राजस्थान में ओवैसी को लेकर उत्साह और खलबली दोनों•••
राजस्थान में ओवैसी को लेकर उत्साह और खलबली दोनों•••
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क्या ओवैसी राजस्थान में कोई गठबंधन कर सत्ता में भागीदारी हासिल कर पाएंगे या वे कांग्रेस का पूरी तरह से सूपड़ा साफ़ कर भाजपा को विजय श्री दिलवाएंगे, या वे सियासी मुसलमानों को न घर का छोड़ेंगे और ना ही घाट का ? सवाल यह भी बनता है कि मुसलमान ओवैसी की तरफ एक उम्मीद की नज़र से क्यों देख रहा है ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। पिछले ढाई महीने में एमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी का दो बार राजस्थान की राजधानी जयपुर में दौरा हुआ और दोनों ही बार यह दौरा पूरी तरह से गोपनीय रखा गया। लेकिन फिर भी सरकारी एजेंसियों और पत्रकारों ने दौरों की गोपनीयता का पूरी तरह से ऑपरेशन कर उनका खुलासा कर दिया। ओवैसी को हैदराबाद के बाहर पहले महाराष्ट्र में और बाद में बिहार में कामयाबी मिली। जिसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी को दूसरे राज्यों में भी फैलाना शुरू कर दिया। लेकिन बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्होंने बुरी तरह से हार का सामना किया। इस चुनाव में अन्य प्रमुख पार्टियों के लिए एमआईएम एक अछूत पार्टी बनकर रह गई, किसी ने उनके साथ गठबंधन नहीं किया।
कुछ महीनों पहले यूपी में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी से उनका गठबंधन हुआ, लेकिन अब राजभर भी उनसे अलग हो गए और उन्होंने अखिलेश यादव से गठबंधन कर लिया। फिर भी ओवैसी ने यूपी में पूरा दम खम लगा रखा है। यूपी के साथ वे राजस्थान और गुजरात में भी एक्टिव हो रहे हैं। राजस्थान में काफी लोग उनके एवं उनकी टीम से सोशल मीडिया के जरिए सम्पर्क में हैं तथा खबर है कि राजस्थान में एमआईएम की दस हजार से ऊपर सदस्यता हो चुकी है। उनकी पार्टी की तरफ अधिकतर वे मुसलमान आकर्षित हो रहे हैं, जो कांग्रेस की अनदेखी के शिकार हैं या ओवैसी की बेबाक तकरीरों के दीवाने हैं।
ओवैसी के राजस्थान दौरों से सियासी गलियारों में उत्साह और खलबली दोनों हैं। उत्साह तो उन मुसलमानों में है, जो कांग्रेस सरकार की अनदेखी के चलते ओवैसी के जरिए कांग्रेसी नेताओं का हिसाब चुकता करना चाहते हैं। साथ ही उत्साह भाजपा के गलियारों में भी है, क्योंकि भाजपाई नेताओं को लगता है कि ओवैसी के उम्मीदवारों को जो वोट मिलेगा वो अधिकतर मुसलमानों का होगा, जिसका नुकसान सिर्फ कांग्रेस को है, भाजपा को नहीं।
सियासी जानकारों का मानना है कि ओवैसी कोई सीट जीतें या नहीं, लेकिन इतना तय है कि वे राजस्थान में कांग्रेस को जरूर पानी पिला देंगे। उनको कुछ सीटों पर कामयाबी तभी मिलेगी, जब वे अन्य छोटी पार्टियों से गठबंधन करेंगे, जिसकी अभी तक तो दूर दूर तक कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है कि वे किन किन पार्टियों से गठबंधन करेंगे ? अकेले मुस्लिम वोटों से उन्हें एक भी सीट मिलनी नामुमकिन है। क्योंकि एक अनुमान के मुताबिक राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर मुसलमानों के वोट 30 हजार या इससे ऊपर हैं तथा इनमें से 26 सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम वोट 50 हजार या ऊपर है। यकीनन इन सभी सीटों पर मुसलमान चाहे जिसको हरा और जीता सकते हैं, लेकिन इनमें से एक भी सीट पर खुद के बलबूते जीत नहीं सकते, क्योंकि इनमें से एक भी सीट पर 40 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम वोट नहीं हैं।
मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि ओवैसी ब्रांड सियासत करने वाले मुस्लिम राजनेता न घर के रहेंगे और ना ही घाट के, क्योंकि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण करने वाली भाषणबाजी से दूसरी कौमें उनके नजदीक नहीं आएंगी और उनकी एक अलग पहचान बन जाएगी, जिससे भविष्य में वे किसी सेक्यूलर पार्टी में जाने लायक भी नहीं रहेंगे। मुस्लिम बुद्धिजीवियों का यह भी मानना है कि 70 साल में कांग्रेस ने मुसलमानों को बरबाद करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी और कांग्रेस व भाजपा में कोई विशेष अन्तर नहीं है तथा मुख्यमंत्री गहलोत पूरी तरह से मुस्लिम विरोधी सरकार संचालित कर रहे हैं, लेकिन इसका समाधान ओवैसी जैसे व्यक्ति को बढ़ावा देने या बिना सोचे समझे उनको अपना सियासी रहनुमा मानने से नहीं होगा, बल्कि दानिशमन्दी से राह तय करनी पड़ेगी, वरना ओवैसी ब्रांड सियासत मुसलमानों को 2047 तक वापस 1947 में पहुंचा देगी।
अब एक बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मुसलमान ओवैसी की तरफ एक उम्मीद की नज़र से क्यों देख रहा है ? इसका जवाब यह मिलता है कि देश विभाजन के समय वर्तमान भारत में आबाद करीब 80 प्रतिशत मुसलमानों ने धर्म के आधार पर बने मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान में जाने की बजाए सेक्यूलर मुल्क भारत में रहना पसंद किया था। तब इन बहुसंख्यक मुसलमानों ने जिन्नाह की बजाए गांधी व नेहरू को अपना नेता माना था। लेकिन देश की किसी भी सेक्यूलर पार्टी और किसी भी सेक्यूलर नेता ने मुसलमानों को उनका जायज़ हक और विकास दिलवाने की कोशिश नहीं की, बल्कि इन तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों ने मुसलमानों को एक वोट बैंक बनाकर रखा, जो आज भी बना हुआ है। सबके सामने है कि देश में मुसलमानों की शैक्षणिक व आर्थिक हालत बहुत खराब है। जस्टिस सच्चर कमेटी ने कहा था कि "मुसलमान दलितों व पिछड़ों से भी ज्यादा पिछड़े हुए हैं।" सवाल यह है कि मुसलमानों की यह स्थिति क्यों हुई ? यह हालत मुसलमानों की कांग्रेस जैसी तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों के कारण हुई और इसीलिए मुसलमानों का बड़ा तबका इन तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों से जमकर नाराज़ है और अब वो ओवैसी के जरिए अपनी खुद की सियासी नाव चलाना चाहता है, चाहे यह नाव डूबे या तैरे !
(21-11-2021)
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