मोदी राष्ट्र नायक और गहलोत जन नायक, लेकिन जनता बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर !!
मोदी राष्ट्र नायक और गहलोत जन नायक, लेकिन जनता बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर !!
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राजस्थान में मण्डी व्यवस्था चौपट, नहीं हो रही है खरीफ फसल की एमएसपी पर खरीद
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⏩बाजरे की 2250 रूपए प्रति क्विंटल एमएसपी, लेकिन किसान को 1300 भी मुश्किल से मिल रहे हैं। मूंग की 7275 रूपए एमएसपी, लेकिन अकाल व अतिवृष्टि से बरबाद हुए किसानों को 4 हजार भी नहीं मिल रहे हैं। यह तस्वीर राजस्थान की है, जिसके मुख्यमंत्री खुद को गांधी का अनुयायी कहते हैं।
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⏩ऊपर से कोढ में खाज वाली कहावत रसोई गैस, पेट्रोल व डीज़ल की बढती कीमतों से हो रही है, जिसने जनता की कमर तोड़ दी है, इसके बावजूद टैक्स कम कर कीमतें घटाने के लिए न तथाकथित राष्ट्र नायक तैयार हैं और ना ही तथाकथित जन नायक।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। बढती महंगाई और बेरोजगारी ने देशभर में जनता को खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया है। सौ रूपए लीटर से ऊपर पहुंचे पेट्रोल व डीज़ल और 900 रूपए से ऊपर पहुंचे रसोई गैस सिलेंडर ने कोढ़ में खाज वाली कहावत अलग चरितार्थ कर दी है। किसान, मजदूर, दस्तकार, थड़ी ठेले वाले, संविदाकर्मी, प्राइवेट नौकरी करने वाले, छोटे व्यापारी सबकी कमर टूट चुकी है। इसके बावजूद बहुतों की नज़र में राष्ट्र नायक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता की पीड़ा को दूर करने में या तो विफल हो चुके हैं या फिर करना नहीं चाहते।
देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान का भी हाल बहुत बुरा है। यहाँ के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं और बहुतों के लिए वे प्रातः स्मरणीय जन नायक हैं। लेकिन इस तथाकथित जन नायक के राज में अकाल व अतिवृष्टि से बरबाद हुआ किसान अपनी बदहाली पर मातम मना रहा है, क्योंकि राजस्थान में खरीफ फसल की एमएसपी पर खरीद नहीं हो रही है। कृषि उपज मण्डी व्यवस्था एक तरह से चौपट हो गई है। जहाँ फसल की बोली न के बराबर लग रही है। पूंजीपति औने पौने दामों में किसानों की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं।
बाजरा देश में सबसे अधिक राजस्थान में पैदा होता है, जिसकी एमएसपी 2250 रूपए प्रति क्विंटल है, लेकिन राजस्थान में बाजरा एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर नहीं खरीदा जा रहा है। इतनी एमएसपी होने के बावजूद राजस्थान के किसान को बाजरे की कीमत 1300 रूपए प्रति क्विंटल भी मुश्किल से मिल रही है। यही हाल दलहन की प्रमुख फसल मूंग का है, जिसकी एमएसपी 7275 रूपए प्रति क्विंटल सरकार ने तय कर रखी है। लेकिन किसान को उसकी कीमत 4 हजार भी नहीं मिल रही है। अन्य खरीफ फसलों का भी यही हाल है।
खरीफ की फसलें सितम्बर के आखिरी में निकलनी शुरू हो गई थी, जिनका बड़ा हिस्सा एक तरह से औने पौने दामों में मजबूर किसानों से बड़े व्यापारियों ने लूट लिया है। किसान गरीब व मजबूर होता है, उसे अगली फसल की बुआई करनी होती है, साथ ही शीघ्रता से फसल बेचकर पिछली फसल का कर्जा चुकाना होता है, इसलिए वो कठोर मेहनत से पैदा की गई फसल का स्टाॅक करने की बजाए मजबूरी में उसे औने पौने दामों में बेच देता है। खरीफ फसल की यह लूट उस राज्य में हो रही है, जिसका मुख्यमंत्री आए दिन गांधी के नाम के कसीदे पढता है, किसानों के हित की बात करने के लिए वे और उनकी पार्टी के नेता घड़ियाली आंसू बहाते हैं।
बात संविदाकर्मियों और अधिकतर प्राइवेट नौकरी करने वालों की करें, तो उन्हें चन्द हजार रूपए महीना मिलता है, 6 हजार से 15 हजार। इतनी छोटी तनख्वाह में वे क्या धोएं और क्या निचोड़ें ? संविदाकर्मी और प्राइवेट नौकरी करने वाले यह लोग 115 रूपए के करीब हो चुके पेट्रोल को रोज बाइक में कहाँ से भरवाएं ? 900 रूपए से ऊपर का गैस सिलेंडर कैसे खरीदें ? इन सवालों के बारे में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री गहलोत को सोचना चाहिए, अगर उनको राष्ट्र नायक व जन नायक जैसे शब्द खुद के लिए सुनकर खुशी मिलती है तो ?
(24-10-2021)
-@-एम फ़ारूक़ ख़ान सम्पादक इक़रा पत्रिका।
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