यूपी और पंजाब के चुनाव को लेकर ऊहापोह की शिकार हुई भाजपा व कांग्रेस

यूपी और पंजाब के चुनाव को लेकर ऊहापोह की शिकार हुई भाजपा व कांग्रेस
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पांच राज्यों में शीघ्र ही होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा पूरी तरह से हार की तरफ बढ रही है, भाजपा और उसके संरक्षक आरएसएस की लीडरशिप पूरी तरह से सकते में है, सम्भावित चुनाव परिणामों को लेकर। वहीं कांग्रेस खेमे में अलग तरह की खलबली मची हुई है, सपा, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस को लेकर। राजनीतिक पण्डितों का मानना है कि यह चुनाव देश की राजनीति को नई राह दिखाएंगे।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। चंद दिनों बाद देश के 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह लेख लिखे जाने तक चुनाव की घोषणा नहीं हुई, लेकिन पूर्व के चुनाव को देखते हुए यह तय है इन राज्यों में फरवरी के अंदर विधानसभा चुनाव होंगे। यह पांच राज्य यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यूपी और पंजाब हैं। इन चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी जो कि केंद्र में सत्तारूढ़ है, वह और उसके संरक्षक आरएसएस की लीडरशिप पूरी तरह से ऊहापोह की शिकार है। क्योंकि यूपी जहां भारी बहुमत से भाजपा की सरकार है, उसके रिपीट होने की संभावनाएं धीरे धीरे कम होती जा रही हैं। वहीं पंजाब जहां भाजपा का कोई बड़ा वजूद नहीं है, लेकिन अकाली दल से मिलकर भाजपा चुनाव लड़ती रही है और गठबंधन में सत्ता में भी रही है। अब भाजपा से अकाली दल अलग हो चुका है और भाजपा को वहां कोई मजबूत सहयोगी भी नहीं मिल रहा है। इससे इन दोनों प्रमुख राज्यों को लेकर भाजपा और आरएसएस की लीडरशिप सकते में है।


इन पांच राज्यों में सबसे बड़े राज्य यूपी, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं और पिछले दो चुनावों में अधिकतर सीटें भाजपा ने जीती हैं। साथ ही गत विधानसभा चुनाव में 403 में से 325 सीटें जीत कर भाजपा ने ऐतिहासिक बहुमत के साथ योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन योगी आदित्यनाथ के शासन करने के तरीके से न सिर्फ आमजन में नाराजगी है बल्कि खबर तो यहां तक है कि भाजपा और आरएसएस नेतृत्व भी योगी आदित्यनाथ से खुश नहीं है तथा कुछ महीनों पहले वहां मुख्यमंत्री बदलने की भी बात आई थी। लेकिन योगी आदित्यनाथ के सामने भाजपा व आरएसएस नेतृत्व को झुकना पड़ा और वह मुख्यमंत्री नहीं बदल सका। 

यहां विधानसभा चुनाव को लेकर जनता के बीच में दो ध्रुव स्थापित हो चुके हैं, उसी तरह जैसे पश्चिम बंगाल में स्थापित हुए थे। एक ध्रुव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ और दूसरा ध्रुव योगी आदित्यनाथ के समर्थन में। योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जो ध्रुव स्थापित हुआ है वह पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के गठबंधन की तरफ साफ झुकता हुआ नजर आ रहा है, यानी मुख्य मुकाबला अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री देखने वालों और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए रखने वालों के बीच तय हो चुका है। हालांकि बसपा व कांग्रेस भी मैदान में हैं और बड़े-बड़े दावे भी कर रही हैं। लेकिन यूपी के सियासी पंडितों का मानना है कि जिस तरह से बंगाल में मोदी वर्सेज ममता मुकाबला तय हो गया था और उसमें ममता की भारी जीत हुई थी, उसी तरह यूपी में मुकाबला योगी वर्सेज अखिलेश तय हो चुका है तथा जमीनी सच्चाई यह कह रही है कि अखिलेश पूरी ताकत के साथ सरकार बनाने वाले हैं। हालांकि यहां असदुद्दीन ओवैसी की भी एंट्री हो चुकी है और वे भी कई सीटों पर चुनाव लड़ने और बड़ी जीत के दावे कर रहे हैं। उनको लेकर यह भी कहा जा रहा है कि उनके भाषणों व चुनाव लड़ने से भाजपा को ही फायदा होगा। लेकिन सियासी जानकारों का मानना है कि ओवैसी बंगाल में भी गए थे, परन्तु वहां उनको कोई खास कामयाबी नहीं मिली और ममता पूरी ताकत से जीती, वही हाल यूपी में भी होगा।

