वक्फ बोर्ड चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज, लेकिन वक्फ जायदाद की बदहाली पर सब खामोश !

वक्फ बोर्ड चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज, लेकिन वक्फ जायदाद की बदहाली पर सब खामोश !
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राजस्थान वक्फ बोर्ड के चुनावों का एलान हो चुका है, वक्फ से जुड़े हुए लोग चुनावी दंगल में कूद चुके हैं, हर जिले व तहसील में वक्फ जायदादें अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं, क्योंकि ज्यादातर मुस्लिम रहनुमा व आम मुसलमान वक्फ जायदादों की बदहाली पर खामोश हैं। जहाँ तक सरकार की बात है तो उसे वक्फ की लूट खसोट से कोई लेना देना ही नहीं है, क्योंकि वो तो खुद वक्फ जायदाद की लुटेरी बनी हुई है !
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान बोर्ड ऑफ मुस्लिम वक्फस् यानी वक्फ बोर्ड के चुनाव का एलान गत दिनों हो चुका है। मेम्बर बनने, मुतवल्ली कोटे से चुनाव जीतने और चेयरमैन बनने के लिए वक्फ जायदाद से जुड़े हुए लोग और कांग्रेस के मुस्लिम नेता अपनी कमर कस चुके हैं। यह लोग जयपुर और दिल्ली दरबार की हर उस चौखट पर हाजरी लगा रहे हैं, जहाँ से इनको कामयाबी की उम्मीद नज़र आती है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़े सवाल यह हैं कि वक्फ जायदाद की बदहाली दूर कैसे हो ? कौन वक्फ बोर्ड की कमान सम्भाले जो वक्फ जायदादों को अतिक्रमण मुक्त कर इनका विकास करे और बोर्ड की आमदनी बढ़ा कर उसके गठन का मकसद भी पूरा करे ?


इन सवालों के जवाब सिवाय लफ्फाजी के किसी के पास नहीं हैं, ज्यादातर दावेदार तीन मकसदों से बोर्ड में आना चाहते हैं। पहला, वे और उनके चहेते दोनों हाथों से वक्फ जायदादों को लूट सकें, दूसरा अपने पुराने कर्मकाण्डों पर पर्दा डलवा सकें, तीसरा बोर्ड व कांग्रेस के सत्ता रसूख से अपना सियासी कद बढ़ा सकें।

राजस्थान वक्फ बोर्ड में कुल 9 मेम्बर होते हैं और इन्हीं में से एक को चेयरमैन चुना जाता है। चेयरमैन वही बनता है, जिसे राज्य सरकार बनाना चाहती है। यानी बिना मुख्यमंत्री के चाहे कोई भी मेम्बर चेयरमैन नहीं बन सकता। इसलिए हर बार चेयरमैन का चुनाव निर्विरोध होता है। इन 9 मेम्बरों में 5 निर्वाचित मेम्बर होते हैं और 4 मनोनीत। निर्वाचित मेम्बरों में एक विधायक, एक सांसद, सांसद नहीं हो तो पूर्व सांसद, एक राजस्थान बार काउंसिल का मेम्बर, दो मुतवल्ली कोटे के निर्वाचित मेम्बर। चार मनोनीत मेम्बरों में एक आरएएस अधिकारी, एक समाजसेवी, एक सुन्नी इस्लामिक स्काॅलर और एक शिया इस्लामिक स्काॅलर। यह सभी मेम्बर मुस्लिम होने जरूरी हैं और किसी भी कोटे से इनमें दो महिलाएं होनी भी जरूरी हैं। यह चुनाव वक्फ एक्ट 1995 और संशोधित एक्ट 2013 के अनुसार होता है।

निर्वाचित कोटे के 5 सदस्यों का चुनाव 17 अगस्त को होगा। जिसमें दो मुतवल्ली सदस्य भी शामिल हैं। चुनाव अधिकारी ने इसके लिए मतदाता सूची जारी कर दी है। जिस पर आपत्ति भी मांगी गई हैं। खबर है कि विभिन्न आपत्तियों के कारण 177 मुतवल्ली वोटर की सूची में से घटकर वोटर 162 हो गए हैं। जो और भी कम या ज्यादा हो सकते हैं। विधायक कोटे में 9 विधायकों और सांसद कोटे में 3 पूर्व सांसदों के नामों की घोषणा कर दी गई है। राजस्थान बार काउंसिल कोटे से एक ही मतदाता हैं, एडवोकेट सय्यद शाहिद हसन और इनका निर्विरोध निर्वाचन एक तरह से तय है।

