उर्दू तालीम और मदरसा पैराटीचर्स के साथ एक बार फिर हुआ छलावा

उर्दू तालीम और मदरसा पैराटीचर्स के साथ एक बार फिर हुआ छलावा
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साल के आखरी दिन 31 दिसम्बर की रात को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीन मुस्लिम विधायकों और आन्दोलनकारियों के प्रतिनिधिमण्डल के बीच हमदर्दी दिखाते हुए उर्दू तालीम और मदरसा पैराटीचर्स के साथ एक तरह का छलावा किया। आनन-फानन में हुई इस मुलाकात के कुछ घण्टों बाद शिक्षकों की भर्ती की घोषणा कर दी गई और उसमें उर्दू तालीम के साथ सरेआम खिलवाड़ करते हुए सरकार ने बजट घोषणा वाले पदों में भी कटौती कर दी।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद को गांधी का अनुयायी कहते हैं और उनके समर्थक उनको जननायक कहते हैं, लेकिन उन्होंने 31 दिसंबर की रात को साल के आखरी दिन एक बार फिर मदरसा पैराटीचर्स और उर्दू तालीम के साथ छलावा किया है। यह छलावा तीन मुस्लिम विधायकों और आन्दोलनकारियों के प्रतिनिधिमण्डल की मौजूदगी में मुख्यमंत्री ने किया है। लम्बे समय से मदरसा पैराटीचर्स नियमित करने की मांग कर रहे हैं और उर्दू बेरोजगार टीचर्स व अभिभावक उर्दू की भर्ती निकालने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए काफी विरोध प्रदर्शन हुए हैं और हो रहे हैं। काफी दिनों से जयपुर के शहीद स्मारक पर समस्त संविदाकर्मियों का धरना भी नियमित करने के लिए चल रहा था।


इन लोगों की मांग कोई विचित्र नहीं है, यह लोग वही मांग रहे हैं, जो कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में लिखा है या बजट में घोषणा की है। कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनाव 2018 के घोषणा पत्र में समस्त संविदाकर्मियों को नियमित करने की घोषणा की थी। लेकिन तीन साल बाद भी इस वादे को सरकार ने पूरा नहीं किया। इसी तरह बजट 2021-22 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उर्दू तालीम से संबंधित घोषणा की थी कि पहली से पांचवीं क्लास तक अगर 20 विद्यार्थी उर्दू शिक्षा लेने वाले किसी विद्यालय में होंगे, तो वहाँ उर्दू अध्यापक का पद सृजित किया जाएगा। साथ ही यह घोषणा भी की थी कि "छठी से उच्च कक्षाओं में 10 से अधिक विद्यार्थी होने पर उर्दू शिक्षक की पूर्ववत व्यवस्था जारी रखते हुए उर्दू शिक्षकों के सृजित 444 पदों को एक हजार किया जाना प्रस्तावित है।"


उल्लेखनीय है कि 22 जनवरी 2021 को मदरसा पैराटीचर्स और उर्दू तालीम को लेकर पांच दिनों से जयपुर कलेक्टरेट पर चल रहे धरने ने जब सिविल लाइन्स की तरफ कूच किया और मुख्यमंत्री निवास का घेराव किया, तब आनन-फानन में तत्कालीन शिक्षा मन्त्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने अपने निवास पर प्रेस काॅन्फ्रेंस बुलाकर उक्त 444 पदों की घोषणा की थी। फिर भी आन्दोलनकारी संतुष्ट नहीं हुए, तो बजट में मुख्यमंत्री ने इन्हें बढ़ाकर एक हजार कर दिया। लेकिन न तो पहली से पांचवीं क्लास में उर्दू पढने वाले विद्यार्थियों के लिए अभी तक कोई मैपिंग की गई है और ना ही यह लेख लिखे जाने तक तृतीय भाषा उर्दू के लिए की गई मैपिंग के रिकॉर्ड को आउट किया है।

