राजनीतिक नियुक्तियों में गहलोत सरकार ने किया मुसलमानों के साथ खुला भेदभाव
राजनीतिक नियुक्तियों में गहलोत सरकार ने किया मुसलमानों के साथ खुला भेदभाव
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मुसलमानों से सम्बन्धित बोर्ड/निगम की नियुक्ति के अलावा सामान्य राजनीतिक नियुक्तियों में मुख्यमंत्री गहलोत ने एक मुसलमान को चेयरमैन बनाया है। आरपीएससी, सूचना आयोग, पर्यटन विकास निगम, लघु उद्योग विकास निगम, एएजी जैसी महत्वपूर्ण नियुक्तियों से मुसलमानों को दूर रखा गया है। गहलोत सरकार की इस नाइन्साफी से मुसलमानों में कड़ा रोष है, जो अगले चुनावों में भारी पड़ सकता है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। पिछले दिनों राजस्थान में तीन साल के लम्बे इन्तजार के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजनीतिक नियुक्तियों का पिटारा खोला। इन नियुक्तियों में मुसलमानों से सम्बन्धित निगम/बोर्ड में ही मुसलमानों को नियुक्ति दी गई। सामान्य राजनीतिक नियुक्तियों में एक नियुक्ति मुसलमानों को दी गई। नियुक्तियों में बरते गए इस भेदभाव से मुसलमानों में कड़ा रोष व्याप्त है। सोशल मीडिया और चाय चौपाल पर जमकर गहलोत सरकार को खरी खौटी सुनाई जा रही है।
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मुसलमानों से सम्बन्धित बोर्ड/निगम की नियुक्ति के अलावा सामान्य राजनीतिक नियुक्तियों में मुख्यमंत्री गहलोत ने एक मुसलमान को चेयरमैन बनाया है। आरपीएससी, सूचना आयोग, पर्यटन विकास निगम, लघु उद्योग विकास निगम, एएजी जैसी महत्वपूर्ण नियुक्तियों से मुसलमानों को दूर रखा गया है। गहलोत सरकार की इस नाइन्साफी से मुसलमानों में कड़ा रोष है, जो अगले चुनावों में भारी पड़ सकता है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। पिछले दिनों राजस्थान में तीन साल के लम्बे इन्तजार के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजनीतिक नियुक्तियों का पिटारा खोला। इन नियुक्तियों में मुसलमानों से सम्बन्धित निगम/बोर्ड में ही मुसलमानों को नियुक्ति दी गई। सामान्य राजनीतिक नियुक्तियों में एक नियुक्ति मुसलमानों को दी गई। नियुक्तियों में बरते गए इस भेदभाव से मुसलमानों में कड़ा रोष व्याप्त है। सोशल मीडिया और चाय चौपाल पर जमकर गहलोत सरकार को खरी खौटी सुनाई जा रही है।
लोग सवाल कर रहे हैं कि बीस सूत्री कार्यक्रम, पर्यटन विकास निगम, लघु उद्योग विकास निगम, हाउसिंग बोर्ड, आरपीएससी, सूचना आयोग जैसी नियुक्तियां मुसलमानों के हिस्से में कब आएंगी ? जिस दिन गहलोत सरकार बनी थी और मन्त्रिमण्डल का गठन हुआ था, उसी दिन इस भेदभाव की नींव रखी गई थी। भेदभाव का यह शुभ कार्य सबसे पहले मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने कर कमलों से एक ही मुस्लिम मन्त्री बनाकर किया और उसे भी कोई खास महकमा नहीं दिया। फिर एएजी व गवर्नमेंट एडवोकेट की नियुक्ति, नगर निगम मेयर बनाने, आरपीएससी व सूचना आयोग की नियुक्तियों में पूरी तरह से भेदभाव बरता।
अब तीन साल बाद की गई नियुक्तियों में भी मुख्यमंत्री गहलोत ने मुसलमानों के साथ खुलकर नाइन्साफी की है। कई जनरल बोर्ड-निगम में नियुक्ति की गई हैं, लेकिन इनमें से मुसलमानों के खाते में एक नियुक्ति दी गई है, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के चेयरमैन की। वक्फ बोर्ड, हज कमेटी, वक्फ विकास परिषद, अल्पसंख्यक आयोग आदि नियुक्तियों पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों का कहना है कि "यह नियुक्तियां करके गहलोत ने कोई एहसान नहीं किया है, यह नियुक्तियां तो मुसलमानों को ही मिलनी थी, "अब्दुल" को नहीं तो "फैजुल" को, यह कोई बड़ी खुशी की बात नहीं है। लेकिन जनरल प्रमुख इदारे जैसे पर्यटन विकास निगम, लघु उद्योग विकास निगम, आरपीएससी, सूचना आयोग, हाउसिंग बोर्ड आदि मुस्लिम नेताओं के हिस्से में कब आएंगे, जबकि राजस्थान के मुसलमानों ने कांग्रेस को 99 प्रतिशत वोट देकर 102 विधानसभा सीटों में से 96 सीटें जितवाई थी, तब यह गहलोत सरकार बनी थी ?"
