बढती बेरोजगारी और युवाओं के रोष का जिम्मेदार कौन ?

बढती बेरोजगारी और युवाओं के रोष का जिम्मेदार कौन ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र यानी हमारा देश आज बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं के रोष का शिकार होता जा रहा है। सरकारी नौकरियां लगातार घट रही हैं, जो हैं वो समय पर भरी नहीं जा रही हैं। प्राइवेट सेक्टर में भी नौकरियां घट रही हैं। हम यहाँ न तो कोई आंकड़ा बताना चाहते हैं कि इतने प्रतिशत को रोजगार मिला और इतने प्रतिशत बेरोजगारी बढी है। हम सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि देश में बेरोजगारी बहुत तेजी से बढ़ रही है और यह विकराल रूप धारण करती नजर आ रही है। युवा जबरदस्त गुस्से व हताशा का शिकार हैं तथा शासन प्रशासन के कर्णधार सिवाय जबानी जमाखर्च व लफ्फाजी के कुछ नहीं कर रहे हैं। यही वजह है कि बेरोजगार युवा अब उग्र होते जा रहे हैं। यह उग्रता देश व समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। अगर समय रहते गम्भीरता से कोशिश नहीं की गई, तो युवाओं की यह उग्रता देश व समाज को खतरनाक मोड़ की तरफ धकेल सकती है।


पिछले दिनों रेलवे भर्ती को लेकर जिस तरह से युवाओं ने उग्रता का सहारा लिया और विशेषकर बिहार व यूपी में हिंसक प्रदर्शन और रेलवे सम्पत्तियों को आग लगाई गई, वो बहुत बुरा संकेत था। आज बेरोजगारी की स्थिति बहुत खराब हो चुकी है। करोड़ों युवक-युवतियां देश में ऐसे हैं, जो एक अदद नौकरी के लिए दर दर भटक रहे हैं। हर सरकारी वैकेंसी पर कई गुणा फार्म भरे जा रहे हैं, परीक्षाएं समय पर नहीं हो रही हैं, पेपर लीक हो रहे हैं, भर्तियां कोर्ट-कचहरी में अटक रही हैं। इससे बेरोजगार युवा अपना आपा खो रहे हैं। अमूमन एक बात सुनने और पढने को मिलती है कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, यानी यहाँ सबसे अधिक युवा हैं। वाकई यह सच बात है और यह युवा देश की बहुत बड़ी ताक़त हैं। यह युवा देश के लिए वरदान हैं, लेकिन अगर युवाओं को रोजगार और सही दिशा नहीं मिले, तो यह वरदान अभिशाप भी बन सकता है।

आज केन्द्र व राज्यों में लाखों सरकारी पद खाली पड़े हैं, उन्हें समय पर भरने के लिए सरकारें कतई गम्भीर नहीं हैं, चाहे वे किसी भी पार्टी की हों। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के समय नौकरियों के बड़े बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन वादों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। प्रधानमंत्री व हर राज्य के मुख्यमंत्री रोजगार को लेकर खुद के हाथ से खुद की पीठ थपथपा रहे हैं। गत दिनों प्रधानमंत्री ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण की बहस के जवाब में रोजगार व विकास को लेकर ऐसी बातें कही, मानों जैसे चारों ओर दूध दही की नहरें बह रही हों और सभी देशवासी खुशहाल हों तथा यह खुशहाली सिर्फ विपक्ष को नजर नहीं आ रही हो। ऐसी ही बातें विपक्षी दलों की जिन राज्यों में सरकारें हैं, वहां के मुख्यमंत्री भी करते हैं। यानी वे अपनी सरकार को रोजगार देने के मामले में अव्वल बताते हैं और जो कोई कमी है, उसका ठीकरा केन्द्र सरकार के माथे फोड़ते रहते हैं, जबकि हकीकत यह है कि रोजगार देने के मामले में एकाध राज्य को छोड़ दें तो पूरे देश का कमोबेश एक जैसा हाल है।

पिछले 50 साल में गरीबी हटाओ, उदारीकरण व निजीकरण से विकास आएगा, सबका साथ-सबका विकास, अच्छे दिन आने वाले हैं, जैसे कई नारे व जुमले नेताओं के मुंह से जनता ने सुने तथा युवाओं ने भरोसा कर उन नेताओं को वोट दिया, लेकिन अब यह भरोसा पूरी तरह से टूट चुका है। क्योंकि यह नारे व जुमले सिर्फ कागजी व लफ्फाजी साबित हुए हैं। इस पांच दशक में देश में अमीरी व ग़रीबी की खाई बढ़ी है। अमीर और अमीर हुए हैं तथा गरीब और गरीब हुए हैं। तथाकथित मध्यम वर्ग बीपीएल (गरीबी रेखा) की तरफ तेजी से बढ रहा है। आज देश का अधिकतर नागरिक दुखी है, बेरोजगारी व महंगाई से। अभी तक हमने कोई आंकड़ा नहीं लिखा, लेकिन अब लिख रहे हैं कि आज देश की 90 प्रतिशत जनता बेरोजगारी व महंगाई को लेकर खून के आंसू रो रही है। मजे सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों के हैं। यही हाल युवाओं का है, अधिकतर युवा रोजगार को लेकर हताश हो चुके हैं। इसके लिए 100 प्रतिशत शासन प्रशासन के कर्णधार जिम्मेदार हैं। अगर युवाओं की इस हताशा को दूर नहीं किया गया, उन्हें समय पर रोजगार नहीं दिया गया, तो देश को युवा शक्ति की हताशा व गुस्से के खतरनाक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
(08-02-2022)
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