आरपीएससी इन्टरव्यू को लेकर चेयरमैन, मेम्बर और शिक्षा मन्त्री डोटासरा सन्देह के घेरे में

आरपीएससी इन्टरव्यू को लेकर चेयरमैन, मेम्बर और शिक्षा मन्त्री डोटासरा सन्देह के घेरे में
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मुख्यमंत्री की खामोशी पर भी उठ रहे हैं सवाल
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आरएएस परीक्षा में इन्टरव्यू प्रक्रिया समाप्त करने, शिक्षा मन्त्री को बर्खास्त करने तथा इस सम्पूर्ण घोटाले व हेराफेरी की उच्च स्तरीय जांच करवाने की उठी मांग।
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जयपुर/अजमेर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) ने 13 जुलाई को आरएएस परीक्षा 2018 के इन्टरव्यू पूरे करने के बाद उसी दिन देर रात उसका परिणाम भी जारी कर दिया। जिनका सिलेक्शन हुआ वे बेहद खुश हुए और जिनको सिलेक्शन की पूरी उम्मीद थी, लेकिन सिलेक्शन नहीं हुआ, वे बेहद दुखी हुए। वे अभ्यर्थी भी दुखी हुए जिनको शुरूआती रैंकस में नम्बर आने की उम्मीद थी, लेकिन उनका नम्बर आखरी रैंकस में आया। परिणाम के अगले दिन ही इस पूरी इन्टरव्यू प्रक्रिया पर सवाल उठने शुरू हो गए। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष व शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा के रिश्तेदारों के लिखित परीक्षा में कम नम्बर होते हुए भी इन्टरव्यू में 80-80 नम्बर आने से पूरी इन्टरव्यू प्रक्रिया ही सन्देह के घेरे में आ गई।


शिक्षा मंत्री डोटासरा के पुत्र के साले गौरव और साली प्रभा के लिखित परीक्षा या मुख्य परीक्षा में क्रमशः 379.50 (47.44 प्रतिशत) और 366.50 (45.81 प्रतिशत) अंक आए हैं, लेकिन इन्टरव्यू में दोनों भाई बहन को 80-80 अंक दिए गए हैं, यानी लिखित में 50 प्रतिशत से कम अंक आने के बावजूद इन्हें 80 प्रतिशत अंक इन्टरव्यू में दिए गए हैं। विचित्र बात यह भी है कि इस आरएएस परीक्षा की टाॅपर मुक्ता राव के लिखित परीक्षा में 449 अंक हैं और उसे इन्टरव्यू में 77 अंक दिए गए हैं। इसी प्रकार टाॅप 16 अभ्यर्थियों में तीन तो ऐसे हैं, जिनको इन्टरव्यू में 70 से भी कम अंक दिए गए हैं। टाॅप 16 की लिस्ट में 14 वें नम्बर पर गरिमा शर्मा का सिलेक्शन हुआ है, जिसके लिखित परीक्षा में 441.50 अंक आने के बावजूद उसे इन्टरव्यू में 60 नम्बर ही दिए गए हैं। टाॅपर लिस्ट में चौथा नम्बर आने वाले निखिल कुमार के लिखित परीक्षा में 448.50 अंक आने के बावजूद उसे इन्टरव्यू में 67 अंक ही दिए गए हैं। ऐसे भेदभाव की और भी खबरें चर्चा में हैं।

इससे आरपीएससी की इन्टरव्यू प्रक्रिया और इसमें नम्बर देने में किए गए भेदभाव पर गम्भीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। हालांकि इस घोटाले व हेराफेरी पर आरपीएससी चेयरमैन एवं पूर्व डीजीपी भूपेन्द्र सिंह यादव ने कहा है कि इन्टरव्यू पूरी तरह से पारदर्शी और फुलप्रूफ हुए हैं और इसमें किसी किस्म की हेराफेरी व भेदभाव करना सम्भव नहीं है। चेयरमैन का यह दावा अपनी जगह सही होगा, लेकिन सवाल जो उठ रहे हैं, वे भी कम गम्भीर नहीं हैं। पूरे देश में जब भी कोई घोटाला या अनियमितता हुई है तो उस विभाग के अधिकारी व मन्त्री हमेशा यही कहते हैं कि कोई घोटाला नहीं हुआ और पूरी तरह से नियमों का पालन किया गया है। ऐसा कोई अधिकारी या मन्त्री है, जिसने अपने विभाग के घोटाले पर कहा हो कि हाँ, हमारे यहाँ यह गलत हुआ है और हम इसकी जांच करवाएंगे तथा जब तक जांच पूरी नहीं हो, हम हमारे पदों से हट जाएंगे ?