वर्तमान बोर्ड के चेयरमैन डाॅक्टर खानू ख़ान बुधवाली थे, जिनको 25 नवम्बर 2019 को उप चुनाव के जरिए चेयरमैन बनाया गया था और उनके बोर्ड का कार्यकाल 08 मार्च 2021 में समाप्त हो गया था। उप चुनाव इसलिए हुआ था कि माननीय हाईकोर्ट ने तत्कालीन चेयरमैन अबू बकर नकवी सहित तीन सदस्यों की सदस्यता रद्द कर दी थी। वक्फ बोर्ड का कार्यकाल पांच साल के लिए होता है और अब जो भी बोर्ड गठित होगा और उसका जो चेयरमैन बनेगा, वो अगले पांच साल तक कार्य करेगा तथा राज्य सरकार का कार्यकाल ढाई साल से भी कम बचा है। यानी नए बोर्ड का आधे से ज्यादा कार्यकाल नई सरकार में भी होगा, जो दिसम्बर 2023 में गठित होगी।

डाॅक्टर खानू खान बुधवाली के चेयरमैन बनने पर वक्फ जायदाद से जुड़े हुए लोगों में एक खुशी की लहर पैदा हुई थी, वो इसलिए कि पहली बार पीएचडी किया हुआ एक उच्च शिक्षित युवा बोर्ड का चेयरमैन बना था। जिससे वक्फ जायदाद से हमदर्दी रखने वाले लोगों को यह उम्मीद जगी थी कि करीब तीन साल से जूतम पैजार, निलम्बन, बर्खास्तगी और लूट खसोट का अखाड़ा बने वक्फ बोर्ड के अब शीघ्र ही अच्छे दिन आएंगे। इन लोगों को यह उम्मीद भी जगी थी कि वक्फ कमेटियों में लम्बे समय से और भाजपा राज के समय से जो लोग जमे हुए हैं, उन्हें अब हटाया जाएगा और नए व कर्मठ लोगों की कमेटियां बनाई जाएंगी, जो वक्फ जायदाद की हिफाज़त और डवलपमेंट का काम करेंगी। लेकिन धीरे धीरे इन लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरने लगा और सालभर में यह लोग एक तरह से नाउम्मीद हो गए।

चेयरमैन बनने के बाद डाॅक्टर खानू खान बुधवाली ने इकरा पत्रिका को बताया था कि "हम एक टीम भावना के साथ वक्फ जायदाद की हिफाजत और डवलपमेंट का काम करेंगे। हम उन लोगों को यह बात समझाएंगे जिन्होंने बरसों से वक्फ जायदाद पर कब्ज़ा कर रखा है कि यह जायदाद अल्लाह की हैं और बन्दों की भलाई के लिए हैं, लिहाजा आप कब्जा खाली करें और वक्फ की हिफाजत और डवलपमेंट में बोर्ड का सहयोग करें। अगर समझाने से कब्जे नहीं हटेंगे तो हम अवैध कब्जेधारियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि बोर्ड में आज तक जो हुआ वो हो गया, अब बोर्ड पूरी तरह से पारदर्शिता के साथ काम करेगा। इसके अलावा दक्षिण भारत के राज्यों में जिस तरह से वक्फ जायदाद का विकास किया गया है, उसी तरह से हम राजस्थान में विकास करेंगे। यहाँ हम स्कूल, काॅलेज, हाॅस्टल आदि बनाएंगे, ताकि कौम के बच्चों का भला हो सके और कौम तरक्की कर सके।"

