जातीय जनगणना और आरक्षित वर्गों के मुद्दों को लेकर समाजवादी नेता अर्जुन देथा ने लिखा मुख्यमंत्री गहलोत को पत्र

जातीय जनगणना और आरक्षित वर्गों के मुद्दों को लेकर समाजवादी नेता अर्जुन देथा ने लिखा मुख्यमंत्री गहलोत को पत्र
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प्रिय श्री गहलोत,
आजादी के आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा गोलमेज काॅन्फ्रेन्सेज का आयोजन किया गया था। जिसमें कांग्रेस, देशी रजवाड़ों, अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़ों की ओर से भी प्रतिनिधि शरीक हुए थे। बाबा साहेब डाॅक्टर भीमराव अम्बेडकर जो कि उस समय देश के वंचित वर्गों की पीड़ा को मुखर रूप से व्यक्त कर रहे थे और उनके प्रयासों से ही वंचितों के मुद्दे दुनिया के सामने ज्वलंत रूप से रखे गए।


सम्भावित आजादी के बाद देश में वंचित वर्गों की स्थिति को लेकर बाबा साहेब अम्बेडकर चिन्तित थे और उनको न्याय दिलवाने के लिए प्रयासरत थे, लेकिन उनके प्रयासों का कांग्रेस पार्टी न सिर्फ लगातार विरोध करती रही, बल्कि उनके प्रयासों को विफल करने की लगातार चेष्टा भी करती रही। परन्तु बाबा साहेब अम्बेडकर के दृढ़ संकल्पित प्रयास जारी रहे और बात बढ़कर दलितिस्तान के रूप में एक पृथक राष्ट्र के निर्माण तक पहुंच गई। लेकिन मध्यस्थों के प्रयासों के परिणामस्वरूप बाबा साहेब अम्बेडकर ने वंचित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मण्डल गठित करवाने की बात पर सहमत हो गए।

इस पर गांधी जी ने पृथक निर्वाचक मण्डल गठित करवाने के विरोध में अनशन प्रारम्भ कर दिया। वे उस समय पूना के निकट यरवदा जेल में थे। वहाँ अनशन के दौरान उनकी हालत बिगड़ने लगी और मेडिकल बुलेटिनों में किसी अनिष्ट की आशंका जताई जाने लगी। तब पण्डित मदनमोहन मालवीय सहित कई बड़े कांग्रेसी नेता महात्मा गांधी का जीवन बचाने की गुहार लेकर डाॅक्टर अम्बेडकर के पास गए। डाॅक्टर अम्बेडकर महान मानवतावादी, नरम और नेक दिल इन्सान थे। उन्होंने गांधी जी का जीवन बचाने के लिए इस शर्त पर सहयोग देना स्वीकार किया कि सम्भावित आजादी के बाद बनने वाले भारत में सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थाओं एवं विधायिकाओं में सभी वंचितों (दलित, पिछड़े और आदिवासियों) के लिए विशेष प्रतिनिधित्व (आरक्षण) दिया जाए। जिसे कांग्रेस ने स्वीकार किया। जो इतिहास में पूना पैक्ट (यरवदा समझौते) के नाम से विख्यात है।

इसी समझौते की भावना के अनुरूप डाॅक्टर अम्बेडकर को संविधान निर्मात्री सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। तदनुसार संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया। पण्डित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में पिछड़े (ओबीसी) वर्गों के आरक्षण के सम्बन्ध में काका कालेलकर आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने देशभर में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की पहचान करते हुए अपनी रिपोर्ट तैयार की। जिसमें ओबीसी को आरक्षण की अनुशंसा की गई। लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और बाद में इसे रद्द कर दिया।

उन्हीं दिनों समाजवादी नेता डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया और बाबा साहेब अम्बेडकर के बीच में लगातार इस बाबत मन्त्रणाएं हुई तथा वंचित वर्गों दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए एक राजनीतिक दल बनाने की भी सहमति हो गई। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पत्रकारों के बीच में यह कहकर उनका मजाक उड़ाया कि "दो डाॅक्टर मिलकर आसमान में महल बना रहे हैं।" प्रधानमंत्री के इस कथन की उस समय के समाचार पत्रों में विस्तार से चर्चा भी हुई थी। दुर्भाग्य से इस घटनाक्रम के तुरंत बाद डाॅक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर का 06 दिसम्बर 1956 को देहावसान हो गया।

तत्पश्चात डाॅक्टर लोहिया और सोशलिस्ट पार्टी ने वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखने का बीड़ा उठाया और इसे देशभर में एक बड़े आन्दोलन के रूप में खड़ा किया। इस बीच 12 अक्टूबर 1967 को डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया का 57 वर्ष की अल्प आयु में सरकारी डाॅक्टरों के गलत इलाज के कारण निधन हो गया। लेकिन सोशलिस्ट पार्टी ने "संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ" के नारे के साथ संघर्ष जारी रखा।

