सोशल मीडिया का दुरुपयोग, बढते अपराध और हताश युवा, जिम्मेदार कौन ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका))। चकाचौंध विकास और बढती प्रतियोगिता के वर्तमान दौर में मानव एक मशीन बन गया है। वो अपनी परम्पराएं, इतिहास और सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर होता जा रहा है। नई पीढ़ी के पास ज्ञान, तकनीक, संचार के साधनों और महत्वाकांक्षा के साथ साथ हताशा की भी बढोतरी हुई है। आज का युवा जिसके कन्धों पर देश व समाज का भविष्य है, उसकी बड़ी संख्या खुद दिशा भ्रमित हो चुकी है। असीमित इच्छाओं और बढते सोशल मीडिया के प्रभाव से बहुत से युवा अपराध व नशे की दल दल में फंसते जा रहे हैं या फंस चुके हैं। जिस पर देश के व्यवस्था संचालकों, समाज शास्त्रियों और अभिभावकों को गम्भीरता से गौर करना चाहिए। आए दिन अखबार व टीवी चैनलों पर युवाओं के अपराध व हताशा की खबरें मिलती हैं। जिनसे रूह कांप जाती है।
हत्या व बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के अलावा हताशा के कारण की गई आत्महत्या की खबरें भी आए दिन आती हैं। साथ ही ऐसी खबरें भी पढने को मिलती हैं कि किसी संगीन अपराध के चलते युवा अपराधियों को कोई अदालत उम्र कैद व फांसी की सजा भी सुनाती है। इसके अलावा माॅब लींचिग की खबरें भी आती हैं। जिनमें नफरती विचारधारा के जरिए कुछ युवा भीड़ का हिस्सा बनकर किसी बेगुनाह की हत्या कर देते हैं। फिर कानून की पकड़ से बचने के लिए फरार हो जाते हैं या सलाखों के पीछे चले जाते हैं।
इन खबरों को पढ कर ऐसा लगता है कि हमारी युवा पीढ़ी में बहुत से युवा जाने अनजाने में अपराध की दल दल में फंस जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो बेरोजगारी या बार बार प्रतियोगी परीक्षाओं में विफल होने के बाद हताश हो जाते हैं तथा वे आत्महत्या कर लेते हैं या आत्महत्या करने का प्रयास करते हैं। जहाँ तक विवाहित युवतियों व महिलाओं की आत्महत्या की बात है, तो इसमें आर्थिक तंगी के साथ साथ गृह कलेश, शराब और नाजायज़ सम्बन्ध भी एक जरिया बनते हैं।
सोशल मीडिया की फर्जी दोस्ती और फर्जी प्यार के चक्कर में कई युवक युवतियां अपना जीवन बरबाद कर चुके हैं। इसलिए सोशल मीडिया का सही तरह से और सम्भल कर इस्तेमाल करना चाहिए। अभिभावकों को नई पीढ़ी को सोशल मीडिया के खतरे के बारे में बताना चाहिए। घर परिवार में संवाद कायम रखना चाहिए। घरेलू परम्पराओं, संस्कारों, सामाजिक मुद्दों और अपने परिवार के पुरखों के बारे में नई पीढ़ी से चर्चा करनी चाहिए। चाहे यह चर्चा दस बीस मिनट ही हो, रोज अपने परिवार में होनी चाहिए। परिवार से दूर पढाई या रोजगार के लिए अलग रहने वाले युवक युवतियों से भी अभिभावकों को इन मुद्दों पर रोज फोन पर चर्चा करनी चाहिए। समाज शास्त्रियों को भी इस विषय पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
इसके अलावा इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि बच्चा किसी कट्टरपंथी संगठन या अपराधी तत्वों और नशेड़ी युवाओं की संगत में तो नहीं जा रहा है। उसे इनसे दूर रहने की हिदायत दी जाए और अपने परिवार की अच्छी आर्थिक स्थिति, अपनी नाॅलेज, खूबसूरती आदि पर गुरूर करने एवं दूसरों का मजाक उड़ाने की आदत को छोड़ने की नसीहत भी देनी चाहिए। अपने बच्चों को कड़ी मेहनत करने, हताश नहीं होने, मायूस नहीं होने और लगातार जद्दोजहद करने की तालीम देनी चाहिए। कोरोना महामारी से बढी बेरोजगारी और बन्द शिक्षण संस्थानों के कारण बच्चे, युवक, युवतियां और ज्यादा हताशा का शिकार हुए हैं। इसलिए इस समय नई पीढ़ी पर खास ध्यान देने की जरूरत है।
अपनी नई पीढ़ी को हर इन्सान सब कुछ देने की कोशिश करता है और देता भी है, लेकिन हर परिस्थिति में हिम्मत रखने और हर संकट का मुकाबला करने और जो मिल रहा है उस पर सब्र करके जिन्दगी गुजारने की तालीम बहुत कम घरों में दी जाती है। यही वजह है कि नई पीढ़ी मामूली परेशानी पर हताश हो जाती है। नई पीढ़ी को दूसरों की सेवा करने, सहयोग करने और दूसरों के साथ बिना किसी भेदभाव के भाईचारे से साथ रहने की शिक्षा दी जाए। उसे यह बताया जाए कि जीवन सबसे ज्यादा क़ीमती है और जीवन हताशा से नहीं बल्कि लगातार जद्दोजहद करके जिया जाता है। हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी नई पीढ़ी को बताएं कि जीवन में पैसा बहुत जरूरी है, लेकिन पैसा शराफत, शान्ति, सुकून व भाईचारे से बहुत छोटा होता है !
(22-06-2021)
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