वरिष्ठ समाजवादी नेता अर्जुन देथा की आरक्षित-वंचित वर्ग से एकजुट होने की अपील
वरिष्ठ समाजवादी नेता अर्जुन देथा की आरक्षित-वंचित वर्ग से एकजुट होने की अपील
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भाजपा व कांग्रेस को एक जैसी पार्टी बताकर कहा कि यह दोनों पार्टियां देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था की दुश्मन, पूंजीपतियों की मित्र और आरक्षित-वंचित वर्ग की शत्रु हैं। इसलिए इन दोनों पार्टियों से देश को बचाइये।
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भाजपा व कांग्रेस को एक जैसी पार्टी बताकर कहा कि यह दोनों पार्टियां देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था की दुश्मन, पूंजीपतियों की मित्र और आरक्षित-वंचित वर्ग की शत्रु हैं। इसलिए इन दोनों पार्टियों से देश को बचाइये।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। देश की आजादी को शीघ्र ही 74 वर्ष होने वाले हैं सर्वाधिक 55 साल कांग्रेस पार्टी ने और दूसरे नंबर पर लगभग 15 वर्ष भारतीय जनता पार्टी ने राज किया। दोनों एक दूसरे पर निरंतर दोषारोपण करते रहते हैं और एक दूसरे से स्वयं को बेहतर सिद्ध करने के लिए भी शोर मचाते रहते हैं, असल में यह दोनों एक ही चरित्र की पार्टियां हैं। इनमें कोई भी नेता नहीं है इनकी नीति नीयत, चाल चरित्र, काम व्यवहार में कोई अंतर नहीं है। इन दोनों पार्टियों के लंबे शासन के शासनकाल में देश लगातार बड़े कारपोरेट घरानों पूंजीपतियों के द्वारा लूट का शिकार बनाया जा रहा है। इस लूट को बनाए रखने के लिए भांत भांत के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।
आज देश सर्वाधिक विकट हालात से गुजर रहा है, महंगाई लगातार बढ़ रही है, बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। तब विश्वास भी लगातार बढ़ रहा है बड़े पैमाने पर लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए गए हैं। जिनके पास दो जून की रोटी का बंदोबस्त नहीं है, ठीक से रहने का बंदोबस्त नहीं है, इलाज का कतई बंदोबस्त नहीं है। गरीब बच्चों के पढ़ाई का कोई बंदोबस्त नहीं है, ग्रामीण इलाकों में स्कूल हैं तो अध्यापक नहीं हैं। अस्पताल हैं लेकिन डॉक्टर नर्स कंपाउंडर नहीं हैं। दवाइयों का अभाव हमेशा बना ही रहता है। विषमता और विकटता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। लोगों की बदहाली बढ़ती जा रही है। क्योंकि शासक पार्टी और प्रतिपक्ष पार्टी दोनों में एक प्रकार की सांठगांठ है और वह प्रायः बारी बारी के राज को लेकर आपस में एकराय हैं। जिन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए संघर्ष होना चाहिए, समाधान निकलना चाहिए, संसद में गूंज होनी चाहिए, राज्यों की विधानसभा में बहस होनी चाहिए, यह सब नदारद हैं।
ऐसे लोग जो जनप्रतिनिधि चुनकर जा रहे हैं वे धन के द्वारा टिकट लाओ, धन के द्वारा वोट हथियाओ, वोट के जरिए सत्ता पाओ और सत्ता के जरिए लूट मचाओ, फिर अपना निजी खजाना भरो और आम लोगों को बदहाल तड़पता हुआ छोड़ दो। ऐसा लंबे समय से इस कारण हो रहा है क्योंकि जो पीड़ित मानवता है उनमें ना बेहतर समझ है ना बेहतर तालमेल है, ना बेहतर एकता है न ही बेहतर सामूहिक दिशा है। अगर ऐसा हो जाए तो लुटेरे वर्ग को सत्ता से बाहर किया जा सकता है और बेहतर हिंदुस्तान बनाया जा सकता है। जब असली मुद्दे भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई हैं फिर भी लगातार धर्म का शोर मचता रहता है। अन्य धर्म के लोगों पर आक्रमण के काम होते रहते हैं। विकास का भी नारा लगता है, लेकिन असली विकास जो लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार दे ऐसा हो नहीं रहा है जो सबसे बड़ी बात है वह है इस देश की सत्ता संपत्ति शासकीय पदों और जीवन के सुख के तमाम साधनों पर ब्राह्मण वादियों का कब्जा होना।
मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं न किसी जाति का विरोधी हूं और न मैं किसी धर्म का विरोधी हूं। लेकिन मैं ब्राह्मणवाद के जरिए इस देश में जिस तरह से गरीबों का खून चूसा गया है मैं उसके खात्मे का पक्षधर हूं। मैंने एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में इस दिशा में संभव प्रयास किए लेकिन स्थितियां लगातार विपरीत बनती गई और हमारे बचपन के नारे धार्मिक कट्टरता मारामारी और कारपोरेट घरानों बड़े पूंजीपतियों की लूट के तले सभी सपने चकनाचूर होते गए।
आज सबसे ज्यादा आवश्यकता वंचितों की एकता की है, बेहतर समझ की है और समझ के साथ चेतना आधारित बड़े संघर्ष की भी है, तभी लुटेरे वर्ग को इस देश की सत्ता संपत्ति ऊंचे पदों और तमाम स्थानों पर उनका कब्जा समाप्त कर वंचित वर्ग का कब्जा करने की है। देश की राजधानी दिल्ली के जिमखाना क्लब की सदस्यता फीस 7 करोड़ रूपया है। इसी प्रकार जयपुर, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद आदि स्थानों पर जो भी बड़े प्रतिष्ठित लोगों के क्लब हैं, उसमें एक भी दलित मेंबर नहीं हैं, पिछड़े भी नहीं हैं, आदिवासी का तो सवाल ही नहीं है। गांव के अन्य गरीबों का भी सवाल नहीं है खेतिहर लोगों का भी सवाल नहीं है। यही स्थिति तथाकथित संभ्रांत लोगों की बस्तियों की है। दिल्ली का लुटियंस जोन सर्वाधिक प्रतिष्ठित आवासीय कॉलोनी है। जिसमें लगभग ढाई हजार रिहायशी मकान है। लगभग 600 निजी मकान हैं। लेकिन इनमें भी न तो एक दलित है और ना ही एक आदिवासी है। ना पिछड़ा है, कोई अपवाद हो तो संभव है। मैं उसका दावा नहीं करता हूँ।
मुंबई में मालाबार हिल्स प्रतिष्ठित लोगों की आवासीय बस्ती है, उसका भी यही हाल है। हैदराबाद का जुबली हिल्स, चेन्नई का पोएस गार्डन का भी यही हाल है।कोलकाता का साल्ट लेक इत्यादि का भी यही हाल है। तथाकथित बड़े लोगों, संभ्रांत लोगों, ऊंचे लोगों, सबल और सवर्ण लोगों की बस्तियों को इस देश का वंचित वर्ग केवल बाहर से टुकुर टुकुर देख सकता है। उनके क्लबों को भी बाहर से देख सकता है।
दिल्ली के प्रधानमंत्री आवास के ठीक पास में वहां मैदान है लेकिन इस क्लब को भी वंचित वर्ग के लिए बंद किया हुआ है। यही हाल पूरी जुडिशरी का है, जहां न्याय होता है वहां वंचित वर्ग है ही नहीं, तो वंचितों के साथ न्याय कैसे हो सकता है ? हालांकि मिलोर्ड कहे जाने वाले लोगों पर कोई कमेंट करना भी इस देश में अपराध है। लेकिन मैं यह अपराध करने की धृष्टता जरूर करना चाहूंगा। जुडिशरी में न्यायपालिका में ऊंचे पदों पर आरक्षण को हमेशा नकारा गया, जो थोड़ा सा आरक्षण छोटी नौकरियों में दलित, पिछड़ों और आदिवासियों को मिला हुआ है वह भी पूरा भरा नहीं जाता है। लगातार बेकलोग बना रहता है, सामान्य पदों पर आरक्षित वर्ग के लोगों के लिए दरवाजे लगभग बंद हैं। तो वहां घुसने की गुंजाइश बहुत कम है, क्योंकि उच्च नौकरशाही में उच्च वर्गीय लोगों का कब्जा है और सत्ता में बैठे लोग उच्च वर्ग और उच्च वर्ग को हर हाल में खुश रखना चाहते हैं। इसलिए वंचित वर्ग को कोई अवसर मिलने का सवाल ही नहीं।
हमारे राज्य राजस्थान की बात करें तो स्वीकृत सरकारी पद कभी पूरे भरे नहीं जा सकते, बड़े पैमाने पर ठेका प्रथा और अब तो कुछ कंपनियों के द्वारा सप्लाई आफ एम्पलाइज और छोटे छोटे काम भी निजी हाथों में देने का चलन बढ़ गया है। कुल सरकारी नौकरियों में से लगभग आधे पद निजी संस्थाओं के जरिए ठेके पर भरे हुए हैं, उनका भविष्य हमेशा अंधेरे में रहता है, 20 साल की नौकरी किए हुए लोग भी ठेके पर चल रहे हैं, जब कोई व्यक्ति अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर संपूर्णतः अनिश्चिता और तनावग्रस्त रहता है तो उसकी कार्यक्षमता पर भी असर पड़ता है। लेकिन सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं है। सरकार कांग्रेस की हो या भारतीय जनता पार्टी की, स्थितियां एक जैसी ही रहती हैं।
