ओवैसी की एमआईएम, एसडीपीआई का महागठबंधन, वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया की खामोशी और राजस्थान ?
ओवैसी की एमआईएम, एसडीपीआई का महागठबंधन, वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया की खामोशी और राजस्थान ?
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। सबसे पहले बात करें एमआईएम की। राजस्थान के सियासी हल्कों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम को लेकर जबरदस्त चर्चा है। हालांकि अभी तक पार्टी का राजस्थान में विधिवत गठन नहीं हुआ है। लेकिन काम जारी है। खबर है कि ओवैसी समर्थकों ने करीब 40 सीटों को टारगेट बनाकर धरातल पर काम शुरू कर दिया है। ओवैसी फैन्स क्लब जैसे बैनर भी बन चुके हैं और इनकी लगातार मीटिंग भी हो रही हैं।
हालांकि हम व्यक्तिगत तौर पर हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की सियासत और भाजपा-एमआईएम जैसी पार्टियों को पसंद नहीं करते तथा जिस तरह से भाजपा को मुल्क के लिए नुकसानदेह मानते हैं, वैसे ही एमआईएम को भी। लेकिन एमआईएम जैसी पार्टियों को बढ़ावा खुद तथाकथित सेक्यूलर पार्टियां दे रही हैं, क्योंकि इन पार्टियों ने 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद मुसलमानों को पूरी तरह से नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। इसलिए इन तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों के रवैये से नाराज़ होकर मुसलमानों की एक बड़ी तादाद एमआईएम जैसी पार्टियों की तरफ देख रही है। विचित्र बात यह भी है कि एमआईएम के बहुत से समर्थक ऐसे भी हैं, जिन्हें हार जीत से कोई मतलब नहीं है, वे तो कांग्रेस जैसी तथाकथित सेक्यूलर पार्टी और उनके नेताओं से राजस्थान के विधानसभा चुनाव में हिसाब बराबर करना चाहते हैं।
अभी तक एमआईएम को लेकर कोई बड़े चेहरे सामने नहीं हैं। लेकिन खबर यह है कि कांग्रेस के कुछ बड़े मुस्लिम नेता एमआईएम की तरफ एक उम्मीद भरी नज़र से देख रहे हैं। इनमें विधायक व मन्त्री स्तर के नेता भी शामिल हैं। राजस्थान में मुसलमानों के बीच या मुस्लिम नेतृत्व की दो पार्टियां पहले से ही काम कर रही हैं। एक पाॅपुलर फ्रंट ऑफ इण्डिया (पीएफआई) की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इण्डिया (एसडीपीआई) और दूसरी जमाअत ए इस्लामी हिन्द की वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया (डब्ल्यूपीआई), दोनों का धरातल पर ठीकठाक वजूद है और रह दोनों कैडर बेस पार्टियां हैं। एमआईएम तीसरी पार्टी है और यह कोई कैडर बेस पार्टी नहीं है। लेकिन अवाम में चर्चित यह ज्यादा है। विचित्र बात यह है कि तीनों ही मुसलमानों पर ख़ास फोकस किए हुए हैं और तीनों का आपसी कोई तालमेल नज़र नहीं आ रहा है।
अब बात करें एसडीपीआई की, इसने गत दिनों तीन अन्य पार्टियों के साथ एक गठबंधन किया है। लेकिन इस गठबंधन में उसने एमआईएम और वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया को शामिल नहीं किया है या यह दोनों शामिल ही हुई नहीं। इस गठबंधन के बारे में एसडीपीआई ने एक प्रेस नोट जारी कर बताया कि राजस्थान की राजनीति में 21 फरवरी को एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। प्रदेश में समान विचाराधारा के चार राजनीतिक दलों ने एक साथ आ कर "सामाजिक लोकतांत्रिक महागठबंधन" का गठन किया है। इस गठबंधन की घोषणा जयपुर के पिंक सिटी प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता आयोजित कर की गई। इस महागठबंधन की घोषणा पत्रकार वार्ता में भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर वेला राम घोंगरा, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष मोहम्मद रिज़वान खान, अंबेडकराइट्स पार्टी ऑफ इंडिया (एपीआई) के प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर दशरथ सिंह हिंगोनिया और राजस्थान डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर लोकेन्द्र सिंह हीदा (मीणा) ने की है।
बहरहाल देखने में यह गठबंधन बड़ा अच्छा और मजबूत नज़र आ रहा है, लेकिन इसमें एमआईएम और वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया को बुलाया नहीं गया या यह गए नहीं ? यह एक बड़ा गम्भीर सवाल है। खबर है कि मुसलमानों से सम्बन्धित यह तीनों पार्टियां बात तो मुसलमानों की खूब करती हैं, लेकिन सियासी तौर पर एक गठबंधन में आना चाहती, क्योंकि तीनों के केन्द्रीय नेतृत्व के अपने अपने मफाद हैं। लेकिन अगर मान लें कि इस गठबंधन में एमआईएम और वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया भी आगे चलकर शामिल हो जाएंगी और वे राजस्थान में पूरी ताक़त से चुनाव लड़ेंगी, तो ऐसी पांच-सात सीटें कौनसी हैं, जहाँ से वे चुनाव जीत सकेंगी ?
जाहिर सी बात है कि एसडीपीआई, वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया और एमआईएम उन्हीं सीटों से अपने उम्मीदवार उतारेंगी, जो मुस्लिम बाहुल्य हैं। इन मुस्लिम बाहुल्य सीटों में कामां, आदर्श नगर, किशनपोल, हवा महल, कोटा, सीकर, नगर, रामगढ़, फतेहपुर, चूरू, बीकानेर, शिव, सूरसागर, सरदारपुरा, पुष्कर, मसूदा, नागौर, मकराना, डीडवाना, मण्डावा, पोकरण, टोंक, फलौदी, सवाई माधोपुर, झुन्झुनूं आदि शामिल हैं। इनमें 27 सीटें ऐसी हैं, जहाँ मुस्लिम वोटर की संख्या 50 हजार या अधिक है। इनमें से करीब 15 सीटों पर कांग्रेस भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगी, जो हमेशा उतारती रही है, तो क्या एमआईएम, एसडीपीआई और वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया इन सभी को हराने की तैयारी कर रही हैं ? हालांकि वेलफेयर पार्टी ऑफ इण्डिया अभी तक चुनाव में उतरने के मामले में खामोश सी नज़र आ रही है।
यहाँ यह बात भी गौर करने वाली है कि उक्त सीटों में से एक भी सीट ऐसी नहीं है, जहाँ मुस्लिम वोट 40 प्रतिशत से अधिक हों। जब आप 40 प्रतिशत के बल पर जीतना चाहेंगे, तो 60 प्रतिशत बैठे-बैठे क्या तमाशा देखेंगे ? तल्ख हकीकत बात तो यह है कि राजस्थान में राजनीतिक सोच व सूझ बूझ का एक भी आदमी आज इन पार्टियों के पास नहीं है, जो हैं वो सब जज़्बाती लोग हैं और सियासत जज़्बात का खेल नहीं। तन्दूर से रोटी वो ही निकाल सकता है, जिसे निकालनी आए, वरना हाथ भी जल जाते हैं !
(24-02-2022)
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