36 कौमों के तथाकथित नेता अशोक गहलोत ने कैसे क्रेश किया 36 कौमों के नेताओं को ?

36 कौमों के तथाकथित नेता अशोक गहलोत ने कैसे क्रेश किया 36 कौमों के नेताओं को ?
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राजस्थान की कांग्रेस में अशोक गहलोत के उदय के साथ ही विभिन्न समुदायों से सम्बंधित कांग्रेसी नेताओं को एक-एक कर सियासी हाशिये पर लगाया गया, ताकि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकें। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बचे हुए या नई पीढ़ी के सिर उठाने वाले नेताओं को क्रेश करना जारी रहा। दर्जनों नाम हैं इस लिस्ट में, आखरी नाम सचिन पायलट का है, जिनका सियासी प्लेन अगस्त 2020 में क्रेश कर दिया गया। जाट, ब्राह्मण, बणिये, राजपूत, मुस्लिम, एससी, एसटी, गुर्जर आदि समुदायों से सम्बंधित इन नेताओं को आज सियासी मैदान में लोग एक तरह से भूल गए हैं। 
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर प्रदेश को संचालित कर रहे हैं। इस ढाई साल में प्रदेश को ढंग से संचालित करने की बजाए वे पूरी ताकत इस बात में लगा रहे हैं कि कुर्सी कैसे बची रहे। नतीजा साफ है प्रदेश में क़ानून व्यवस्था चौपट हो चुकी है, सरकारी तन्त्र में भ्रष्टाचार विकराल रूप धारण कर चुका है। प्रशासनिक तन्त्र पर मुख्यमंत्री की कोई खास पकड़ नहीं है, जिस कारण जनता बदहाल है। यह सब तब है जब गहलोत समर्थक उनको राजस्थान का गांधी और जन नायक कहते हैं तथा वे खुद भी अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं।


तीन विधानसभा सीटों पर उप चुनाव हैं, 17 अप्रैल को वोटिंग होगी, मुख्यमंत्री की लापरवाही एवं सिर्फ चुनावी जीत की व्यस्तता के कारण प्रदेश में कोरोना महामारी तेजी से फैल रही है। कोरोना महामारी, लाॅकडाउन, बेरोजगारी, चौपट होते काम धन्धे व व्यापार के कारण लोग पहले ही टूट चुके थे, उन्हें अब कोरोना गाइडलाइन की सख्ती ने और डरा दिया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक उन्हें 36 कौमों का नेता बताते हैं, यानी सभी जातियों का, यानी सभी लोगों का, लेकिन इन सभी लोगों का आज बुरा हाल है। विपक्ष में कोई खास दम नहीं है, चोर डकैत किस्म के नेताओं की वहाँ भी कोई कमी नहीं है। मीडिया जगत सरकारी विज्ञापनों के दबाव में एक तरह से खामोश है, या उसने स्वेच्छा से अपने आपको गहलोत सरकार के हाथों बेच दिया है।


36 क़ौमों के तथाकथित नेता अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने, फिर उसे बचाने के लिए 36 क़ौमों के कई नेताओं को हाशिये पर लगाया है। तब जाकर आज उनका एकछत्र राज कायम हुआ है और अब तो उन्होंने हालात यह पैदा कर दिए हैं कि भाजपा की पूर्व मुख्यमन्त्री वसुंधरा राजे कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कुर्सी को बचा रही हैं। उन्होंने राजस्थान कांग्रेस की जड़ों में एक तरह का तेजाब डाल दिया है। उन्होंने कुर्सी हासिल करने के लिए राजस्थान कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को चतुराई से लाइन से हटा दिया। ऐसे नेता कमोबेश सभी समुदायों में हैं, जिन्हें अशोक गहलोत ने मुस्कुराते हुए सियासी मैदान से आउट कर दिया।


उन्होंने सियासी मैदान में ऐसे गुल खिलाए हैं, जिनकी वजह से राजस्थान के कई धुरंधर राजनेता धराशायी हो गए या हाशिए पर लग गए। गहलोत ने 36 कौमों के नेताओं को ऐसी सियासी धूल चटाई है कि वो पूरी तरह से चित हो गए और फिर गहलोत से आगे निकलने की हिम्मत ही नहीं कर पाए। अकेले जाट, ब्राह्मण और बणिया समुदाय के मुख्यमंत्री स्तर के करीब आधा दर्जन वरिष्ठ नेताओं को गहलोत की औछी राजनीति का शिकार होना पड़ा और उनमें कुछ तो मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद लिए ही परलोक सिधार गए। इनमें परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, शीशराम ओला, पण्डित नवल किशोर शर्मा, चन्दनमल बैद्य आदि के नाम लिए जा सकते हैं।


