जब रोम जल रहा था, तो नीरो बांसुरी बजा रहा था, कुछ ऐसा ही आधुनिक भारत में हो रहा है !
जब रोम जल रहा था, तो नीरो बांसुरी बजा रहा था, कुछ ऐसा ही आधुनिक भारत में हो रहा है !
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एक ने पूरा साल रविन्द्र नाथ टैगोर की नकल करने में निकाल दिया, तो दूसरे ने गांधी का मुखौटा पहनकर अपनी सरकार बचाने में, जनता के मुद्दों से दोनों को ही कोई लेना देना नहीं है, परिणाम सबके सामने है। कोरोना महामारी विकराल रूप धारण कर चुकी है। बैड, ऑक्सीजन, इंजेक्शन, वेंटिलेटर आदि के लिए लोग धक्के खा रहे हैं। हर राज्य का कमोबेश एक जैसा हाल है, आखिर ध्वस्त होती इस व्यवस्था का जिम्मेदार कौन है ?
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एक ने पूरा साल रविन्द्र नाथ टैगोर की नकल करने में निकाल दिया, तो दूसरे ने गांधी का मुखौटा पहनकर अपनी सरकार बचाने में, जनता के मुद्दों से दोनों को ही कोई लेना देना नहीं है, परिणाम सबके सामने है। कोरोना महामारी विकराल रूप धारण कर चुकी है। बैड, ऑक्सीजन, इंजेक्शन, वेंटिलेटर आदि के लिए लोग धक्के खा रहे हैं। हर राज्य का कमोबेश एक जैसा हाल है, आखिर ध्वस्त होती इस व्यवस्था का जिम्मेदार कौन है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। जब रोम जल रहा था, तो नीरो बांसुरी बजा रहा था। यह कहावत आज भारतीय शासकों पर पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है। चाहे प्रधानमंत्री हों या किसी राज्य के मुख्यमंत्री, मन्त्री और अधिकारी। मार्च 2020 में देशभर में यह कहकर लाॅकडाउन लगाया गया था कि एक तो कोरोना का खात्मा किया जाएगा और दूसरा मेडिकल सुविधाओं में सुधार पैदा किया जाएगा। एक साल बाद न तो कोरोना का खात्मा हुआ और ना ही मेडिकल सुविधाओं में कोई विशेष सुधार हुआ। पूरे देश में कोरोना महामारी और मेडिकल सुविधाओं को लेकर त्राहि त्राहि मची हुई है।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और विभिन्न राज्यों के मुख्यमन्त्रियों की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी थी कि वे कोरोना से मजबूती के साथ लड़ाई लड़ते और इसका खात्मा करते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि इनकी प्राथमिकता कोरोना से लड़ाई लड़ना नहीं था, बल्कि सत्ता बनाना, सत्ता बचाना और विरोधियों को नीचा दिखाना था, जिसमें दिन रात यह लोग लगे रहे।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने पूरा एक साल रविन्द्र नाथ टैगोर की नकल करने में निकाल दिया, ताकि बंगाल चुनाव में टैगोर की नकल से वोट बढ जाएं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जो अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं, उन्होंने पूरा साल गांधी का मुखौटा पहनकर खुद की सरकार बचाने में लगा दिया। ऐसा ही हाल कमोबेश दूसरे मुख्यमन्त्रियों का रहा, जिन्होंने कोरोना से लड़ाई की बजाए खुद की सत्ता को प्राथमिकता दी। आज चाहे यूपी हो, गुजरात हो, महाराष्ट्र हो, मध्यप्रदेश हो, सब जगह कोरोना से हाहाकार मचा हुआ है और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बेबस नज़र आ रहा है।
हाॅस्पिटल फुल, श्मशान व कब्रिस्तान फुल, हाॅस्पिटलों में तड़पते मरीज और बेबस परिजन। कमोबेश देश के हर छोटे बड़े शहर का एक जैसा हाल है। देश की तस्वीर देखिए एक तरफ बैड, ऑक्सीजन, इंजेक्शन और वेंटिलेटर के लिए दर दर ठोकरें खाते परिजन, तो दूसरी तरफ ऑक्सीजन और जीवन बचाने वाले इंजेक्शन रेमडिसिविर की कालाबाजारी। एक तरफ बेबस व लाचार आदमी है, तो दूसरी तरफ कोरोना के नाम पर मची लूट खसोट है, तो तीसरी तरफ सत्ता की मलाई चाटते बेशर्म नेता व अधिकारी हैं। यह बानगी है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की।