जहां तक पंजाब का सवाल है, यहां भाजपा का कोई खास वजूद नहीं है और अकाली दल से उसका गठबंधन टूट चुका है। नए सहयोगी जो भी मिल रहे हैं वे इतने ताकतवर नहीं हैं कि भाजपा को सत्ता में पहुंचा दें, यहाँ स्थिति यह हो रही है कि भाजपा पूरी तरह से किनारे लग गई है। यहाँ कांग्रेस की हालत भी बहुत पतली हो चुकी है, जो राज्य की सत्ता में है और कुछ दिनों पहले उसने अपना मुख्यमंत्री भी बदल दिया था। कांग्रेस पार्टी में भारी गुटबाजी और अंतर कलह मची हुई है। कांग्रेस से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह हर हाल में कांग्रेस को बुरी तरह से हराना चाहते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े। वहीं अकाली दल जो कि मुख्य विपक्षी पार्टी है और सत्ता में आने के लिए उसने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है। बात आम आदमी पार्टी की करें, तो उसने भी पंजाब की उपजाऊ धरती पर मजबूती से अपना खूंटा गाड़ दिया है तथा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोई बड़ी बात नहीं कि आम आदमी पार्टी पंजाब में बहुत बड़ी कामयाबी हासिल कर सकती है।

जहाँ तक उत्तराखंड का सवाल है, तो वहां भाजपा सरकार में है और जबरदस्त सिरफुटव्वल की शिकार है। उसे यहाँ दो बार मुख्यमंत्री बदलने पड़े हैं। यहां के बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की जीत आसान नहीं है। यहां कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी है और सत्ता में आने की तैयारी कर चुकी है, लेकिन कांग्रेस में भी जबरदस्त गुटबाजी है और यहां भी आम आदमी पार्टी अपना सियासी धरातल बना चुकी है। उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ऊहापोह की शिकार हैं कि यह किसको नुकसान पहुंचाएगी और किसको तीसरे नंबर की पार्टी बना देगी ?

यही हाल गोवा का है, जहां बहुमत में होने के बावजूद जोड़ तोड़ कर भाजपा ने सरकार बनाई थी। यहां कांग्रेस के अधिकतर विधायक दूसरी पार्टियों में चले गए हैं। यहां आम आदमी पार्टी के अलावा तृणमूल कांग्रेस भी हम खम ठोक चुकी है। अब देखना यह है कि इस छोटे से राज्य में जो चतुष्कोणीय मुकाबला होगा, उसमें कौन जीतेगा और कौन हारेगा ? लेकिन गोवा को लेकर भी भाजपा और कांग्रेस दोनों परेशान हैं कि कहीं गोवा हम दोनों के हाथ से नहीं निकल जाए और यहां तृणमूल कांग्रेस व आम आदमी पार्टी स्थापित नहीं हो जाएं ? मणिपुर का सियासी हाल भी अच्छा नहीं है, जहां भाजपा गठबंधन की सरकार है और यह गठबंधन रिपीट होना चाहता है। लेकिन उसके रिपीट होने में कई रोड़े हैं।

पांच राज्यों के इन चुनावों में जो परिणाम आएंगे वे तो अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन सियासी पण्डितों का मानना है कि इन राज्यों के परिणाम देश की राजनीति को नई राह दिखाएंगे। अगर अखिलेश यूपी के मुख्यमंत्री बनते हैं, तो विपक्ष को एक मजबूत युवा नेता मिलेगा, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में एक प्रमुख ध्रुव होगा। अगर पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार बनाने में सफल हो जाती है, तो अरविंद केजरीवाल के तौर पर विपक्ष में एक नया नेता उभर कर आएगा। अगर तृणमूल कांग्रेस गोवा में बड़ी सफलता हासिल करती है, तो ममता बनर्जी बंगाल से बाहर पूरी ताकत से स्थापित होने की कोशिश करेगी। अगर भाजपा यूपी को बचाने में सफल हो जाती है और ओवैसी को भी यहाँ सफलता मिलती है, तो फिर भाजपा विरोधी विपक्ष को 1977 की तरह लामबन्द होना पड़ेगा।
(07-01-2022)
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