सोशलिस्ट पार्टी ने 1977 में विभिन्न दलों के विलय से बनी जनता पार्टी के गठन के समय अपनी पूर्व शर्त रखी कि नई बनने वाली पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण सहित उनके अधिकार दिलाने के लिए प्रावधान करेगी। सरकार बनाने के बाद जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र के अनुरूप बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी कमिशन) का गठन किया। मण्डल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। तब तक केन्द्र में पुनः श्रीमती इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बन चुकी थी। 1980 से 89 के बीच 10 वर्षीय कांग्रेस सरकारों ने मण्डल आयोग की रिपोर्ट का भी वही हश्र किया, जो कि वे काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट का कर चुके थे।

इस बीच 11 अक्टूबर 1988 को जनता दल का गठन हुआ तथा इस दल ने गठन के साथ ही यह घोषणा कर दी कि सत्ता में आने पर जनता दल मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू करेगा, देशभर के किसानों, दस्तकारों व कारीगरों का कर्जा माफ करेंगे। संसद के केन्द्रीय कक्ष में डाॅक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर की तस्वीर स्थापित करेंगे तथा उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न का सम्मान देकर उनके साथ कांग्रेस सरकारों द्वारा किए गए अपमानजनक व्यवहार का प्रतिकार करेंगे।

05 दिसम्बर 1989 को केन्द्र में जनता दल की सरकार श्री वी पी सिंह के नेतृत्व में गठित हुई तथा उसने जनता दल द्वारा किए गए उपरोक्त चारों वादों को तुरंत लागू कर दिया। देश में कमेरे (मेहनतकश) वर्गों को जनता दल सरकार द्वारा पहली बार अधिकार सम्पन्न बनाने के प्रयासों से बौखला कर सदियों से इस देश में वंचित वर्गों को गुलाम बनाए बैठे और शोषण का शिकार बनाने वाले उच्च वर्गीय एवं उच्च वर्णीय ताकतों ने कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के जरिए जनता दल सरकार को गिरा दिया। वी पी सिंह सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली भारतीय जनता पार्टी ने मण्डल को विफल करने के लिए अयोध्या की ओर कमण्डल यात्रा शुरू की, जो कि देश में खूनखराबे और धार्मिक विद्वेष फैलाने का जरिया बनी।

ओबीसी आरक्षण को अदालत के जरिए ख़ारिज करवाने के लिए भी इन ताकतों ने जोर लगाया तथा सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल करवाई। इतना ही नहीं, 13 अगस्त 1990 को जनता दल सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना के मुकाबले में 25 सितम्बर 1991 को कांग्रेस की नरसिंहा राव सरकार ने सामाजिक व शैक्षणिक आधार के बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान कर दिया। दोनों याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान समाजवादी नेता मधु लिमये ने पक्षकार बनने की याचिका लगाई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पक्षकार की बजाए इन्टरवीनर (दखल कर्ता) के रूप में अनुमति दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने मधु लिमये को स्वयं बहस करने की अनुमति भी प्रदान की।

मधु लिमये ने आरक्षण के सम्बन्ध में ऐतिहासिक घटनाक्रमों और कार्यवाहियों के साथ ही संविधान में किए गए विशेष प्रावधानों की मन्शा की विशद जानकारी कोर्ट में रखी। परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवम्बर 1992 को जनता दल सरकार की अधिसूचना को वैध ठहराने के साथ ही आर्थिक आधार वाली कांग्रेस सरकार की अधिसूचना को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले से सामाजिक न्याय, समानता और भाईचारे की विरोधी ताकतों को बिजली जैसा करन्ट लगा।

इन ताकतों ने बौखला कर सामाजिक न्याय के प्रणेता बाबा साहेब डाॅक्टर अम्बेडकर के निर्वाण दिवस 06 दिसम्बर 1992 को सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले के 20 दिन बाद अयोध्या स्थित ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया और देश को दंगों की आग में झौंक दिया। यह कुकृत्य केन्द्र की कांग्रेस सरकार और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की साज़िश व सांठगांठ से हुआ। 06 दिसम्बर का दिन सामाजिक न्याय व भाईचारे की विरोधी ताकतों ने विशेष रूप से इसलिए चुना ताकि संविधान निर्माता एवं सामाजिक न्याय के प्रणेता डाॅक्टर अम्बेडकर की यादों को ही धूमिल कर दिया जाए। जिसका परिणाम सामने है कि इस दिन को अब बहुत से लोग विजय दिवस-पराक्रम दिवस बनाम काला दिवस के रूप में मनाने लग गए हैं।