इन बातों को उन्होंने कई बार विभिन्न मंचों पर और अपने दौरों में प्रेस के सामने भी दोहराया। इनसे पहले अल्पसंख्यक मामलात विभाग के कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद ने भी मन्त्री बनते ही ऐसी ही बातें की थी। जिनमें उन्होंने अपने फतेहपुर दौरे में स्पष्ट कहा था कि "वक्फ बोर्ड की जमीनों पर जिन्होंने कब्जे कर रखे हैं वो खाली कर दें, वरना फिर हम खाली करा लेंगे, चाहे कब्जेधारी कोई भी हों।" लेकिन कब्जे हटाने और वक्फ जायदाद का विकास करने के नाम पर ज़बानी व कागजी काम ज्यादा हुआ और हकीकत में सिर्फ खानापूर्ति की गई।

डाॅक्टर खानू ख़ान बुधवाली की सफलताओं में सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने वक्फ बोर्ड को पूरा टाइम दिया और व्यवस्था को पटरी पर लाने का पूरा प्रयास किया। साथ ही पहले कई महीनों तक बोर्ड कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं मिलती थी, क्योंकि बोर्ड के पास पैसा ही नहीं होता था, उस व्यवस्था को सुधारा और समय पर तनख्वाह देनी शुरू की। चेयरमैन ने काफी दौरे किए और वो भी कोरोना महामारी के बावजूद। इसके अलावा उनका सबसे शानदार काम कोरोना लाॅकडाउन में पीड़ित जनता की जिस तरह से खाने के पैकेट और राशन किट वितरित करवा कर उन्होंने जो खिदमत की, उसकी तारीफ़ पूरे प्रदेश में की गई।

उन्होंने अतिक्रमण हटाने की भी कोशिश की और कुछ जगह अतिक्रमण हटे भी, लेकिन बहुत सी जगह वे राजनीतिक दबाव या अन्य किसी कारण से बेबस हो गए और अतिक्रमण नहीं हटवा पाए। वक्फ की लुटेरी बहुत सी वक्फ कमेटियों को भी वो नहीं हटा पाए, कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन यह सच है कि कुछ वक्फ कमेटियां ऐसी हैं जो बरसों से हेराफेरी व अनियमितता कर रही हैं और बोर्ड उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं कर पा रहा है।

डाॅक्टर खानू ख़ान बुधवाली के छोटे से 15 महीने के कार्यकाल में उनकी सक्रियता और बोर्ड के प्रति समर्पण ने वक्फ के लुटेरों में ख़ौफ जरूर पैदा कर दिया। नए बोर्ड में चेयरमैन के लिए जो नाम सामने हैं, उनमें डाॅक्टर बुधवाली का नाम सरे फहरिस्त है और उनका चेयरमैन बनना एक तरह से तय है, क्योंकि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के चहेते हैं। इनके अलावा जो नाम चर्चा में हैं उनमें पूर्व सांसद अश्क अली टाक, आदर्श नगर विधायक रफीक ख़ान, किशनपोल विधायक अमीन कागजी, दरगाह शरीफ़ सरवाड़ के मुतवल्ली यूसुफ ख़ान, राजस्थान बार काउंसिल के चेयरमैन एडवोकेट सय्यद शाहिद हसन और दो चार छुपे हुए दावेदार भी हैं, जो जयपुर से दिल्ली तक चेयरमैन बनने के लिए बहुत ही ख़ामोशी व सावधानी से गोटियां चल रहे हैं।

वक्फ बोर्ड चुनाव तो तय वक्त पर हो जाएगा और नया बोर्ड व चेयरमैन भी बन जाएगा। लेकिन लाख टके का सवाल फिर वही है कि वक्फ जायदादों को खुर्द बुर्द होने से कौन बचाएगा और उनका विकास कर आमदनी कौन बढाएगा, ताकि बोर्ड गठन का मकसद पूरा हो सके ? इस सवाल पर जबानी जमाखर्च के अलावा कुछ नहीं हो रहा है और यह आज की बात नहीं है, पिछले बीस पच्चीस साल से बोर्ड का यही हाल है। यहाँ यह बात हम स्पष्टता से कहना चाहते हैं कि पिछले दो दशक में वक्फ जायदादों को जमकर लूटा गया तथा इस लूट की काली दलदल में वक्फ बोर्ड से जुड़े हुए ज्यादातर लोग शामिल रहे। इनमें कोई चेयरमैन व बोर्ड मेम्बर की शक्ल में था, तो कोई वक्फ कमेटी के पदाधिकारी की शक्ल में, तो कोई बोर्ड कर्मचारी की शक्ल में।

