राजस्थान विधानसभा उप चुनाव : हनुमान बेनीवाल और ओवैसी के पास एक मौका था, जो उन्होंने गंवा दिया !

राजस्थान विधानसभा उप चुनाव : हनुमान बेनीवाल और ओवैसी के पास एक मौका था, जो उन्होंने गंवा दिया !
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। राजस्थान की तीन विधानसभा सीटों पर 17 अप्रैल को उप चुनाव होने जा रहे हैं। सुजानगढ, राजसमन्द और सहाड़ा। एक सीट वल्लभनगर बाकी है, जिस पर चुनाव की घोषणा नहीं हुई है। इन चारों सीटों के विधायकों का निधन होने के कारण यह खाली हो गई थीं। जिन तीन सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस, प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने एड़ी चौटी का जोर लगा रखा है। लेकिन चुनाव को त्रिकोणीय बनाने के लिए सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी अपनी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में उतार रखे हैं। 


इन उप चुनावों का परिणाम क्या होगा ? इस सवाल का जवाब तो मतगणना के दिन ही मालूम होगा, लेकिन सियासी जानकारों का मानना है कि हनुमान बेनीवाल और असदुद्दीन ओवैसी के पास यह एक मौका था, जिसे उन्होंने गंवा दिया। कई बार यह खबरें चर्चा में रही हैं कि ओवैसी राजस्थान आना चाहते हैं और वे यहाँ की स्थानीय पार्टियों से गठबंधन भी करना चाहते हैं। ओवैसी ने छोटू भाई वसावा की भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के मामले में गठबंधन करने का कुछ महीनों पहले इशारा भी दिया था, लेकिन बात आगे नहीं बढी। इसी तरह से हनुमान बेनीवाल की पार्टी राजस्थान लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) से भी ओवैसी के गठबंधन की चर्चा सियासी चौपालों पर चल रही थीं। लेकिन अभी तक हुआ कुछ नहीं।

खबर तो यह भी थी कि ओवैसी बसपा से गठबंधन करना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने अचानक कुछ महीने पहले लखनऊ का दौरा भी किया था, लेकिन एनवक्त पर मायावती ने मुलाकात करने से मना कर दिया। इसके पीछे कई अटकलें भी उन दिनों चर्चा में रही थीं। लेकिन तीन बातें साफ हो चुकी हैं, पहली मुसलमानों का एक बड़ा तबका ख़ासकर नौजवानों का ओवैसी को अपना सियासी रहनुमा मान चुका है। दूसरी ओवैसी एक सियासी अछूत बन गए हैं और अपने आपको सेक्यूलर कहने वाली पार्टियां ओवैसी के पास भी खड़ा होना पसंद नहीं करती हैं। तीसरी ओवैसी को मुसलमानों का एक बड़ा तबका यह कहकर खारिज करता है कि ओवैसी के मजबूत होने से मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा और इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा तथा मुसलमान न इधर का रहेगा और ना ही उधर का।

राजस्थान के सियासी जानकारों का मानना है कि हनुमान बेनीवाल और असदुद्दीन ओवैसी के पास विधानसभा उप चुनावों में एक सुनहरा मौका था, जो उन्होंने गंवा दिया। अगर यह दोनों गठबंधन करते या हनुमान बेनीवाल के उम्मीदवारों का ओवैसी समर्थन करते तो सियासी तस्वीर ही कुछ और होती। राजस्थान में पिछले करीब 30 साल से चुनावी मुकाबला कांग्रेस व भाजपा के बीच ही रहता है। तीसरी ताकत के तौर पर जितनी भी पार्टियां आईं या बनाई गई वे कुछ खास दमखम नहीं दिखा पाई। लेकिन हनुमान बेनीवाल ने 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी बनाई और उनकी पार्टी ने तीन सीटें जीती। उसके कुछ महीने बाद उन्होंने भाजपा से गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ा और खुद सांसद बन गए। अब उन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया है।

हनुमान बेनीवाल के पास जाट समुदाय का अच्छा खासा वोट है और जाट समुदाय की दशकों पुरानी तमन्ना कि राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री बने। उसे आज तक न कांग्रेस ने पूरा किया है और ना ही भाजपा ने। इसलिए जाट समुदाय हनुमान बेनीवाल को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर देख रहा है। यह तमन्ना तब पूरी हो जब उनका ओवैसी व मायावती जैसे नेताओं से गठबंधन हो। इस गठबंधन से हनुमान बेनीवाल के साथ साथ गठबंधन करने वाले नेताओं को भी फायदा है। राजस्थान के मतदाताओं में एक बड़ी तादाद ऐसी है, जो कांग्रेस व भाजपा को पसंद नहीं करती, लेकिन कोई मजबूत तीसरी पार्टी या गठबंधन नहीं होने के कारण मजबूरी में इन्हें कांग्रेस या भाजपा को वोट देना पड़ता है।

तीन सीटों पर जो उप चुनाव हो रहे हैं, उनमें सुजानगढ सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है। यहाँ अनुसूचित जाति के अलावा जाट और मुस्लिम वोट अच्छी खासी तादाद में हैं। यहाँ हनुमान बेनीवाल ने सीताराम नायक को उम्मीदवार बनाया है। सहाड़ा सीट पर मुस्लिम वोट तो कम हैं, लेकिन जाट अच्छी तादाद में हैं और यहाँ हनुमान बेनीवाल ने बद्रीलाल जाट को उम्मीदवार बनाया है। राजसमन्द से उन्होंने प्रहलाद खटाना को उम्मीदवार बनाया है और यहाँ भी हार जीत का फैसला जाट व मुस्लिम वोटर के हाथ में है।

इसलिए सियासी जानकारों का मानना है कि इन उप चुनावों में हनुमान बेनीवाल और असदुद्दीन ओवैसी गठबंधन करके मैदान में उतरते तो चुनाव का पासा पलट देते तथा ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा के आम चुनाव में तस्वीर कुछ और ही होती, जिस मौके को इन दोनों ने उप चुनावों में गंवा दिया है। (07-04-2021)
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