राजसमन्द सांसद दीया कुमारी पर मेवाड़ के स्वाभिमानी शासक महाराणा प्रताप का अपमान करने का आरोप

राजसमन्द सांसद दीया कुमारी पर मेवाड़ के स्वाभिमानी शासक महाराणा प्रताप का अपमान करने का आरोप 
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वरिष्ठ समाजवादी नेता अर्जुन देथा ने इतिहास के पन्ने पलटते हुए सुनाई खरी खौटी
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अकबरी सेना के सेनापति जयपुर के राजा मानसिंह की वंशज दीया कुमारी अब मेवाड़ को शौर्य का प्रमाण पत्र दे रही हैं। कितना दुखद और अपमानजनक है यह मेवाड़ की जनता तय करे। सर्वप्रथम भारतीय जनता पार्टी ने राजा मानसिंह की वंशज दीया कुमारी को मेवाड़ की एक लोकसभा सीट राजसमंद का भाजपा प्रत्याशी बनाकर मेवाड़ की नाक काटने का काम किया, क्योंकि प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध मैदान इसी राजसमंद लोकसभा सीट का हिस्सा है, जहां दीया कुमारी के पूर्वज और बादशाह अकबर की सेना के सेनापति मानसिंह और महाराणा प्रताप के बीच युद्ध हुआ था। जिसमें एक छोटी रियासत होते हुए भी मेवाड़ के वीरों ने बादशाह की सेना को कड़ी टक्कर दी और नाकों चने चबवा दिए थे। 


मेवाड़ के बाहुबली योद्धाओं ने इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देकर मेवाड़ और संपूर्ण मानवता का मान बढ़ाया था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी प्रारंभ से ही इस युद्ध को हिंदू-मुस्लिम युद्ध निरूपित करने पर आमादा रही है, क्योंकि उसके भेजे पर नफरत का चश्मा चढ़ा हुआ है। वो किसी भी चीज को केवल नफरत की निगाहों से ही देखती है, वो इसके लिए अभिशप्त है। जबकि सत्य यह है कि हल्दीघाटी का युद्ध हिंदू-मुस्लिम युद्ध नहीं था, यह युद्ध भारत के उस समय के ताकतवर बादशाह अकबर की सेना और एक छोटी रियासत मेवाड़ और उसके महाराणा प्रताप की सेना के बीच था। अकबरी सेना के सेनापति जहां हिंदू राजा मानसिंह थे, वहीं मेवाड़ की सेना के सेनापति हकीम खान सूर एक मुसलमान थे। 

इसलिए यह युद्ध हिंदू मुस्लिम युद्ध नहीं था, बल्कि दो हुक्मरानों के बीच था। जिसमें एक हिंदू था और दूसरा मुसलमान था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी अपनी विभाजानकारी सोच को साबित करने के लिए हमेशा ऐसे झूठ और पाखंड न केवल गढती रहती है बल्कि उसे निरंतर प्रचारित भी करती रहती है और कुतर्कों का सहारा लेकर थोपने की कोशिश भी करती रहती है, वो हर किसी को अपने रंग में रंगने पर आमादा है।वो अपने से भिन्न किसी रंग को बर्दाश्त करने के लिए कतई तैयार नहीं है। वो सब कुछ भगवा ही भगवा देखना और दिखाना चाहती है जबकि हल्दीघाटी युद्ध तो भगवा भी नहीं था, क्योंकि मेवाड़ रियासत के झंडे का रंग लाल था। उस पर लिखा ध्येय वाक्य "जिही दृढ़ राखे धर्म को तिही राखे करतार" जिसका भावार्थ यह है कि जो अपने कर्तव्य का निष्ठा पूर्वक पालन करे मानवता के प्रति समर्पित रहे, गरीबों के प्रति सहिष्णु और सद्भावी रहे, वह मेवाड़ का धर्म है। 

सनातन धर्म में धर्म की व्याख्या करते हुए यह भी कहा गया है कि "धर्म: इति धार्येत" अर्थात जो धारण किया जाए और उसका पालन किया जाए वही धर्म है और उस रास्ते पर महाराणा प्रताप चले और उसका निर्वाह किया। महाराणा प्रताप की महानता इस बात में है कि उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इनकार किया और युद्ध में मुकाबला करने का निर्णय किया। उन्होंने अपने राज्य की सार्वभौमिकता की रक्षा करने के लिए सर्वस्व बलिदान करने की तैयारी की, उनके लिए युद्ध के मैदान से हटने का निर्णय किया गया। वह उनके निकटतम और निष्ठावान सलाहकारों की राय पर किया गया। उनके समर्पित सलाहकारों ने उन्हें लगभग इस बात के लिए मजबूर किया कि वह मेवाड़ के भविष्य के लिए यह कार्य करें क्योंकि उनका बचे रहना उस समय की सर्वोपरि आवश्यकता थी, उनके बाकी सभी साथियों ने युद्ध के मैदान में डटे रहने और आखरी सांस तक लड़ने का निर्णय किया और उसे बखूबी निभाया।