इस कड़ी में विधानसभा अध्यक्ष डाॅक्टर सीपी जोशी का नाम भी प्रमुख है, जो 2008 में पीसीसी अध्यक्ष थे और उनके नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव जीता, लेकिन वे मुख्यमंत्री नहीं बन सके। ताजा घटनाक्रम सचिन पायलट के साथ हुआ है। जो पीसीसी अध्यक्ष थे और 2018 का विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में पार्टी ने जीता, लेकिन एक सप्ताह की खींचतान के बाद उन्हें उप मुख्यमंत्री पद पर सन्तोष करना पड़ा। अगस्त 2020 में सियासी ड्रामे व बगावत के बहाने सचिन पायलट को न सिर्फ पीसीसी अध्यक्ष से बरखास्त कर दिया, बल्कि उनसे उप मुख्यमंत्री का ओहदा भी छीन लिया। 

सबको पता है कि 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जाट समुदाय जो कि परम्परागत कांग्रेसी वोट बैंक था, के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाने का अन्दरखाने आश्वासन दिया था। इसके लिए मारवाड़ के कद्दावर जाट नेता परसराम मदेरणा को आगे किया गया और शेखावाटी में जाट नेता शीशराम ओला को कमान सौंपी गई। इसी तरह इन चुनावों में कांग्रेस के खेमे में ब्राह्मण मुख्यमंत्री की बात भी उठी थी तथा वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता पण्डित नवल किशोर शर्मा ने स्वयं जयपुर ग्रामीण विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। लेकिन 36 कौमों के सहयोग से 200 में से 156 सीट जीतने वाली कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री के मुद्दे पर न जाट नेता को कोई खास तवज्जोह दी और ना ही ब्राह्मण नेता को तथा गहलोत तब पहली बार मुख्यमंत्री बने, यह उनका अपना सियासी तिकड़म था, जिसके जरिए उन्होंने सभी दावेदारों की नेतागिरी को ही क्रेश कर दिया था।

तब दिग्गज जाट और ब्राह्मण नेताओं की गहलोत एवं उनके सियासी आकाओं ने ऐसी अक्ल निकाली कि उनके समझ में ही नहीं आई कि वो मुद्दे को कहाँ से पकड़ें और क्या करें ? जिसका नतीजा यह निकला कि मुख्यमंत्री की कुर्सी अशोक गहलोत को मिली। इस प्रकरण में परसराम मदेरणा और पण्डित नवल किशोर शर्मा जबरदस्त नाराज भी हुए। मदेरणा को हाथा जोड़ी कर मना लिया गया और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। परन्तु पण्डित नवल किशोर शर्मा पूरे पांच साल सिर्फ़ विधायक रहे, न वे मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए और ना ही कोई और बड़ा ओहदा उन्होंने लिया।

2018 के विधानसभा चुनाव में पण्डित नवल किशोर शर्मा के पुत्र पूर्व मन्त्री बृज किशोर शर्मा को तो टिकट ही नहीं दिया। शीशराम ओला के पुत्र पूर्व मन्त्री ब्रजेन्द्र ओला, पूर्व मन्त्री हेमाराम चौधरी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत, पूर्व डीजीपी व विधायक हरीश मीणा, पूर्व मन्त्री रमेश मीणा, पूर्व मन्त्री विश्वेंद्र सिंह, पूर्व मन्त्री नवाब दुर्रू मियां, पूर्व विधायक मकबूल मण्डेलिया जैसे कइयों को अब हाशिये पर लगा दिया गया है। इनके अलावा अनगिनत ऐसे नेता भी विभिन्न समुदायों से हैं, जो 20 साल से बायोडाटा लिए अशोक गहलोत के आगे पीछे होते रहते हैं, लेकिन बेचारों को आज तक एक अदद ढंग की राजनीतिक नियुक्ति या विधायक की टिकट भी नहीं दी है।

विचित्र बात यह भी है कि गहलोत ने कभी भी खुद अकेले के दम पर पार्टी को विधानसभा या लोकसभा का चुनाव नहीं जीताया है। हाँ, हार जरूर ऐतिहासिक करवाई है। 2003 व 2013 का विधानसभा चुनाव तथा 2014 व 2019 का लोकसभा चुनाव परिणाम इस बात के गवाह हैं। इन चुनावों में कांग्रेस की बहुत बुरी हार हुई थी। यह गहलोत की ही नीतियाँ थी, जिससे पार्टी को 2013 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 21 सीटें मिली थीं। कांग्रेस की ऐसी बुरी हार तो इमरजेन्सी के बाद हुए 1980 के विधानसभा चुनाव में भी नहीं हुई थी, जिसे कांग्रेस के इतिहास का सबसे बुरा दौर माना जाता है।
(14-04-2021)
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