ओबीसी आरक्षण मिलने के बावजूद इस आरक्षण के विरूद्घ भांति भांति के रोड़े अटकाए गए। केन्द्र में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण है, राजस्थान में 21 ही दिया गया। क्रीमी लेयर, जाति प्रमाण पत्र आदि को लेकर ओबीसी को आरक्षण से वंचित करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। यह स्पष्ट सत्य है कि एक व्यक्ति की जाति जन्म से मृत्यु तक एक ही रहती है, तो फिर बार बार जाति प्रमाण पत्र क्यों बनवाया जा रहा है ? इस तरह सभी आरक्षित वर्गों के साथ जाति प्रमाण पत्र के नाम पर खिलवाड़ किया जा रहा है।

यह एक ध्रुव सत्य है कि एससी-एसटी को भी कभी भी आबादी के अनुरूप आरक्षण नहीं दिया गया। उनकी रोस्टर प्रणाली के साथ भी लगातार खिलवाड़ किया गया है। जिससे बड़ी संख्या में बैक लोक बना रहता है और एससी-एसटी को मिलने वाले पद भी उच्च वर्णीय लोगों द्वारा षड्यंत्र पूर्वक हड़पे जा रहे हैं। यह सब एससी-एसटी के साथ घौर अन्याय है। 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में एससी-एसटी की आबादी 31 प्रतिशत हो चुकी है, लेकिन उन्हें इतना आरक्षण नहीं दिया जा रहा है।

अत: मैं आपसे मांग करता हूँ कि राजस्थान विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया जाए, जिसमें जातीय जनगणना करवाने और विधायिका में आबादी के अनुपात में ओबीसी आरक्षण देने की व्यवस्था करवाने की केन्द्र से मांग की जाए। अगर केन्द्र सरकार जातीय जनगणना नहीं करवाती है, तो बिहार विधानसभा में पक्ष-विपक्ष के सर्व सहमत निर्णय के अनुसार राजस्थान में भी राज्य स्तर पर जातीय जनगणना करवाई जाए। तत्पश्चात सभी आरक्षित वर्गों (ओबीसी, एससी, एसटी) का उनकी संख्या के हिसाब से आरक्षण बढाया जाए। नम्बर दो, बार बार बनवाए जा रहे जाति प्रमाण पत्रों की व्यवस्था को बन्द कर सिर्फ एक बार ही जाति प्रमाण पत्र बनवाने का प्रावधान किया जाए।

मुख्यमंत्री महोदय यदि आप आंशिक रूप से भी सामाजिक न्याय के पक्षधर हैं तो मेरे पत्र की उक्त मांगों पर शीघ्रता से अमलीजामा पहनाएं।

आप लम्बे समय से क्वारेंटाइन हैं, मैं आपके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता हूँ ताकि आप पर्दे से बाहर आएं।
(दिनांक 23 अगस्त 2021)

आपका शुभेच्छु :-
अर्जुन देथा
प्रदेश अध्यक्ष, जनता दल सेक्यूलर
38, माधव नगर, शोभागपुरा, उदयपुर।
मोबाइल 8696651984

प्रतिष्ठा में:-
श्री अशोक गहलोत
मुख्यमंत्री,
राजस्थान सरकार, जयपुर।

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प्रतिलिपि सूचनार्थ:-
(1) श्री एच डी देवगौड़ा जी,
पूर्व प्रधानमंत्री एवं संस्थापक जनता दल सेक्यूलर।

(2) श्री एच डी कुमारस्वामी जी,
पूर्व मुख्यमंत्री कर्नाटक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष जनता दल सेक्यूलर।

(3) श्री मुलायम सिंह यादव जी,
पूर्व मुख्यमंत्री यूपी एवं संस्थापक समाजवादी पार्टी।

(4) श्री लालू प्रसाद यादव जी,
पूर्व मुख्यमंत्री बिहार एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष आरजेडी।

(5) श्री नीतीश कुमार जी,
मुख्यमंत्री बिहार एवं प्रमुख नेता जेडीयू।

(6) श्री अखिलेश यादव जी,
पूर्व मुख्यमंत्री यूपी एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष सपा।

(7) श्री तेजस्वी यादव जी,
पूर्व उप मुख्यमंत्री बिहार एवं नेता प्रतिपक्ष बिहार विधानसभा।

(8) श्री ओम प्रकाश चौटाला जी,
पूर्व मुख्यमंत्री हरियाणा एवं अध्यक्ष इनेलो।

(9) श्री के सी त्यागी जी,
राष्ट्रीय महासचिव जेडीयू।

(10) श्री प्रोफेसर मनोज झा जी,
सांसद राज्यसभा एवं प्रवक्ता आरजेडी।
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