यह न केवल मेवाड़ के लिए शान की बात है, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए भी शान की बात है। झालामान जो कि उनके हमशक्ल थे उन्होंने महाराणा प्रताप के राजश्री चिन्हों को धारण करके युद्ध में भाग लिया ताकि अकबर की सेना भ्रम में रहे, तब तक महाराणा प्रताप सुरक्षित स्थान तक पहुंच सकें। यह सभी योद्धा प्रातः स्मरणीय हैं जो इस युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए। यहां विवाद की शुरुआत की कुछ जानकारी देना भी समीचीन होगा कि अकबर के सेनापति मानसिंह किसी सैन्य अभियान पर गुजरात गए हुए थे, वहां से लौटते समय उदयपुर में रुके। उदयपुर में उन्होंने भोज में शरीक होने के लिए महाराणा प्रताप को न्योता भेजा। महाराणा प्रताप भोज में नहीं गए, उनके पुत्र अमर सिंह कुछ साथियों के साथ अवश्य गए। 

जब मानसिंह ने महाराणा प्रताप के नहीं आने का कारण पूछा तो उन्होंने उनके अस्वस्थ होने की बात कही। मानसिंह ने हल्की भाषा का इस्तेमाल करते हुए धमकी दी कि जल्दी ही उनको हम ठीक कर देंगे, यह चुभने वाली बात थी और उस पर अमर सिंह के साथ गए हुए एक वीर भीम डोडिया बर्दाश्त नहीं कर पाए। भीम डोडिया ने तत्काल जवाब दिया कि आप जल्दी ही आएं और अपने फूफा को अर्थात बादशाह अकबर को भी साथ लाएं, हम तैयार हैं। इन कटु संवादों के साथ मुलाकात समाप्त हो गई और बाद में मेवाड़ पर अकबरी सेना का आक्रमण जयपुर के राजा मानसिंह के नेतृत्व में हुआ।

यहां यह उल्लेखनीय है की राज्य के हित में सलाहकारों कि राय पर युद्ध मैदान से हटना कायरता नहीं है। ऐसा कई युद्धों में कई योद्धाओं ने किया है, यहां तक की श्री कृष्ण जी को भी ऐसा करना पड़ा था और वह किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं था। अगर कोई भी दीया कुमारी मेवाड़ के लोगों को झूठी जीत के नशे में डुबोना चाहती है, तो मेरे ख्याल से मेवाड़ की जनता के लिए यह उचित नहीं होगा, मेवाड़ की जनता इन सभी बातों पर केवल भावुकता के बजाय गुण दोष के आधार पर निर्णय करेगी और जो भूल पिछले चुनाव में दीया कुमारी को मेवाड़ के सांसद के रूप में विजयी बनाकर कर चुकी है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं करेगी।

हल्दीघाटी के युद्ध में अखेराज सोनगरा का संपूर्ण परिवार, भीम डोडिया का संपूर्ण परिवार, झालामान और उनके परिजन और सहयोगी, साथ ही मेवाड़ की सेना के सेनापति हकीम खान सूर और उनके सहयोगियों ने बहादुरी से अकबर की सेना का मुकाबला किया और इन सभी में से अधिकांश वीरगति को प्राप्त हुए। वे सभी वीर योद्धा मेवाड़ के खातिर अपने प्राण न्योछावर कर गए, महाराणा प्रताप का प्रिय चेतक घोड़ा घायल अवस्था में भी उन को सुरक्षित स्थान पर ले गया। जहां हल्दीघाटी से कुछ दूर चेतक की याद में स्मारक बना हुआ है। 

उसके बाद मेवाड़ की जनता ने अपने महाराणा को सुरक्षित रखने के लिए भरपूर सहयोग दिया और खास तौर पर अरावली के पहाड़ों में निवास करने वाले भील आदिवासियों ने उनका पूरे तौर पर साथ देने का काम किया। बाद में महाराणा प्रताप ने चावंड में अपनी राजधानी स्थापित की। वहीं से राज चलाया और भामाशाह के द्वारा दी गई आर्थिक मदद और अन्य स्रोतों से प्राप्त मदद के बल पर मजबूत सेना पुनः खड़ी कर ली। जिसने बाद में दिवेर का युद्ध जीता। लेकिन मेवाड़ को कभी झुकने नहीं दिया, यह सही फैसला था, इस पर गर्व होना चाहिए। किसी झूठे सर्टिफिकेट के ऊपर गर्व करने की कोई उपयोगिता नहीं है ऐसा कोई नशे में गाफिल आदमी ही कर सकता है, मेवाड़ के तथाकथित महाराणा महेंद्र सिंह ने अगर थोड़ी सी मजबूती दिखाई होती, जो कि महाराणा प्रताप के वंशज होने के नाते उन्हें दिखानी ही चाहिए थी, तो दीया कुमारी मेवाड़ की सांसद नहीं बन पाती। सपूत सौ पीढ़ी तक वैर नहीं भुलाते हैं और महेंद्र सिंह इसको भुला बैठे, प्रत्याशी बनकर दीया कुमारी सीधे उनका आशीर्वाद प्राप्त करने गई और वह आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद जनता के बीच गई। 

