लोकतंत्र और समानता धरती पर कब उतरेगी ?

लोकतंत्र और समानता धरती पर कब उतरेगी ?
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इस लेख को जरूर पढिए और फिर कृपा कर इस सवाल का जवाब भी दीजिए। साथ ही खुद से पूछिए कि लोकतंत्र की सही मायने में स्थापना करने एवं समानता को धरातल पर उतारने में आपने अभी तक क्या किया है और आगे क्या कर सकते हैं ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। 26 जनवरी 1950 को हमारे देश भारत में अपना संविधान लागू कर दिया गया। इस संविधान के जरिए भारत को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था देकर लोक कल्याणकारी राज्य घोषित किया गया। सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के बराबरी (समानता) का अधिकार दिया गया। शुरूआती दो दशक तक तो सत्ताधीश देश को लोक कल्याणकारी राज्य बनाने और सभी को समानता से अवसर देने के प्रति गम्भीरता से जद्दोजहद करते रहे। लेकिन 1967 के बाद लोकतांत्रिक मूल्यों और समानता को कुचलने का प्रयास शुरू हुआ तथा इस प्रयास को बड़ी बेदर्दी से सत्ताधीशों ने आगे बढाया। जिसका परिणाम आज सबके सामने है !

बीच बीच में कुछ सत्ताधीशों ने समानता की गाड़ी को पटरी पर लाने की कोशिश की, लेकिन वो पूरी तरह से सफल नहीं हुए। इस दौरान सियासत में परिवारवाद, अपराधवाद, लूटवाद, जातिवाद, धर्मवाद, पूंजीवाद और अवसरवाद आदि ने अपनी जगह बना ली। सियासत और सत्ता पूरी तरह से दूषित बना दी गई। सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर अपराधी, लुटेरे और जात धर्म के नाम पर पैदा हुए ढोंगी बैठने शुरू हो गए। शुरूआत में लोग इन्हें अच्छी नजर से नहीं देखते थे, लेकिन धीरे धीरे जनता ने इन्हें मजबूरी व लालच में सम्मान देना शुरू कर दिया। जो जनता द्वारा एक तरह की आत्महत्या थी !

पहले बात करें लोकतंत्र की, यह शासन व्यवस्था की सबसे अच्छी प्रणाली है। जिसका सीधा सा मतलब है कि जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए स्थापित शासन व्यवस्था। यानी जनता द्वारा स्थापित की गई एक ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें बिना किसी भेदभाव के जनहित का विशेष रूप से ख्याल रखा जाए। लेकिन क्या हमारे यहाँ हकीकत में ऐसा है ? अब बात समानता की, समानता का एक मतलब तो यह है कि राज्य (शासन व्यवस्था) की नजर में सब नागरिक समान हैं। दूसरा मतलब यह है कि सरकार इस बात के लिए गम्भीरता से प्रयास करेगी कि शिक्षा, चिकित्सा, पूंजी, अवसर, प्राकृतिक संसाधन आदि मामलों के लिए नागरिकों में समानता स्थापित की जाएगी। लेकिन क्या 70 साल में यह समानता स्थापित हुई है ?

अब बात करें जनता के वर्गों की, देश में अधिकतर आबादी चार वर्गों की है एक किसान, दूसरा मजदूर, तीसरा दस्तकार और चौथा थड़ी ठेले वाले। इन चारों वर्गों की आबादी 95 फीसदी के करीब है। यह सभी शोषित और पीड़ित हैं, चाहे इनकी जाति और धार्मिक वर्ग कुछ भी हो। यह लोग दिन रात कठोर मेहनत करते हैं। इसके बावजूद न अच्छा खाना खा सकते हैं और ना ही अच्छा कपड़ा पहन सकते हैं। यह लोग अपने बच्चों को अच्छी तालीम भी नहीं दिला सकते और जब इनके यहाँ कोई बीमार हो जाए तो यह बेचारे सरकारी अस्पताल में इधर से उधर ठोकरें खाते रहते हैं, पैसा खर्च करने के बाद भी इलाज नहीं करवा सकते। क्योंकि यह 95 फीसदी लोग देश के आम आदमी (आम जन) हैं।

दूसरी तरफ पांच फीसदी लोग हैं, जिनमें पूंजीपति, राजनेता, अधिकारी आदि। यह लोग आलीशान बंगलों में रहते हैं, जो मन चाहा खाना खाते हैं। नामी गिरामी शो रूम से महंगे कपड़े खरीदते हैं, आऊटिंग (बाहर खाने और घूमने) के नाम पर महंगी होटलों में खाना खाते हैं। इनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम की बड़ी स्कूलों व काॅलेजों में शिक्षा ग्रहण करते हैं। जब इनके यहाँ कोई बीमार हो तो उसका आधुनिक महंगे प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवाते हैं। यानी इनको जीवन की समस्त सुविधाएं उच्च श्रेणी की प्राप्त हैं और समानता वाले लोकतंत्र में भी यह लोग खास आदमी बने हुए हैं।

जहाँ तक मेहनत का सवाल है तो यह 95 फीसदी लोग कठोर मेहनत करते हैं, पसीने से लथपथ रहते हैं, फिर भी हर बुनियादी सुविधा के लिए तरसते रहते हैं। जबकि यह पांच फीसदी लोग मेहनत भी कम करते हैं और इनको कोई विशेष पसीना भी नहीं बहाना पड़ता, फिर भी हर सुविधा इनके लिए एक इशारे पर हाजिर हो जाती है। यह इसलिए क्योंकि इन पांच फीसदी लोगों ने व्यवस्था अपने हिसाब से और अपनी सुविधा के लिए बना रखी है। यह पांच फीसदी लोग देश की 95 फीसदी जनता को अपनी मर्जी से हांकते रहते हैं। अब आप बताइए कि लोकतंत्र और समानता कहाँ है ? एक बात और गौर करने वाली है कि यह पांच फीसदी खास आदमी जो मजे कर रहे हैं वो 95 फीसदी आम आदमी की मेहनत के बलबूते कर रहे हैं, यह अपनी अधिकतर सुविधाएं आम आदमी द्वारा दिए गए टैक्स से हासिल करते हैं।

अब लेख के शीर्षक में दिया गया मूल सवाल कि लोकतंत्र और समानता धरती पर कब उतरेगी ? इसका जवाब यह है कि सबसे पहले तो लोकतंत्र सही मायने में स्थापित हो। यह तब स्थापित होगा जब 95 फीसदी शोषित तबका वोट के जरिए सत्ता परिवर्तित करे तथा ऐसे लोगों के हाथ में सत्ता सौंपे जो वाकई लोकतंत्र के रक्षक हों और उनकी नीयत समानता को धरती पर उतारने की हो। साथ ही जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के मुद्दों पर वोट करने की बजाए हर पार्टी और उसके उम्मीदवारों से पूछें कि जनहित के लिए आपका एजेंडा क्या है तथा इससे पहले आपने जनहित के लिए क्या क्या काम किए हैं ? इसके अलावा खुद से भी पूछिए कि लोकतंत्र की सही मायने में स्थापना करने एवं समानता को धरातल पर उतारने के लिए आप क्या कर रहे हैं और भविष्य में क्या कर सकते हैं ?
(09-07-2021)
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