इसके साथ ही आरक्षित वर्ग के बच्चों को कदम कदम पर प्रताड़ित किया जा रहा है। उनसे बार बार जाति प्रमाण पत्र मांगा जाता है। इन तथाकथित अकलमंद राज करने वालों और नौकरशाहों से यह पूछा जाए कि क्या एक व्यक्ति की जाति जीवन में कभी बदलती है ? मेरा उत्तर है कभी नहीं और चाहे जिस चीज में परिवर्तन हो लेकिन इंसान की जाति जन्म से लेकर मरण तक एक ही रहती है। मूल निवास प्रमाण पत्र के नाम पर और अन्य भांत भांत के प्रमाण पत्रों के नाम पर बच्चों को परेशान किया जाता है। ई मित्रों के चक्कर लगवाए जाते हैं और सर्वाधिक प्रयास इस बात का रहता है कि वंचित आरक्षित वर्ग के बच्चे प्रतियोगिता से बाहर रह जाएं, भाग ही ना ले पाएं, ताकि उच्च वर्गीय और उच्च वर्ण लोगों का 50 प्रतिशत सामान्य नौकरियों का हिस्सा उनके कब्जे में बना रहे। यह नौजवान पीढ़ी के साथ घोर अन्याय है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों इस ज्वलंत मुद्दे पर कान धरने को कतई तैयार नहीं हैं।
अब तो यह इस मामले में भी एक हो गए हैं कि लगातार सरकारी कंपनियों को सरकारी प्रतिष्ठानों को यहां तक की रक्षा उत्पादन प्रतिष्ठानों को भी निजी हाथों में बेचा जा रहा है, रेलवे निजी क्षेत्र में जा रहा है, देश के हवाई अड्डे निजी क्षेत्र में जा रहे हैं। एलआईसी को बेचा जा रहा है, बीएसएनल को बर्बाद कर ही चुके हैं। अब रक्षा उत्पादन प्रतिष्ठान भी बेचे जाने वाले हैं। तथाकथित राष्ट्रभक्ति का दावा करने वाली भारत सरकार देश की रक्षा की परवाह भी करने को तैयार नहीं है और देश की कीमत पर अपने पसंदीदा पूंजीपतियों को बढ़ावा दे रही है। मित्रों अब सक्रियता के साथ मैदान में उतरने का समय है और जो शोषक वर्ग हैं उनसे सीधा मुकाबला करने के अलावा और कोई विकल्प नजर नहीं आता है।
लोकतंत्र का अपहरण और चीरहरण लगभग हो चुका है। लोकतंत्र अब धन तंत्र और लूट तंत्र में बदल दिया गया है। कोई साधारण आदमी किसी भी स्तर के चुनाव में भाग लेने की स्थिति में नहीं है और जो लोग बड़ा पैसा लगाकर चुनाव जीतकर जाते हैं, उनके सामने अपनी अधिक से अधिक कमाई में लगने के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता है। संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग पहुंच गए हैं जिनका आम लोगों के जनजीवन के साथ कोई रिश्ता नहीं है और इसकी जड़ है संपूर्णता नकली धार्मिक नारे जिनका इंसान के जीवन के साथ कोई रिश्ता नहीं है। मंदिर कितने भव्य बनाए जाएंगे इससे किसी का पेट नहीं भरता है। किसी को नौकरी नहीं मिलती है, डीजल पेट्रोल सस्ता नहीं होता है, रासायनिक खाद सस्ती नहीं होती है, किसान को उचित मूल्य नहीं मिलता है, बेरोजगारों को रोजगार नहीं मिलता है, लेकिन षड्यंत्रकारी लोग निरंतर या तो धर्म धर्म चिल्लाते हैं या राष्ट्रभक्ति राष्ट्रभक्ति चिल्लाते हैं या हिंदू राष्ट्र की बातें फैलाते हैं जो पूर्णता फर्जी बातें हैं।
दुनिया में बड़े जो विकसित राष्ट्र हैं वे किसी धर्म के नाम पर बने हुए नहीं हैं, चाहे एक धर्म की बहुलता भले हो लेकिन वह अपने आप को धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रवादी बनाए हुए हैं। मेरा अनुरोध है कि संजीदगी के साथ गौर करें एकजुट हों और आगे बढ़ें, क्योंकि लंबे समय से चल रहे किसान आंदोलन के साथ भारत सरकार ने जिस क्रूर और षड्यंत्रकारी रवैये का परिचय दिया है वह सबको चौकन्ना करने के लिए पर्याप्त है। किस प्रकार से हजारों करोड़ों रुपया चुनाव में बहाकर, बूथ लूटकर फर्जी कार्यवाहियां करके सत्ता हथियाई जा रही है, वह भी हमें सचेत करने वाली है। आइए नया भारत बनाएं, समानता पर आधारित, सद्भावना पर आधारित भारत बनाएं, जहां न कोई लूटने वाला हो, न लुटने वाला हो, न ही धार्मिक कट्टरता का बोलबाला हो, ना वंचितों पर किसी प्रकार की ज्यादती हो। सभी साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन। नए विचारों, नए सपनों नई योजनाओं के साथ हम शीघ्र मिलें। इसी कामना के साथ।
आपका साथी
अर्जुन देथा
8696651984, 9414166041

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