जहाँ तक आरपीएससी यानी राजस्थान लोकसेवा आयोग की बात है, तो इसमें सामान्य वर्ग, ओबीसी, एससी, एसटी व एमबीसी यानी सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, सिवाय मुस्लिम समुदाय के। इसी तरह एजी और एएजी (एडिशनल एडवोकेट जनरल) की नियुक्ति में भी पूरी तरह से भेदभाव बरता गया है। राजस्थान के जोधपुर और जयपुर हाईकोर्ट में एक एजी व 19 एएजी नियुक्त हैं, जो सरकार का पक्ष रखते हैं। इनमें सभी जातीय वर्गों का मुख्यमंत्री ने ख्याल रखा है, सिवाय मुस्लिम के। यानी राजस्थान में एक भी एएजी मुस्लिम नहीं है, जबकि पहले दो-दो मुस्लिम एएजी हुआ करते थे। वकालत से जुड़े हुए लोगों का कहना है एक एएजी को आठ से दस लाख रूपए महीने की कमाई होती है। राजस्थान बार काॅन्सिल के मेम्बर और पूर्व चेयरमैन एडवोकेट सय्यद शाहिद हसन का कहना है कि "राजस्थान में कई काबिल मुस्लिम एडवोकेट हैं, लेकिन सरकार ने इनमें से एक को भी एएजी नहीं बनाया, जबकि हम कई बार सरकार से यह मांग कर चुके हैं कि मुस्लिम एडवोकेट को भी एएजी बनाया जाए, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। बात साफ है कि सरकार खुले तौर मुसलमानों के साथ भेदभाव कर रही है।"
मुस्लिम समुदाय के साथ यह भेदभाव उस कांग्रेस ने बरत रखा है, जो अपने आपको सेक्यूलर व 36 कौमों की पार्टी कहती है। यह भेदभाव उस मुख्यमंत्री ने किया है, जो अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं। राजस्थान में दिसम्बर 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी थी। मतगणना के दिन राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस अपने सिम्बल पर 100 सीट ही जीत पाई थी, यानी वो हारती हारती बची थी। जीतने वाली 100 सीटों पर मुस्लिम वोट 15 हजार से लेकर एक लाख से ऊपर तक हैं। यानी यह सभी सीटें मुस्लिम वोट की बदौलत कांग्रेस ने जीती थी। जो 100 सीटें हारी थी, उनमें अधिकतर पर मुस्लिम वोट 15 हजार से कम है। फिर दो सीटें उप चुनाव में जीतने के बाद कांग्रेस की 102 सीटें हो गई, इनमें 96 सीटें तो साफ नज़र आ रही हैं कि यह मुस्लिम वोट के बलबूते कांग्रेस ने जीती हैं। कांग्रेस के बहुत से नेता यह बात मानते हैं कि "मुसलमानों का एकतरफा और भारी संख्या में वोट कांग्रेस को नहीं मिलता, तो आज कांग्रेस सत्ता में नहीं होती।" इसके बावजूद कांग्रेस ने सरकार बनते ही मुसलमानों को पूरी तरह से नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और अब राजनीतिक नियुक्तियों में तो ठेंगा दिखा दिया।
कांग्रेस से जुड़े मुस्लिम इस भेदभाव को लेकर पूरी तरह से पसोपेश में हैं, वो चाय चौपाल पर चर्चा करते हुए एक दूसरे से पूछते हैं कि "आखिर मुसलमानों का गुनाह क्या है, जो कांग्रेस सरकार उनकी अनदेखी कर रही है ?" वहीं आम मुसलमान अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा है और वो नया रास्ता तय करने की सोच रहा है, चाहे यह रास्ता ओवैसी ब्रांड सियासत का ही क्यों ना हो। जो कांग्रेसी मुस्लिम नेता राजनीतिक नियुक्तियों के दावेदार थे, उन्हें इस बात की भी शिकायत है कि विधायकों को राजनीतिक नियुक्तियां क्यों दी गई ? उन्हें तो टिकट दे दिया था, अगर नियुक्तियां भी उन्हें ही दे दी जाएंगी, तो फिर कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम क्यों करेगा ? इस भेदभाव पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि गहलोत सरकार के इस रवैये से मुसलमान तेजी से कांग्रेस से छिटकते जा रहे हैं, जो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है। यही हाल रहा तो इस बार मुस्लिम प्रभाव वाली करीब करीब सभी सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ेगा।
(23-02-2022)