यह सब इसलिए नहीं किया कि अगर पहली से पांचवीं तक की मैपिंग की जाती, तो एक अनुमान के मुताबिक 12 हजार से ऊपर उर्दू के पद सृजित करने पड़ते। इसलिए इस मैपिंग को ही नहीं किया। जहाँ तक तृतीय भाषा उर्दू मैपिंग का मुद्दा है, तो इसे किया तो गया, लेकिन उर्दू विरोधी अधिकारियों एवं कुछ प्रधानाध्याकों के षड्यंत्र से सही मैपिंग नहीं की गई, ताकि उर्दू के पद ज्यादा नहीं हो जाएं। इससे भी बुरी बात व अन्याय उर्दू तृतीय भाषा के साथ यह किया गया कि जैसी भी भेदभावपूर्ण मैपिंग हुई, उसके रिकाॅर्ड को ही सरकार ने आउट नहीं किया। यह इसलिए नहीं किया कि इस भेदभावपूर्ण मैपिंग से भी उर्दू तृतीय भाषा के पद तीन हजार से ज्यादा आने की सम्भावना थी, जो सरकार निकालना नहीं चाहती थी।

इस सब घटनाक्रम से यह खुली किताब की तरह स्पष्ट है कि उर्दू तालीम, मदरसा तालीम और मदरसा पैराटीचर्स को लेकर गहलोत सरकार कतई गम्भीर नहीं है। यह तब है, जब कांग्रेस के अधिकतर विधायक उन सीटों से जीते हैं, जहाँ उर्दू तालीम व मदरसा तालीम को पसंद करने वाले वोटरों ने एकतरफा कांग्रेस को वोट दिया था। यानी कांग्रेस की जीत, कांग्रेस की सत्ता स्थापित करने और अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने में मुख्य भूमिका उर्दू तालीम व मदरसा तालीम को पसंद करने वाले वोटरों की है। इसके बावजूद कांग्रेस की गहलोत सरकार पहले दिन से इस वोटर और इनके मुद्दों को नजरअंदाज कर रही है।

नया खिलवाड़ जो 31 दिसम्बर की रात को हुआ। वो मुख्यमंत्री निवास के अन्दर हुआ। सरकार को उसी रात शिक्षकों की भर्ती निकालनी थी, डर इस बात का था कि उर्दू के घोषित पदों में ही बड़ी कटौती करने से लोग नाराज़ होंगे और विरोध प्रदर्शन पर उतर जाएंगे। इसलिए शहीद स्मारक पर समस्त संविदाकर्मियों के अक्टूबर से चल रहे धरने को समाप्त करवाया जाए, क्योंकि इसकी अगुवाई मुस्लिम कर रहे थे, जिनमें प्रमुख तौर पर मदरसा पैराटीचर और उर्दू टीचर शमशेर भालू ख़ान का नेतृत्व था। इसलिए सरकार शिक्षक भर्ती घोषणा से पहले आनन-फानन में सक्रिय हुई। तीन मुस्लिम विधायकों वाजिब अली नगर, रफीक ख़ान आदर्श नगर और अमीन कागजी किशनपोल को आगे किया गया।

इन धरनार्थियों के प्रतिनिधिमण्डल को मुख्यमंत्री निवास लाया गया और मुख्यमंत्री ने तीनों विधायकों की मौजूदगी में बड़ी हमदर्दी दिखाते हुए उर्दू तालीम का गला घौंट दिया एवं पैराटीचर्स सहित समस्त संविदाकर्मियों की समस्याओं को नियमानुसार निस्तारण करने की बात कह कर मुद्दे की इतिश्री कर दी। धरने की अगुवाई करने वाले उर्दू टीचर शमशेर भालू ख़ान का अनशन तुड़वाते हुए मुख्यमंत्री ने उन्हें एक गिलास ज़्यूस पिला दिया। इस खेल के कुछ घण्टों बाद सरकार ने शिक्षक भर्ती की घोषणा कर दी और करीब 32 हजार पदों में से उर्दू के दामन में 321 पद डाल दिए। यह उर्दू तालीम के साथ घौर नाइन्साफी नहीं तो फिर और क्या है ? कांग्रेस के विधायक, नेता व सरकार में बैठे सत्ताधीश उर्दू के साथ किए गए इस अन्यायपूर्ण व्यवहार के लिए यह लेख लिखे जाने तक पूरी तरह से खामोश हैं। क्या यह अन्यायपूर्ण खेल मुख्यमंत्री की मर्जी से हुआ है, जो खुद को गांधी का अनुयायी कहते हैं ? या शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों की संघी सोच से हुआ है, जिनके आगे मुख्यमंत्री बेबस हैं ?
(02-01-2022)
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