एक तरफ फरवरी से ही बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर पूरे देश चर्चा हो रही थी, तो दूसरी तरफ कोरोना तेजी से फैल रहा था। एक तरफ आधुनिक युग के रविन्द्र नाथ टैगोर (प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी) अपने साथियों के साथ साम, दाम, दण्ड, भेद के हर हथकण्डे को अपनाकर बंगाल को फतेह करने में लगे हुए हैं, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी बंगाल के किले को बचाने में। एक तरफ कांग्रेस केरल व असम में राज लाने के लिए जद्दोजहद कर रही थी, तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके में चुनावी युद्ध चल रहा था। जनता हर जगह एक भीड़ और औजार बनी हुई है, सत्ता हासिल करने का। यह लेख लिखे जाने के दिन (22 अप्रैल को) भी गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दूसरे नेताओं ने बंगाल में चुनावी सभाएं की, जब देश कोरोना से त्राहि त्राहि कर रहा था।
तेजी से फैलते कोरोना के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरे नेता बड़ी बड़ी सभाएं व रैलियां कर रहे थे। राजस्थान में तीन विधानसभा सीटों पर उप चुनाव हुए, यहाँ भी खूब सभाएं हुईं। जब कोरोना ने विकराल रूप धारण कर लिया, तब आधा अप्रैल बीत जाने के बाद सत्ताधीशों की आंखें खुली। आनन फानन में नाइट कर्फ्यू और लाॅकडाउन लगाना शुरू किया। देश वापस एक तरह से थम गया। यानी भ्रष्ट, सत्तालोलुप, अवसरवादी, जमीर फरोश सत्ताधीशों ने देश को वापस मार्च 2020 में लाकर खड़ा कर दिया।
यहाँ जिम्मेदारी उन अधिकारियों की भी बनती है, जो हर महीने मोटी तनख्वाह जनता के दिए हुए टैक्स से लेते हैं, उन्होंने आग लगने के बाद कुआं खोदना शुरू क्यों किया ? मेडिकल सुविधाएं, ऑक्सीजन, बैड, इंजेक्शन, वेंटिलेटर आदि की व्यवस्था समय पर उन्होंने क्यों नहीं की ? आज देश का हाल यह है कि चोर उचक्के नेताओं और हरामखोर अधिकारियों के कारण पूरी व्यवस्था चौपट हो गई है। कैसी शर्म की बात है कि मंगल व चान्द पर फतेह के झण्डे गाड़ने वाले और एटम बम व लम्बी दूरी की मिसाइल बनाने वाले हमारे देश में मरीज ऑक्सीजन के लिए तड़प रहे हैं ?
ध्वस्त होती देश की व्यवस्था के लिए जहाँ सत्ताधीश और अधिकारी सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। वहीं इसके लिए विपक्षी नेता, पत्रकार, बुद्धिजीवी और जनता भी कम जिम्मेदार नहीं है। विपक्षी नेता मजबूती से जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरते, पत्रकार व बुद्धिजीवी जनहित के मुद्दों पर बेबाकी से बहस करते और जनता जनहित के मुद्दों पर रोज सत्ताधीशों से सवाल करती, तो शायद देश की यह हालत नहीं होती। हैरानी की बात यह भी है कि जनता का एक बड़ा वर्ग पिछले कुछ बरसों से सिर्फ नफरती मुद्दों को तवज्जोह देता है, वो नफरत की आंच पर सियासी रोटी सेकने वाले नेताओं की साजिश का शिकार हो चुका है। उसके लिए जनहित कोई मुद्दा नहीं है, वो नफरती भाषण सुनता है, नफरती बातों को सोशल मीडिया पर वायरल करता है और नफरती नेताओं को वोट देकर चुनाव जीताता है। परिणाम सबके सामने है, देश की व्यवस्था चौपट हो गई है। अब भी वक्त है, जब जगे तभी सवेरा।
(22-04-2021)
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मुझे नहीं लगता कि अब वक्त बचा है। हालात बद से बदतर होते जायेंगे और निकम्मे और भ्रष्ट नेता और नौकरशाह जनता को पूरी तरह बर्बाद करके छोड़ेंगे। गलत लोगों को सत्ता में लाने का फल जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
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