मुख्यमंत्री गहलोत ने शिक्षक सम्मान समारोह में क्यों किया डोटासरा को जलील ?
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मुख्यमंत्री ने पहली किस्त में वरिष्ठ आईएएस कुंजीलाल मीणा व भवानी सिंह देथा को भरी मीटिंग में फटकार लगाई थी और दूसरी किस्त में पीसीसी अध्यक्ष व तत्कालीन शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा को जलील किया, क्या मुख्यमंत्री सामान्य जातियों के अधिकारियों व मन्त्रियों को भी भरे मंच से ऐसा कहने की ताक़त रखते हैं ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। जयपुर के ऐतिहासिक बिड़ला ऑडिटोरियम में 16 नवम्बर को आयोजित राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान समारोह में शिक्षा विभाग में तबादलों के नाम पर फैले भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने संबोधन के दौरान पूछा कि "क्या तबादले के लिए शिक्षकों को पैसे देने पड़ते हैं ?" इस पर सभी शिक्षकों ने हाथ उठा कर कहा "हाँ" देने पड़ते हैं। शिक्षकों की तरफ से आए इस उत्तर पर सीएम गहलोत ने कहा कि यह बहुत ही दुखदायी बात है। सीएम ने मंच पर बैठे शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा की ओर देखा और जानना चाहा, यह क्या हो रहा है ? तबादले में रिश्वतखोरी की बात उन शिक्षकों ने कही जिनका राज्य स्तर पर सम्मान हुआ था।
सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ तबादलों या दूसरे कामों को लेकर सिर्फ भ्रष्टाचार शिक्षा विभाग में ही है तथा समारोह में मंच से मुख्यमंत्री ने डोटासरा को जलील क्यों किया ? इससे पहले गत दिनों प्रशासन शहरों के संग अभियान को लेकर चल रही वर्चुअल मीटिंग में मुख्यमंत्री ने प्रमुख शासन सचिव कुंजीलाल मीणा और सचिव नगरीय विकास भवानी सिंह देथा को भी मीटिंग में जुड़े सभी अधिकारियों के सामने फटकार लगाई और उनके काम से नाखुशी जाहिर की। चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री बदलने की सियासी चर्चा में डोटासरा ने भी गहलोत का उत्तराधिकारी बनने की कोशिश शुरू कर दी थी, जिसको गहलोत पचा नहीं पाए और उन्होंने मंच से उनको चोर साबित कर हाशिये पर धकेलने वाली कतार में खड़ा कर दिया।
सवाल यह भी बनता है कि क्या मुख्यमंत्री भरी मीटिंग में इस तरह जलीलो ख्वार सामान्य जातियों के अधिकारियों व मन्त्रियों को भी करने की हिम्मत रखते हैं ? मीणा एसटी हैं, देथा और डोटासरा ओबीसी हैं। यह सच है कि शिक्षा विभाग में बहुत भ्रष्टाचार है, लेकिन क्या अन्य विभाग दूध के धुले हुए हैं ? ऐसा कौनसा विभाग है जहाँ खुलकर भ्रष्टाचार का नंगा नाच नहीं हो रहा है ? सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार तो गृह विभाग में है, जो खुद मुख्यमंत्री के पास है। बड़े एवं वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले क्या बिना सौदेबाज़ी के हो रहे हैं ? और क्या यह सौदेबाज़ी करने वाले मुख्यमंत्री के चहेते लोग नहीं हैं ?
राज-काज के उच्च गलियारों में कानाबाती होती है कि कुछ मलाईदार पदों पर लगे अधिकारियों के तबादले लाखों में नहीं करोड़ों में हुए हैं, तो क्या करोड़ों रूपए का उच्च पदों पर लेनदेन मुख्यमंत्री की बिना सहमति से होना मुमकिन है ? आरएएस इन्टरव्यू में क्या हुआ ? रीट में क्या हुआ ? इस महाघोटाले से क्या मुख्यमंत्री वाकिफ़ नहीं हैं ? अगर उनको बिना बताए ही प्रदेश में यह चोर बाज़ारी चल रही है, तो फिर उन्हें इन सबकी सीबीआई या हाईकोर्ट की निगरानी में एसआईटी गठित कर जांच करवानी चाहिए।
क्या मुख्यमंत्री को यह मालूम नहीं कि जोधपुर में उनके चहेतों ने पिछले 23 साल में जो माल बनाया है, वो कहाँ से आया ? क्या मुख्यमंत्री की यह हिम्मत है कि वो डोटासरा की तरह मंच से नगरीय विकास मन्त्री शान्ति धारीवाल, स्वास्थ्य मन्त्री रहे रघु शर्मा, परिवहन मन्त्री प्रताप सिंह खाचरियावास और मुख्य सचेतक महेश जोशी जैसे नेताओं को भी भ्रष्टाचार की फटकार लगा सकते हैं ? मुख्यमंत्री को अपने दिल पर हाथ रखकर खुद से पूछना चाहिए कि पिछले दो दशक में उनके चहेतों के पास यह अथाह धन कहाँ से आया ? क्या इस धन को बनाने में उन्होंने इनकी कोई मदद करवाई ? जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री गहलोत के वरदान व आशीर्वाद के बिना उनके चहेतों के पास यह अथाह धन नहीं आ सकता।
(20-11-2021)
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