अगर हमारा यह दावा गलत है, तो बोर्ड से जुड़े हुए लोगों को पिछले दो दशक की वक्फ बोर्ड की एसीबी से या किसी उच्च स्तरीय कमेटी बनवाकर जांच करवानी चाहिए, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। लेकिन ऐसी जांच कभी नहीं होगी, क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई होते हैं। इस जांच के लिए सरकार से भी कई बार मांग की गई, लेकिन नतीज़ा ढ़ाक के तीन पात ही रहा। सरकार जांच क्यों करवाएगी, क्योंकि वो खुद वक्फ जायदाद की लुटेरी बनी हुई है। विभिन्न सरकारी ऑफिस जो वक्फ जायदादों पर बने हुए हैं या जिन जायदादों पर सरकार कब्जा किए बैठी है, उनका करोड़ों रूपये किराया बाकी है, उसमें से कितना किराया आया और कितना आना बाकी है ? इस सवाल पर बोर्ड से लेकर सरकार तक सब खामोश रहते हैं।

वक्फ की लूट खसोट पर ज्यादातर मुस्लिम रहनुमा और आम मुसलमान भी खामोश रहते हैं। आम मुसलमान तो इसलिए खामोश रहता है कि वो इस मुद्दे को लेकर जागरूक ही नहीं है और रोज कुआं खोदकर पानी पीने की कोशिश में लगा रहता है। लेकिन मुस्लिम रहनुमाओं की खामोशी सवाल खड़े करती है। जिसकी वजह साफ है कि खामोश रहनुमाओं के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष स्वार्थ वक्फ के लुटेरों से जुड़े हुए हैं। या फिर वे सत्ताधारी राजनेताओं को वक्फ के मुद्दे पर अपना मुंह खोलकर नाराज़ नहीं करना चाहते, क्योंकि यह राजनेता ही तो वक्फ के लुटेरों के संरक्षक बने हुए हैं। यही वजह है कि आज वक्फ एक्ट और वक्फ बोर्ड होते हुए भी हर जिले व तहसील में वक्फ जायदाद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं।

वक्फ बोर्ड में एनओसी, किरायानामा, कमेटी गठन करने, कमेटी भंग करने आदि को लेकर जमकर हेराफेरी होती है। जो आज से नहीं बरसों से चल रही है। इस पूरे लूट खसोट के खेल से वक्फ जायदादें बरबाद हो रही हैं। वक्फ जायदाद की हिफाज़त और विकास के लिए केन्द्र सरकार ने वक्फ एक्ट बना रखा है। जिसके तहत हर राज्य में वक्फ बोर्ड का गठन होता है तथा उस राज्य की वक्फ जायदादों की हिफाज़त और विकास की जिम्मेदारी इसी बोर्ड की होती है। लेकिन बोर्ड एक खुद मुख्तार इदारा (स्वायत्त शासी संस्थान) होते हुए भी राज्य सरकार के दबाव में रहता है। क्योंकि अमूमन बोर्ड का चेयरमैन वही सदस्य बनता है, जिसे सरकार मनोनीत करती है या वो सत्तारूढ़ पार्टी के लिए पूरी तरह से समर्पित होता है। हालांकि चेयरमैन का पद कहने को एक निर्वाचित पद होता है, लेकिन यह निर्वाचन सत्तारूढ़ पार्टी की मनमर्जी के मुताबिक ही होता है। यानी वक्फ बोर्ड का चेयरमैन वही बनता है, जिसे राज्य की सत्ता और वहाँ सत्तारूढ़ पार्टी बनाना चाहे। इसलिए वक्फ बोर्ड चेयरमैन एक स्वायत्त शासी बोर्ड का चेयरमैन होते हुए भी सरकार के हाथों की कठपुतली होता है।

