन अमरिंदर सिंह सरकार चाहे तो राजस्थान के साथ न्याय कर सकते हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता राहुल गांधी चाहें तो अपनी पार्टी यानी कांग्रेस के पंजाब मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह पर दबाव बनाकर राजस्थान को उसके हिस्से का पूरा पानी दिलवा सकते हैं। लेकिन यह ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि इनका पहला उद्देश्य सत्ता स्थापित करना और सत्ता को बचाना है, ना कि किसानों व मजदूरों को बचाना।

यह सब तब है, जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और इनकी पार्टी के नेताओं ने 2018 के विधानसभा चुनाव में जो घोषणा पत्र जारी किया था, उसमें बहुत से वादे जनता से किए थे। जिनमें किसानों, मजदूरों, बेरोजगारों व संविदाकर्मियों से किए गए वादे प्रमुख हैं। जिनके लिए सत्ता में आने के करीब ढाई साल बाद भी इन्होंने कुछ नहीं किया। यानी झूठे वादे करके सत्ता में आए और फिर सत्ता बचाने के लिए पूरे ढाई साल लगा दिए, अब उप चुनाव जीतने के लिए किसानों के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने लग गए।
(09-03-2021)
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