शिक्षा मन्त्री डोटासरा ने भी सफाई दी है कि उनके रिश्तेदारों का चयन उनकी वजह से नहीं, बल्कि योग्यता के कारण हुआ है। सबको मालूम है कि जब राजस्थान लोक सेवा आयोग के अजमेर स्थित मुख्यालय में आरएएस भर्ती परीक्षा के इन्टरव्यू चल रहे थे, तभी 9 जुलाई को यानी परिणाम घोषित होने से चार दिन पहले एसीबी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए आयोग के ही जूनियर अकाउंटेंट सज्जन सिंह गुर्जर को एक अभ्यर्थी से 23 लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था। इसके अगले ही दिन गुर्जर के सहयोगी नरेन्द्र पोसवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। दोनों ने स्वीकार किया था कि यह रिश्वत राशि आयोग की सदस्य राजकुमारी गुर्जर के लिए ली जा रही थी। यह रिश्वत राशि श्रीमती गुर्जर तक उनके पति रिटायर्ड आईपीएस भैरों सिंह गुर्जर के माध्यम से पहुंचनी थी। एसीबी के पास वे सारे रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि आरएएस के इन्टरव्यू में अच्छे अंक दिलवाने के नाम पर रिश्वतखोरी हो रही थी।

शिक्षा मन्त्री डोटासरा के रिश्तेदारों के सिलेक्शन के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के एडवोकेट गोवर्धन सिंह ने भी सवाल खड़े करते हुए उनके ओबीसी सर्टिफिकेट को ही फर्जी बताया है। उन्होंने कहा है कि डोटासरा की पुत्रवधु प्रतिभा, उनके भाई गौरव और उनकी बहन प्रभा के पिता का नाम रमेश चन्द्र पूनियां है, जो वर्तमान में चूरू जिले के जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। कानून के मुताबिक रमेश चन्द्र पूनियां के बच्चे क्रीमीलेयर होने के कारण ओबीसी का प्रमाण पत्र नहीं बनवा सकते थे, इसके बावजूद इन तीनों का फर्जी ओबीसी प्रमाण पत्र बनवाया गया तथा ओबीसी के अंतर्गत आने वाली अन्य जातियों के गरीब अभ्यर्थियों का हक मारा गया है। उन्होंने उक्त सन्दर्भ में आरपीएससी चेयरमैन से मुकदमा दर्ज करवा कर कार्रवाई करने की मांग की है। हालांकि रमेश चन्द्र पूनियां ने इन आरोपों को गलत बताया है और ओबीसी सर्टिफिकेट नियमानुसार बनवाने की बात कही है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद लोग सवाल उठा रहे हैं और पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच करवाने की मांग कर रहे हैं। साथ शिक्षा मन्त्री डोटासरा को बर्खास्त करने और आरएएस भर्ती में इन्टरव्यू प्रक्रिया को समाप्त करने की भी मांग कर रहे हैं। यह सब आरोप उस आरपीएससी पर लग रहे हैं, जिसके चेयरमैन भूपेन्द्र सिंह यादव हैं, जिन्हें एक ईमानदार अधिकारी माना जाता है। भूपेन्द्र सिंह यादव राजस्थान पुलिस के डीजीपी भी रहे हैं तथा वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के चहेते अधिकारी हैं। एसीबी गृह विभाग के अन्तर्गत काम करती है और गृह विभाग मुख्यमंत्री गहलोत के पास है, तो सवाल यह भी उठता है कि क्या इन्टरव्यू के दौरान आरपीएससी दफ्तर पर हुई एसीबी की कार्रवाई मुख्यमंत्री को बिना बताए हुई थी ? या मुख्यमंत्री को इस घोटाले का मालूम था और भूपेन्द्र सिंह यादव और आयोग के दूसरे सदस्य मुख्यमंत्री की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे थे ?

यह सवाल इसलिए भी गम्भीर हैं कि गत वर्ष के आखिर में ही आरपीएससी के चेयरमैन व मेम्बरों की नियुक्ति मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मर्जी से हुई थी तथा तब इस नियुक्ति के राजनीतिक समीकरणों व जातीय दबाव पर भी सवाल उठे थे। इन सभी सवालों पर यह लेख लिखे जाने तक मुख्यमंत्री की तरफ से कोई सफाई या बयान नहीं आया है। इन सभी सवालों पर मुख्यमंत्री को अपना मुंह खोलना चाहिए और प्रदेश की सात करोड़ जनता को यह बताना चाहिए कि आरएएस (राजस्थान प्रशासनिक सेवा) सिलेक्शन में क्या हेराफेरी व घोटाला हुआ है। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि मुख्यमंत्री अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं।
(23-07-2021)
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