विधायकों की राजनीतिक नियुक्तियों और मनमर्जी के कारण गहलोत सरकार से जबरदस्त नाराज़ हैं पार्टी के स्थानीय नेता
विधायकों की राजनीतिक नियुक्तियों और मनमर्जी के कारण गहलोत सरकार से जबरदस्त नाराज़ हैं पार्टी के स्थानीय नेता
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जो नेता विधानसभा टिकट के दावेदार थे, उन्हें ना टिकट मिली और ना ही राजनीतिक नियुक्ति, ऐसे कांग्रेसी नेता गहलोत सरकार और पार्टी विधायकों के रवैये से जबरदस्त नाराज़ हैं, यह नाराज़गी पार्टी को विधानसभा चुनाव में भारी पड़ती दिख रही है।
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जो नेता विधानसभा टिकट के दावेदार थे, उन्हें ना टिकट मिली और ना ही राजनीतिक नियुक्ति, ऐसे कांग्रेसी नेता गहलोत सरकार और पार्टी विधायकों के रवैये से जबरदस्त नाराज़ हैं, यह नाराज़गी पार्टी को विधानसभा चुनाव में भारी पड़ती दिख रही है।
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जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। राजस्थान की कांग्रेस सरकार से पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता जबरदस्त नाराज़ हैं। नाराज़गी की वजह खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की नीतियां और पार्टी विधायकों की कार्य प्रणाली है। मुख्यमंत्री गहलोत ने अपनी सरकार बचाने के लिए पूरी तरह से विधायकों को खुली छूट दे रखी है, ताकि विधायक राजी रहें और सरकार पर कोई आंच नहीं आए। गहलोत ने यह छूट जुलाई 2020 में तत्कालीन पीसीसी अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के नेतृत्व में हुई बगावत के दौरान विधायकों को दी, तब विधायकों की बाड़ेबन्दी की गई और इस बाड़ेबन्दी के दौरान उनकी हर शर्त गहलोत ने मानने का वादा किया।
इसके अलावा मुख्यमंत्री गहलोत ने एक डिजायर संस्कृति भी राजनीति में स्थापित कर रखी है, यानी किसी भी विधानसभा क्षेत्र में कोई भी ट्रांसफर पोस्टिंग और कार्य पार्टी के विधायक या हारे हुए प्रत्याशी की सिफारिश के बिना नहीं होगा। डिजायर संस्कृति और खुली छूट ने विधायकों को एक तरह से निरंकुश बना दिया है और इस अघोषित विशेषाधिकार से वे स्थानीय पार्टी नेताओं व विरोधी गुट के कार्यकर्ताओं की एक नहीं सुनते। इससे स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं में विधायकों के प्रति जबरदस्त नाराजगी व्याप्त है, जो पार्टी के लिए आगामी विधानसभा चुनावों में भारी पड़ सकती है।
प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में आठ-दस पुलिस व प्रशासन के अधिकारी कार्यरत होते हैं। इन सभी को सम्बंधित विधानसभा क्षेत्र के पार्टी विधायक या हारे हुए प्रत्याशी की सिफारिश से सरकार ने लगा रखे हैं। कहीं सरकार समर्थित निर्दलीय विधायकों को भी यह इनाम दे रखा है। यानी विधायक अपने क्षेत्र में अपनी मर्ज़ी के अधिकारी लगवा सकता है तथा सभी विधायकों ने ऐसा ही कर रखा है। मतलब साफ है कि थाने, तहसील व एसडीएम ऑफिस में पूरी तरह से विधायकों की मर्जी चलती है। यहाँ तक कि अध्यापक, पटवारी, कांस्टेबल, नर्स आदि का भी ट्रांसफर पोस्टिंग विधायक की इच्छा के बिना नहीं हो सकता। ऐसे में पार्टी के अन्य स्थानीय नेता क्या करें ? क्योंकि गहलोत सरकार की व्यवस्था में उनकी कहीं भी नहीं चलती है।
तीन साल बाद गत दिनों जो राजनीतिक नियुक्तियां मुख्यमंत्री गहलोत ने की, उनमें भी बड़ी संख्या में विधायकों व हारे हुए प्रत्याशियों को दे दी, जिन पर वे नेता उम्मीद की नज़र गड़ाए बैठे थे, जिनको विधानसभा का टिकट नहीं मिला था। विधानसभा टिकट के इन दावेदारों को टिकट वितरण के बाद कहा गया था कि "सरकार आने के बाद आपको एडजस्ट कर देंगे, आप पार्टी को जिताएं।" लेकिन गली गली पार्टी का प्रचार करने व अपनी सीट जिताने और तीन साल इन्तजार करने के बावजूद इन्हें कुछ नहीं मिला तथा राजनीतिक नियुक्तियां भी विधायकों को दे दी।
विचित्र बात तो यह है कि कुछ विधायकों ने तो अपने स्थानीय अधिकारियों को साफ निर्देश दे रखा है कि फलां फलां व्यक्ति अपना विरोधी है और उसने भी टिकट की दावेदारी की थी, इसलिए उनका कोई भी काम नहीं करना है, इससे टिकट के दावेदार रहे पार्टी नेता थाने-तहसील की चौखट पर भी नहीं चढ़ते हैं, क्योंकि जब उनकी कोई सुनता ही नहीं, तो वे वहाँ क्या करने जाएं ? ऐसा नहीं है कि स्थानीय नेताओं के साथ हो रहे इस सुलूक से मुख्यमंत्री व पीसीसी अध्यक्ष वाकिफ नहीं हैं, उन्हें सब कुछ पता है और स्थानीय नेता कई बार पार्टी मंच पर भी यह बात उठा चुके हैं, लेकिन नतीज़ा कुछ नहीं है। यानी विधानसभा क्षेत्र में वही होगा, जो विधायक चाहेगा।
इस सारी स्थिति से राज आने के बावजूद भी कांग्रेस के बहुत से स्थानीय नेता व कार्यकर्ता अपनी ही सरकार में ठगा सा महसूस कर रहे हैं, जिन विधायकों की जीत के लिए जिन्होंने दिन रात एक किए, प्रदेश में पार्टी की सरकार बनवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया, लेकिन इनाम के तौर पर सिर्फ अनदेखी या विधायकों की दुत्कार मिली। पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं की यह नाराज़गी डेढ़ साल बाद होने विधानसभा चुनाव में पार्टी नेतृत्व व विधायकों को दिन में तारे दिखा सकती है।
(25-03-2022)
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