इस प्रकार उन्होंने अपना रास्ता आसान कर लिया, इस बात के लिए महेंद्र सिंह को मेवाड़ की जनता से जरूर क्षमा याचना करनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी का यह झूठ फैलाओ अभियान दीया कुमारी को मेवाड़ के नेता के रूप में स्थापित करने के अभियान का हिस्सा है, जो कि मेवाड़ वासियों के लिए दुखद और शर्मनाक है। क्योंकि जो मानसिंह मेवाड़ का मान मर्दन करने चला था, महाराणा प्रताप और उनके साथियों की बहादुरी के चलते मानसिंह का सपना तब तो सफल नहीं हुआ लेकिन दीया कुमारी को नेता के रूप में मेवाड़ पर थोप कर अब भारतीय जनता पार्टी मेवाड़ की जनता का मान मर्दन कर रही है। इसका जवाब तो जनता को ही सचेत होकर देना होगा। कुछ गुजारिश दीया कुमारी से भी करना उचित होगा, दीया कुमारी जी आप जिस अकूत संपदा की मालिक बनी बैठी हो, वह आपके खानदान के मुगलों के साथ रिश्तो के कारण ही संभव हुआ है। 

आप के स्वगोत्र विवाह करने, कुछ पंडितों के द्वारा उसे वैधानिकता प्रदान करने या पति से विवाह विच्छेद जैसे निजी मामलों पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। लेकिन इतना कहना जरूरी है कि आपने जयपुर राजघराने की संपदा पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए, अपने बेटे को आपके पिता को गोद देकर जो काम किया है। वह संपदा असल में राजस्थान की गरीब जनता के काम आनी चाहिए, कुछ दिन पहले आपने एक संवाद के दौरान लोकतंत्र में राजघरानों की महत्वपूर्ण भूमिका की बात कही थी। अब यह राजघरानों का भूत आप अपने दिमाग से उतार दें तो अच्छा ही होगा, सरकार के गलत फैसलों के कारण जिस धनसंपदा को आपने अपने अधिकार में कर रखा है ,वह आजादी के साथ ही इस देश की जनता को समर्पित कर देनी चाहिए थी जो कि नहीं की गई। आप बेशक राजनीति करें अपनी पसंद की पार्टी में रहकर करें, इस पर किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता। लेकिन राजघराने के बल पर करें, उस धनसंपदा के बल पर करें, इसके बजाय पहले आप इन सारे संसाधनों का परित्याग करें। लाव लश्कर का परित्याग करें, साधारण नागरिक बनें और नागरिक की तरह रह कर फिर राजनीति करें। तब आपको आटे दाल के भाव मालूम पड़ जाएंगे। जिससे आम जनता प्रतिदिन रूबरू होती है। 

दीया कुमारी जी इतिहास के साथ छेड़खानी मत कीजिए, भारत सरकार आपकी है। आपने चाहे जैसे पुरातत्व विभाग से हल्दीघाटी का साइन बोर्ड हटवा दिया या बदलवा दिया, यह शासन तंत्र का दुरुपयोग है। ऐतिहासिक मामलों पर इतिहासकारों की राय का महत्व हो सकता है, लेकिन पुरातत्वविदों का नहीं। किन इतिहासकारों ने नई खोज करके नए तथ्य पेश करके, आप द्वारा कही गई बात की पुष्टि की है, यह हमारी जानकारी में नहीं है। यह होता तो एक उचित प्रणाली पर संवाद हो सकता था क्योंकि हल्दीघाटी का युद्ध कोई मोहनजोदड़ो की सभ्यता जैसी अबूझ पहेली नहीं है, इसके दस्तावेज मौजूद हैं, साक्ष्य मौजूद हैं, फिर भी भारतीय जनता पार्टी और आप जिद पर अड़े हैं तो आने वाला समय इसका भी फैसला कर देगा। जो कोई भी अहम् ब्रह्मास्मि का शिकार हुआ है उसे भस्मीभूत ही होना पड़ा है। यह हमेशा याद रखें महाराणा प्रताप मेवाड़ की संप्रभुता और अस्मिता के रक्षक के रूप में हमेशा याद किए जाते रहेंगे, उन्हें किसी झूठे प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं।

(अर्जुन देथा 19 जुलाई 2021)

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