राजस्थान अल्पसंख्यक मामलात विभाग या डंपिंग यार्ड ?
राजस्थान अल्पसंख्यक मामलात विभाग या डंपिंग यार्ड ?
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13 साल बाद भी एक भी स्थाई कर्मचारी नहीं, जो हैं वे सभी डेपुटेशन व संविदा पर कार्य कर रहे हैं।
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डेपुटेशन पर भी अधिकतर ऐसे कर्मचारी व अधिकारी लगाए जाते हैं, जो पूरी तरह से नाकारा और निकम्मे हों।
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पूरे प्रदेश में इस विभाग के दफ्तरों में करीब 125 कर्मचारी व अधिकारी कार्यरत हैं, जबकि स्वीकृत पद करीब 500 हैं।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए करीब 13 साल पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार ने अल्पसंख्यक मामलात विभाग बनाया तथा तब इसके मंत्री खुद मुख्यमंत्री गहलोत थे, क्योंकि शुरूआत में इस विभाग का चार्ज उन्हीं के पास था। आज भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं, लेकिन पिछले 13 साल में इस विभाग में एक भी कर्मचारी व अधिकारी की स्थाई भर्ती व नियुक्त नहीं हुई, पूरा विभाग डेपुटेशन और संविदा कर्मचारियों-अधिकारियों के बलबूते पर संचालित है। और तो और जितने पद यहाँ स्वीकृत हैं वे आज तक कभी भी पूरे भरे नहीं गए, अधिकतर पद हमेशा खाली रहे हैं। वर्तमान में यहां करीब 125 अधिकारी-कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि स्वीकृत पद करीब 500 हैं। आरएएस-2021 की भर्ती में जरूर कुल 54 वैकेंसी अल्पसंख्यक मामलात विभाग की घोषित की गई हैं, जिनकी भर्ती अगर समय पर हुई, तो भी दो साल और लग जाएंगे।
इस विभाग के अंतर्गत राजस्थान राज्य अल्पसंख्यक आयोग, राजस्थान वक्फ बोर्ड, हज कमेटी, मदरसा बोर्ड, अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम, वक्फ विकास परिषद आदि निगम-बोर्ड काम करते हैं। जहां वक्फ बोर्ड के अलावा किसी में भी स्थाई कर्मचारी नियुक्त नहीं हैं। चपरासी से लेकर अधिकारी तक सब के सब डेपुटेशन व संविदा पर कार्यरत हैं। विभाग को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए बने अल्पसंख्यक निदेशालय में 66 पद स्वीकृत हैं, लेकिन भरे हुए करीब 35 ही हैं। इसी तरह राजस्थान मदरसा बोर्ड में स्वीकृत पद 36 हैं, लेकिन भरे हुए 12 ही हैं। अल्पसंख्यक निदेशालय की जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकार की विभिन्न अल्पसंख्यक योजनाओं के क्रियान्वयन, पंजीकृत मदरसों का संचालन, अल्पसंख्यक छात्रावास व कोचिंग संस्थानों का संचालन करना है। जिसके लिए सभी जिलों में अल्पसंख्यक कल्याण कार्यालय हैं। जहाँ जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी व जिला अल्पसंख्यक कार्यक्रम अधिकारी के अलावा बाबू व चपरासी भी होने चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि 33 जिलों में से करीब 10 जिलों अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी ही नहीं हैं। कुछ के पास दो जिलों का चार्ज भी है।
यह हाल उस अल्पसंख्यक मामलात विभाग का है, जिसके अन्तर्गत केन्द्र व राज्य सरकार की अल्पसंख्यकों से जुड़ी कई योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है। अल्पसंख्यक वर्ग में राज्य की बड़ी आबादी शामिल है, जिसमें मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बोध व जैन समुदाय के लोग हैं। जिनकी कुल आबादी प्रदेश में गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब 19 प्रतिशत है। सवाल यह है कि प्रदेश की 19 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी के विकास व योजनाओं को लेकर राज्य सरकार इतनी लापरवाह कैसे बनी हुई है ? अगर पूरे कर्मचारी व अधिकारी, वे भी स्थाई नहीं होंगे, तो फिर अल्पसंख्यकों की योजनाओं का सुचारू रूप से संचालन व क्रियान्वयन कैसे होगा ?
अफसोसनाक बात यह भी है कि अल्पसंख्यक मामलात विभाग के निदेशालय और इन से जुड़े विभिन्न कार्यालयों को राज्य सरकार ने एक तरह से डंपिंग यार्ड समझ रखा है। जिन अधिकारी कर्मचारियों को यहाँ डेपुटेशन पर भेजा जाता है, उनमें अधिकतर नाकारा व निकम्मे होते हैं। वे किसी बड़े नेता व उच्चाधिकारी के जैक से यहाँ आते हैं तथा ना तो वे समय पर ऑफिस आते हैं और आते हैं तो ढंग काम नहीं करते हैं। डेपुटेशन पर कुछ बीमार, रिटायर्ड होने के नजदीक, प्रेग्नेंट महिला आदि अधिकारी कर्मचारी भी आते हैं। जो यहाँ काम करने की बजाए विभाग पर ही बोझ बन जाते हैं। जिससे जो अधिकारी व कर्मचारी यहाँ पहले से काम कर रहे हैं या दिन रात लगकर योजनाओं को पटरी पर लाने की कोशिश करते हैं, उन्हें ही दूसरों के हिस्से का काम भी मजबूरी में करना पड़ता है।
अल्पसंख्यक मामलात विभाग के हालात को देखकर लगता है कि सरकार खुद ही इस विभाग को ढंग से चलाना नहीं चाहती, बस उसने इसे डंपिंग यार्ड (कचरागाह) बना रखा है, ताकि मन्त्रियों, विधायकों व उच्चाधिकारियों के चहेते नाकारा व निकम्मे अधिकारी कर्मचारियों को डेपुटेशन पर लगाकर जयपुर व जिला मुख्यालयों में उन्हें नौकरी करने का अवसर दिया जाए।
(23-12-2021)
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