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जहाँ तक आरपीएससी यानी राजस्थान लोकसेवा आयोग की बात है, तो इसमें सामान्य वर्ग, ओबीसी, एससी, एसटी व एमबीसी यानी सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, सिवाय मुस्लिम समुदाय के। इसी तरह एजी और एएजी (एडिशनल एडवोकेट जनरल) की नियुक्ति में भी पूरी तरह से भेदभाव बरता गया है। राजस्थान के जोधपुर और जयपुर हाईकोर्ट में एक एजी व 19 एएजी नियुक्त हैं, जो सरकार का पक्ष रखते हैं। इनमें सभी जातीय वर्गों का मुख्यमंत्री ने ख्याल रखा है, सिवाय मुस्लिम के। यानी राजस्थान में एक भी एएजी मुस्लिम नहीं है, जबकि पहले दो-दो मुस्लिम एएजी हुआ करते थे। वकालत से जुड़े हुए लोगों का कहना है एक एएजी को आठ से दस लाख रूपए महीने की कमाई होती है। राजस्थान बार काॅन्सिल के मेम्बर और पूर्व चेयरमैन एडवोकेट सय्यद शाहिद हसन का कहना है कि "राजस्थान में कई काबिल मुस्लिम एडवोकेट हैं, लेकिन सरकार ने इनमें से एक को भी एएजी नहीं बनाया, जबकि हम कई बार सरकार से यह मांग कर चुके हैं कि मुस्लिम एडवोकेट को भी एएजी बनाया जाए, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। बात साफ है कि सरकार खुले तौर मुसलमानों के साथ भेदभाव कर रही है।"
मुस्लिम समुदाय के साथ यह भेदभाव उस कांग्रेस ने बरत रखा है, जो अपने आपको सेक्यूलर व 36 कौमों की पार्टी कहती है। यह भेदभाव उस मुख्यमंत्री ने किया है, जो अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं। राजस्थान में दिसम्बर 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी थी। मतगणना के दिन राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस अपने सिम्बल पर 100 सीट ही जीत पाई थी, यानी वो हारती हारती बची थी। जीतने वाली 100 सीटों पर मुस्लिम वोट 15 हजार से लेकर एक लाख से ऊपर तक हैं। यानी यह सभी सीटें मुस्लिम वोट की बदौलत कांग्रेस ने जीती थी। जो 100 सीटें हारी थी, उनमें अधिकतर पर मुस्लिम वोट 15 हजार से कम है। फिर दो सीटें उप चुनाव में जीतने के बाद कांग्रेस की 102 सीटें हो गई, इनमें 96 सीटें तो साफ नज़र आ रही हैं कि यह मुस्लिम वोट के बलबूते कांग्रेस ने जीती हैं। कांग्रेस के बहुत से नेता यह बात मानते हैं कि "मुसलमानों का एकतरफा और भारी संख्या में वोट कांग्रेस को नहीं मिलता, तो आज कांग्रेस सत्ता में नहीं होती।" इसके बावजूद कांग्रेस ने सरकार बनते ही मुसलमानों को पूरी तरह से नजरअंदाज करना शुरू कर दिया और अब राजनीतिक नियुक्तियों में तो ठेंगा दिखा दिया।
कांग्रेस से जुड़े मुस्लिम इस भेदभाव को लेकर पूरी तरह से पसोपेश में हैं, वो चाय चौपाल पर चर्चा करते हुए एक दूसरे से पूछते हैं कि "आखिर मुसलमानों का गुनाह क्या है, जो कांग्रेस सरकार उनकी अनदेखी कर रही है ?" वहीं आम मुसलमान अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा है और वो नया रास्ता तय करने की सोच रहा है, चाहे यह रास्ता ओवैसी ब्रांड सियासत का ही क्यों ना हो। जो कांग्रेसी मुस्लिम नेता राजनीतिक नियुक्तियों के दावेदार थे, उन्हें इस बात की भी शिकायत है कि विधायकों को राजनीतिक नियुक्तियां क्यों दी गई ? उन्हें तो टिकट दे दिया था, अगर नियुक्तियां भी उन्हें ही दे दी जाएंगी, तो फिर कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम क्यों करेगा ? इस भेदभाव पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि गहलोत सरकार के इस रवैये से मुसलमान तेजी से कांग्रेस से छिटकते जा रहे हैं, जो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है। यही हाल रहा तो इस बार मुस्लिम प्रभाव वाली करीब करीब सभी सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ेगा।
(23-02-2022)
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