जयपुर में बन रहे अल्पसंख्यक हाॅस्टल का विरोध क्यों ?

जयपुर में बन रहे अल्पसंख्यक हाॅस्टल का विरोध क्यों ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। दरगाह-कब्रिस्तान (मोती डूंगरी जयपुर) जो कि वक्फ बोर्ड की जायदाद है और वक्फ बोर्ड की स्वीकृति से यहाँ राजस्थान अल्पसंख्यक मामलात विभाग एक हाॅस्टल का निर्माण करने जा रहा है। इस हाॅस्टल का वर्चुअल शिलान्यास गत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया। उसके बाद इसका विरोध शुरू हो गया। विरोध करने वाले भी कुछ मुस्लिम संगठन ही हैं। इस विरोध को देखते हुए, जो लोग बरसों से यहाँ हाॅस्टल बनने का सपना देख रहे थे, वे खुलकर हाॅस्टल के समर्थन में खड़े हो गए और इनमें भी कुछ मुस्लिम संगठन और बुद्धिजीवी शामिल हैं।


यहाँ जो हाॅस्टल बनने जा रहा है, वो 80 गुणा 120 फीट में बनने जा रहा है, जिसका रकबा करीब 10 हजार वर्ग फीट है। यहाँ ग्राउंड फ्लोर प्लस सिक्स यानी सात मंजिला भवन बनने जा रहा है, जिसमें करीब 66 कमरे होंगे और 200 अल्पसंख्यक छात्र रह सकेंगे। इसका निर्माण व संचालन अल्पसंख्यक मामलात विभाग करेगा, लेकिन यह सम्पत्ति हमेशा वक्फ बोर्ड की ही रहेगी। यहाँ जो 200 अल्पसंख्यक छात्र रहेंगे, उनमें से 160 मुस्लिम होंगे, शेष 40 अन्य अल्पसंख्यक होंगे। अगर अन्य अल्पसंख्यकों की जो सीटें खाली रहेंगी, वहां मुस्लिम छात्र रह सकेंगे।

अल्पसंख्यक मामलात विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह जमीन करीब सात बीघा वक्फुल इल्ललाह है, इसमें वाकिफ़ की मंशा मजहबी काम, कारे खैर, रिफाए आम और कब्रिस्तान है। यानी यह जमीन मस्जिद व मदरसे की तामीर, तालीमी फरोग, जन कल्याण के कार्यों, कब्रिस्तान आदि के काम आ सकती है। तालीमी फरोग और जन कल्याण के कार्यों में हाॅस्टल भी बन सकता है। यहाँ हाॅस्टल, मस्जिद, दरगाह शरीफ़, कब्रिस्तान, प्याऊ, कुआं आदि पहले से बने हुए हैं। हाॅस्टल में रहने वाले छात्र कमेटी को किराया भी देते हैं। कुछ हिस्सा कारखानों को किराये पर भी दे रखा है। जब यह सारे काम हो सकते हैं तो नया हाॅस्टल बनाने में एतराज़ नहीं होना चाहिए। यह बच्चों के मुस्तकबिल और तालीम को फरोग देने का मामला है, किसी को इस मुद्दे पर सियासत नहीं करनी चाहिए और ना ही नाक की लड़ाई लड़नी चाहिए।

यह सच है कि किसी भी वक्फ जायदाद पर वाकिफ़ की मन्शा के खिलाफ़ कुछ भी तामीर नहीं किया जा सकता है। यानी मस्जिद की जमीन पर शो रूम नहीं बन सकता और कब्रिस्तान की जमीन पर मस्जिद, मदरसा, हाॅस्टल आदि कुछ नहीं बन सकते। लेकिन दूसरा सच यह भी है कि पूरे राजस्थान में वाकिफ़ की मन्शा के खिलाफ़ काम हो रहा है और बरसों से हो रहा है। अगर मुस्लिम संगठनों और रहनुमाओं में दम है तो जाएं उन कब्रिस्तानों के पास जिनकी जमीनों पर दुकानें, शो रूम, काॅम्पलैक्स, विवाह स्थल, सिनेमा हाॅल, रहने के मकान आदि बने हुए हैं और उन्हें हटाने की मांग करें। धरना प्रदर्शन करें।

बहुतों पर तो हर इलाके के नेताओं, मिल्लत के तथाकथित रहनुमाओं और उनके चहेतों के कब्जे हैं। दरगाह मोती डूंगरी कब्रिस्तान की खाली जमीन पर जो हाॅस्टल बनाया जा रहा है, अव्वल तो यह है कि सरकार बनाना ही नहीं चाह रही थी। यह तो अल्पसंख्यक निदेशालय के डायरेक्टर जमील कुरैशी और सम्बंधित अधिकारियों की हिम्मत थी कि उन्होंने इस हाॅस्टल के लिए 8 करोड़ रूपए की स्वीकृति जारी करवा ली। विरोध करना है तो कीजिए, यह लोकतंत्र है, सबको अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन विरोध के नाम पर बच्चों के मुस्तकबिल के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।

जयपुर में गांव ढाणी से जो मुस्लिम बच्चे आकर पढते हैं, उन्हें एक अदद कमरा किराये पर लेने के लिए कितनी दुश्वारी आती है, उसे वही जानते हैं, जो इस शहर में पढे हैं या आज पढ रहे हैं। खुदा के वास्ते और बच्चों के मुस्तकबिल के वास्ते इस हाॅस्टल का विरोध नहीं करें और इसे बनने दें। इस हाॅस्टल में कल हमारे ही बच्चे रहेंगे। यह हाॅस्टल राजस्थान यूनिवर्सिटी से एक किलोमीटर और टोंक फाटक की कोचिंग संस्थानों से चार किलोमीटर दूर है। इससे मुस्लिम कौम का मुस्तकबिल संवरेगा। इसलिए बिना बात विरोध कर क़ौम के मुस्तकबिल पर लात नहीं मारें तो बेहतर है, बाकी आपकी मर्जी है।
(22-01-2022)
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