आरएसएस नेतृत्व की मोदी सरकार इसराइल के खिलाफ़, जबकि मोदी व आरएसएस समर्थक इसराइल के फेवर में, ऐसा क्यों ?

आरएसएस नेतृत्व की मोदी सरकार इसराइल के खिलाफ़, जबकि मोदी व आरएसएस समर्थक इसराइल के फेवर में, ऐसा क्यों ?
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क्या यह मजबूरी है या फिर बेरोजगारी की भयावहता, चौपट व्यापार, बढती महंगाई और कोरोना महामारी से निपटने की विफलता जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान डायवर्ट करने की सोची समझी रणनीति है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इकरा पत्रिका)। गत दिनों 11 दिन तक इसराइल और फलस्तीन के बीच युद्ध चला, जो बिना किसी शर्त के इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की युद्ध विराम घोषणा के साथ 21 मई को बन्द हो गया। इस दौरान हमारे देश की केन्द्रीय सत्ता और सत्ता का नेतृत्व करने वाला आरएसएस बड़ी ऊहापोह का शिकार हुआ। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मन्त्री, भाजपा व आरएसएस के बड़े नेताओं ने इस मुद्दे पर कोई बयानबाज़ी नहीं की। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा व आरएसएस के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर इसको सोशल मीडिया पर चर्चित किया तथा इसे इसराइल की बड़ी जीत और फलस्तीन की बुरी हार बताने के साथ हर किस्म की औछी भाषा में टीका टिप्पणी की।


जिसकी वजह सिर्फ यह थी कि फलस्तीन में जिन लोगों पर इसराइल ज़ुल्म कर रहा है, जिनका खून बहा रहा है वे मुसलमान हैं तथा आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) का पूरा वजूद व सफलता के इतिहास का मूल मन्त्र मुस्लिम विरोध है। यहाँ विचित्र बात यह भी है कि भारत सरकार के प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की बैठक में इस युद्ध के दौरान जो अपील की, वो नपी तुली तो थी, लेकिन उस अपील से यह भी साफ जाहिर हुआ कि भारत सरकार अपनी परम्परागत विदेश नीति के तहत फलस्तीनियों के साथ व इसराइल के खिलाफ़ है।


इस अपील में भारत के स्थाई प्रतिनिधि टी एस तिरूमूर्ति ने दोनों पक्षों से जंग खत्म करने की गुजारिश करते हुए अत्यधिक संयम बरतने एवं शान्ति बनाए रखने की अपील की। साथ ही पूर्वी यरूशलम और उसके आसपास में मौजूदा यथास्थिति को एकतरफा रूप से बदलने के प्रयासों से परहेज़ करने की भी अपील की। भारत सरकार का यह बयान एक तरह से फलस्तीन के फेवर में और इसराइल के खिलाफ़ था। इसीलिए भारत में इसराइल की डिप्टी राजदूत रोनी येदिदिया क्लेन ने कहा कि भारत की जनता का हमें खूब समर्थन मिला, लेकिन भारत सरकार का उस तरह से समर्थन नहीं मिला, जैसा दूसरे देशों की सरकारों से मिला।

इसके अलावा युद्ध विराम के बाद इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने जब इसराइल का समर्थन करने वाले 25 देशों का शुक्रिया अदा किया, तो उस लिस्ट में भारत का नाम नहीं था। इसका सीधा सा मतलब यह है कि नेतन्याहू ने भारत को अपना समर्थक नहीं माना। अब सवाल यह उठता है कि इसराइल क्या चाहता था और मोदी सरकार का नेतृत्व करने वाली आरएसएस लीडरशिप ऊहापोह की शिकार कैसे हुई ? पहली बात तो यह है कि रूस, चीन, सभी अरब देश, ईरान, तुर्की, पाकिस्तान आदि काफी देश इस मुद्दे पर इसराइल के खिलाफ़ खड़े हो गए थे। भारत सरकार नहीं चाहती थी कि इस मुद्दे पर अरब देश ख़ासकर सऊदी अरब और यूएई को यह लगे कि भारत फलस्तीनियों के खिलाफ़ है। 

दूसरी बात यह है कि चीन इस मुद्दे पर अमेरिका व इसराइल के खिलाफ़ गोलबंदी करने लग गया था और उसने अन्दरखाने पाकिस्तान व ईरान को आगे कर दिया था। इस गोलबन्दी में आगे चलकर रूस, तुर्की और सभी अरब देशों के शामिल होने की सम्भावना थी, जो भारतीय हितों के खिलाफ़ थी। इसलिए भारत ने खुलकर इसराइल का समर्थन नहीं किया। यह सब तब हुआ जब भारत की केन्द्र सरकार आरएसएस के नेतृत्व में चल रही है और आरएसएस शुरू से ही इस मुद्दे पर इसराइल के साथ है। इसलिए आरएसएस लीडरशिप ऊहापोह की शिकार हुई। इसराइल इस मुद्दे पर यह चाहता था कि भारत सरकार आरएसएस की लीडरशिप में संचालित हो रही है, इसलिए उसे उम्मीद थी कि भारत सरकार इस बार खुलकर इसराइल का समर्थन करेगी। लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया, जिससे इसराइल को निराशा हाथ लगी।

अब सवाल यह उठता है कि जब मोदी सरकार और आरएसएस लीडरशिप खुलकर इसराइल के समर्थन में नहीं आए, तो उनके समर्थक सोशल मीडिया पर खुलकर इसराइल के समर्थन में क्यों खड़े हुए ? इस सवाल का पहला जवाब तो यह है कि आरएसएस एक सुव्यवस्थित संगठन है, उसके यहाँ बिना सोचे समझे कोई कदम नहीं उठाया जाता तथा समर्थक जो भी कदम उठाते हैं, वो नेतृत्व के इशारे पर ही उठाते हैं। इसलिए यह बात सौलह आने सच है कि आरएसएस समर्थकों का निचले लेवल पर इसराइल का खुलकर समर्थन करना, नेतृत्व के इशारे पर हुआ है। क्योंकि नेतृत्व की मजबूरी थी कि वो खुलकर समर्थन नहीं कर सकता था, लेकिन नेतृत्व की यह भी मजबूरी थी कि वो विचारधारा से कोई समझौता नहीं कर सकता और विचारधारा हमेशा से इसराइल के समर्थन वाली है। इसलिए नेतृत्व ने समर्थकों को खुलकर इसराइल का समर्थन करने की छूट दी।

दूसरा जवाब यह है कि बेरोजगारी की भयावहता, चौपट व्यापार, बढती महंगाई और कोरोना महामारी से निपटने की विफलता जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान डायवर्ट करने के लिए यह एक अच्छा मुद्दा मिल गया था। जिन दिनों यह युद्ध चल रहा था, तब यमुना और गंगा नदी में कई जगह असंख्य शव मिल रहे थे, जिन्हें चील, कौवे, कुत्ते आदि नोच कर खा रहे थे। शवों की दुर्गति वाली इन तस्वीरों व वीडियो को देखकर लोग जमकर सरकारी विफलता की आलोचना करने लग गए। चर्चा है कि खासतौर पर इस मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए एक योजनाबद्ध तरीके से आरएसएस नेतृत्व ने अघोषित तौर पर आईटी सेल को एक्टिव किया, ताकि इसराइल के समर्थन और फलस्तीनियों को भला बुरा कहने से सरकारी किरकिरी कुछ कम हो जाए तथा सोशल मीडिया पर एक्टिव लोग दो खेमों में बंट कर बिना बात आपस में उलझे रहें। 
(25-05-2021)
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