राज्य में नई सरकार बनते ही वक्फ जायदाद को खुर्द बुर्द करने के ताने बाने बुनने शुरू हो जाते हैं। वक्फ के लुटेरे पूरी तरह से सक्रिय हो जाते हैं। पुराने लुटेरे अपने आपको बचाने तथा वक्फ कमेटी के नाम पर मिले लूट के पट्टे को बरकरार रखने के लिए हर उस सियासी चौखट पर हाजरी लगाते हैं, जिससे उन्हें खुद के भले की उम्मीद हो। इसी तरह नए लुटेरों का भी एक गिरोह खड़ा हो जाता है, इस गिरोह के ज्यादातर लोग सत्तारूढ़ पार्टी से सम्बंधित होते हैं तथा अपने सियासी आकाओं को समझाते हैं कि वक्फ बोर्ड बहुत अच्छी जगह है, वहाँ अभी तक विपक्षी पार्टी के लोग विराजमान हैं, आप जल्दी से हमें वहाँ बैठाइये, ताकि अपन सब लाभ में रहें। यानी दोनों हाथों से मिलकर वक्फ जायदाद को खुर्द बुर्द करें।

इन्हीं दांवपेंच के बीच कुछ महीनों बाद वक्फ बोर्ड का समय पूरा हो जाता है और नई सरकार की मर्जी के मुताबिक नए बोर्ड का गठन हो जाता है। नए बोर्ड में कुछ सदस्य सत्तारूढ़ पार्टी के नहीं होते हैं, लेकिन अपना काम निकालने और चहेतों को वक्फ कमेटी नाम की रेवड़ी बांटने के लिए वे सत्तारूढ़ पार्टी और चेयरमैन की हाँ में हाँ मिला लेते हैं और लूट की यह व्यवस्था ईमानदारी से चलती रहती है। यानी सब मिल बांटकर यह खेल खेलते रहते हैं। वक्फ जायदाद को लूटने के लिए सबकी अपनी अपनी टेरेट्री (इलाका) स्थापित हो जाती है। किसी को एरिया मेम्बर नाम की टेरेट्री मिल जाती है, तो किसी को वक्फ कमेटी नाम की। झगड़ा तब होता है, जब एक दूसरे की टेरेट्री में कोई अमल दखल करता है या लूट के माल का ईमानदारी से बंटवारा नहीं करता है।

जरा गौर से पढ़िए, वक्फ जायदादें मुसलमानों की भलाई के लिए हैं और मुसलमानों का यह ईमान है कि यह अल्लाह की मिल्कियत हैं। फिर भी यह मुसलमानों के हाथों उजड़ रही हैं, खुर्द बुर्द हो रही हैं और मुसलमान खामोश तमाशबीन बना बैठा है। वक्फ बोर्ड के सदस्य, सीईओ, चेयरमैन, मुतवल्ली और वक्फ कमेटियों के पदाधिकारी सब मुसलमान होते हैं तथा अधिकतर इन्हीं के हाथों वक्फ जायदाद खुर्द बुर्द होती हैं। यह भी सच है कि इनमें से कुछ लोग बड़े ईमानदार होते हैं और वे अपनी जेब का पैसा खर्च करके वक्फ जायदाद की हिफाज़त करते हैं, लेकिन ऐसों की तादाद अंगुलियों पर गिनने जितनी है। अफसोसनाक बात तो यह है कि वक्फ के ऐसे ईमानदार ख़ैरख्वाहों का कोई खुलकर तआवुन (सहयोग) भी नहीं करता है और उम्र के आखरी पड़ाव तक वक्फ जायदादों के लिए जद्दोजहद करते हुए यह खैरख्वाह इस दुनिया से रुख़सत हो जाते हैं या मायूस होकर घर बैठ जाते हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक देश में सबसे ज्यादा जमीन रेलवे के पास है और दूसरे नम्बर पर वक्फ बोर्ड के पास तथा वक्फ जायदाद की हिफाज़त और विकास सही तरीके से हो जाए एवं बाजार रेट पर किराया समय पर जमा हो जाए, तो देश के सभी मुस्लिम बच्चे बच्चियों को बेहतरीन तालीमी इदारों में इस आमदनी से पढाया जा सकता है। यानी वक्फ जायदाद की आमदनी से पूरे भारत के मुस्लिम विद्यार्थियों को गुणवत्ता वाली नि:शुल्क शिक्षा दी जा सकती है। लेकिन यह करे कौन ? क्योंकि बाड़ खेत को खा रही है और किसान बची हुई खेती की हिफाज़त करने की बजाए खामोशी का लिबादा ओढ कर उजड़े हुए खेत को देख रहा है।
(10-07-2021)
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